श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसिद्धावस्था और व्यवहार ३७५ हो, उसे इन उदार और निष्कलंक सिद्ध पुरुषोंके चरित्रोंकाही सूक्ष्म अवलोकन करना चाहिये। इसी अभिप्रायसे भगवद्गीतामें अर्जुनने श्रीकृष्णसे ये प्रश्न पूछे हैं, कि “ स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्” ( गीता २. ५४ ) – स्थितप्रज्ञ पुरुषका बोलना, बैठना और चलना कैसे होता है ? अथवा चौदहवें अध्यायमें, “ कैर्लिङ्गैस्त्रीन् गुणान् एतान् अतीतो भवति प्रभो, किमाचारः” (गीता १४. २१ ) – पुरुष त्रिगुणातीत कैसे होता है ? उसका आचार क्या है ? और उसको किस प्रकार पहचानना चाहिये ? किसी सराफ़के पास सोनेका जेवर जँचवानेके लिये ले जानेपर अपनी दूकानमें रखी कसौटीपर उसको परख कर, फिर वह जिस प्रकार उसका खरा-खोटापन बतलाता है, उसी प्रकार कार्य-अकार्य या धर्म-अधर्मका निर्णय करनेके लिये स्थितप्रज्ञका बर्ताव एक कसौटी है। अतः गीताके उक्त प्रश्नोंमें यही अर्थ गर्भित है, कि मुझे उस कसौटीका ज्ञान करा दीजिये। अर्जुनके उपरोक्त प्रश्नोंका उत्तर देते हुए भगवानने स्थितप्रज्ञ अथवा त्रिगुणातीतकी स्थितिके जो वर्णन किये हैं, उन्हें कुछ लोग संन्यास-मार्गवाले ज्ञानी पुरुषोंके बतलाते हैं, उन्हें वे कर्मयोगियोंके नहीं मानते। क्योंकि संन्यासियोंको उद्देश्यकरही 'निराश्रयः' (गीता ४. २०) विशेषणका गीतामें प्रयोग हुआ है, और बारहवें अध्यायमें स्थितप्रज्ञ भगवद्भक्तोंका वर्णन करते समय 'सर्वारंभपरित्यागी' (गीता १२. १६) एवं 'अनिकेतः' (गीता १२. १९), इन स्पष्ट पदोंका प्रयोग किया गया है। परंतु निराश्रय अथवा अनिकेत पदोंका अर्थ “ घरबार छोड़कर जंगलोंमें भटकनेवाला” विवक्षित नहीं है, किंतु इसका अर्थ “ अनाश्रितः कर्मफलं”के ( गीता ६. १) समानार्थकही करना चाहिये – अर्थात् “कर्मफलका आश्रय न करनेवाला” अथवा “जिसके मनमें फलके लिये ठौर नहीं” इस ढंगका हो जायगा। गीताके अनुवादमें इन श्लोकोंके नीचे जो टिप्पणियाँ दी हैं, उनसे यह बात स्पष्ट दीख पड़ेगी। इसके अतिरिक्त स्थितप्रज्ञके वर्णनमेंही कहा है, कि “ इंद्रियोंको अपने वशमें रख कर व्यवहार करनेवाला” अर्थात् वह निष्काम कर्म करनेवाला होता है (गीता २. ६४)। और जिस श्लोकमें उक्त 'निराश्रय' पद आया है, वहाँ यह वर्णन है, कि “कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः” अर्थात् समस्त कर्म करकेभी वह अलिप्त रहता है। बारहवें अध्यायके अनिकेत आदि पदोंके लिये इसी न्यायका उपयोग करना चाहिये। क्योंकि इस अध्यायमें पहले कर्मफलके त्यागकी (कर्मत्यागकी नहीं) प्रशंसा कर चुकनेपर (गीता १२. १२) फलाशा त्यागकर कर्म करनेसे मिलनेवाली शांतिका दिग्दर्शन करनेके लिये आगे भगवद्भक्तके लक्षण बतलाये ह; और ऐसेही अठारहवें अध्यायमेंभी यह दिखलानेके तथापि उसने अपने ग्रंथमें उत्तम पुरुषका ( Superman ) जो वर्णन किया है, उसमें कहा है, कि उल्लिखित पुरुष भले और बुरेसे परे रहता है। उसके एक ग्रंथका नामभी Beyond Good and Evil है।