भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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३७४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अब्राहम अपने पुत्रका बलिदान देना चाहता था; तोभी उसे पुत्रहत्या कर डालनेके प्रयत्नका पाप नहीं लगा; या बुद्धके शापसे उसका ससुर मर गया, तोभी उसे मनुष्य- हत्याका पातक छू तक नहीं गया; अथवा माताको मार डालनेपरभी परशुरामके हाथसे मातृहत्या नहीं हुई; उसका कारणभी यही (तत्त्व) है (जिसका उल्लेख ऊपर किया गया है)। गीतामें अर्जुनको जो यह उपदेश किया है, कि "तेरी बुद्धि यदि पवित्र और निर्मल हो, तो फलाशा छोड़कर केवल क्षात्रधर्मके अनुसार युद्धमें भीष्म और द्रोणको मार डालनेसेभी न तो तुझे पितामहके वधका पातक लगेगा और न गुरुहत्याका दोषभी। क्योंकि ऐसे समय ईश्वरी संकेतकी सिद्धिके लिये तू तो केवल निमित्त हो गया है" (गीता ११. ३३) उसमेंभी यही तत्त्व भरा है। व्यवहारमेंभी हम यही देखते हैं, कि यदि किसी लखपतीने किसी भीखमंगेसे दो पैसे छीन लिये हों, तो उस लखपतिको तो कोई चोर कहता नहीं, उलटे यही समझ लिया जाता है, कि भिखारीनेही कुछ अपराध किया होगा, कि जिसका लखपतीने उसको दंड दिया हो। यही न्याय इससेभी अधिक समर्पक रीतिसे या पूर्णतासे स्थितप्रज्ञ, अर्हत और भगवद्भक्तके बर्तावको उपयोगी होता है। क्योंकि लखपतिकी बुद्धि एक बार भलेही डिग जाय; परंतु यह जानीबूझी बात है, कि स्थितप्रज्ञकी बुद्धिको ये विकार कभी स्पर्श तक नहीं कर सकते। सृष्टिकर्ता परमेश्वर सब कर्म करनेपरभी जिस प्रकार पापपुण्यसे अलिप्त रहता है, उसी प्रकार इन ब्रह्मभूत साधु-पुरुषोंकी स्थिति सदैव पवित्र और निष्पाप रहती है। और तो क्या, समय समय पर ऐसे पुरुष स्वेच्छा अर्थात् अपनी मर्जीसे जो व्यवहार करते हैं, उन्हींसे आगे चलकर विधि-नियमोंके निबंध बन जाते हैं, और इसीसे कहते हैं, कि ये सत्पुरुष इन विधि नियमोंके जनक (उपजानेवाले) हैं--वे इनके दास कभी नहीं हो सकते। न केवल वैदिक धर्ममें, प्रत्युत बौद्ध और इसाई धर्ममेंभी यही सिद्धान्त पाया जाता है; तथा प्राचीन ग्रीक तत्त्वज्ञानियोंकोभी यह तत्त्व मान्य हो गया था; और अर्वाचीन कालमें कांटने* अपने नीतिशास्त्रके ग्रंथमें उपपत्तिसहित यही सिद्ध कर दिखलाया है। इस प्रकार नितनियमोंके कभीभी गंदले न होनेवाले मूल झरने या निर्दोष पाठेका (आदर्श) निश्चय हो चुकनेपर आपही सिद्ध हो जाता है, कि नीतिशास्त्र या कर्मयोगशास्त्रके मूल तत्त्व देखनेकी जिसे अभिलाषा

  • "A perfectly good will would therefore be equally subject to objective laws (viz. laws of good), but could not be conceived as obliged thereby to act lawfully, because of itself from its subjective constitution it can only be determined by the conception of good. Therefore no imperatives hold for the Divine will, or in general for a holy will; ought is here out of place, because the volition is already of itself necessarily in unison with the law. Kant's Meta- physic of Morals p. 31. (Abbott's trans. in Kant's Theory of Ethics, 6th Ed.) नित्शे किसीभी आध्यात्मिक उपपत्तिको स्वीकार नहीं करता,