श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र लिये – कि आसक्तिविरहित कर्म करनेसे शांति कैसे मिलती है – ब्रह्मभूत पुरुषका पुनः वर्णन आया है ( गीता १८. ५० ) । अतएव यह मानना पड़ता है, कि ये सब वर्णन संन्यासमार्गवालोंके नहीं हैं; किंतु कर्मयोगी पुरुषोंकेही हैं। कर्मयोगी स्थित- प्रज्ञ और संन्यासी स्थितप्रज्ञ, दोनोंका ब्रह्मज्ञान, शांति, आत्मौपम्य और निष्काम बुद्धि अथवा नीतितत्त्व पृथक् पृथक् नहीं हैं। दोनों, पूर्ण ब्रह्मज्ञानी हैं, इस कारण दोनोंकी मानसिक स्थिति और शांति एक-सी होती हैं। परंतु इन दोनोंमें कर्म-दृष्टिसे महत्त्वका भेद यह है, कि पहला निरी शांतिमें डूबा रहता है; और किसीकीभी चिंता नहीं करता; तथा दूसरा अपनी शांति एवं आत्मौपम्य बुद्धिका व्यवहारमें यथासंभव नित्य उपयोग किया करता है। अतः यह न्यायसे सिद्ध है, कि व्यावहारिक धर्म-अधर्म-विवेचनके काममें, जिसके प्रत्यक्ष व्यवहारको प्रमाण मानना है, वह स्थितप्रज्ञ कर्म करनेवालाही होना चाहिये; यहाँ कर्मत्यागी साधु अथवा भिक्षुका विवक्षित होना संभव नहीं है। गीतामें अर्जुनको किये गये समग्र उपदेशका सार यह है, कि कर्मोंके छोड़ देनेकी न तो जरूरत है और न वे छूटभी सकते हैं ब्रह्मा- त्मैक्यका ज्ञान प्राप्त कर कर्मयोगीके समान व्यवसायात्मका बुद्धिको साम्यावस्थामें रखना चाहिये, जिससे उसके साथ-ही-साथ वासनात्मक बुद्धिभी सर्वदा शुद्ध, निर्मम और पवित्र रहेगी, एवं कर्मका बंधन न होगा। यही कारण, है, कि इस प्रकरणके आरंभके श्लोकमें यह धर्मतत्त्व बतलाया गया है, कि "केवल वाणी और मनसेही नहीं; किंतु प्रत्यक्ष कर्मसे जो सबका स्नेही और हितकर्ता हो गया, उसेही धर्मज्ञ कहना चाहिये।" जाजलिको यह धर्मतत्त्व बतलाते समय तुलाधारने वाणी और मनके साथही – बल्कि उससेभी पहले – उसमें कर्मकाभी प्रधानतासे निर्देश किया है। कर्मयोगी स्थितप्रज्ञकी अथवा जीवन्मुक्तकी बुद्धिके अनुसार सब प्राणियोंमें जिसकी साम्यबुद्धि हो गई; और जिसके स्वार्थका परार्थमें सर्वथा लय हो गया, उसको आगे विस्तृत नीतिशास्त्र सुनानेकी जरूरत नहीं। वह तो आप ही स्वयंप्रकाश अथवा 'बुद्ध' हो गया। अर्जुनका अधिकार इसी प्रकारका था। अतः उसे इससे अधिक उपदेश करनेकी जरूरतही न थी, कि "तू अपनी बुद्धिको सम और स्थिर कर;" तथा "कर्मको त्याग देनेके व्यर्थ भ्रममें न पड़कर स्थितप्रज्ञकी-सी बुद्धि रख और स्वधर्मके अनुसार प्राप्त सभी सांसारिक कर्म किया कर।" तथापि यह साम्य बुद्धि- रूप योग सभीको एकही जन्ममें प्राप्त नहीं हो सकता, इसीसे साधारण लोगोंके लिये स्थितप्रज्ञके बर्तावका और थोड़ा-सा विवेचन करना चाहिये। परंतु यह विवेचन करते समय भली भाँति स्मरण रहे, कि हम जिस स्थितप्रज्ञका विचार करेंगे, वह कृतयुगके पूर्णावस्थामें पहुँचे हुए समाजमें रहनेवाला नहीं है; बल्कि जिस समाजके बहुतेरे लोग स्वार्थमेंही डूबे रहते हैं, उसी कलियुगी समाजमें उसे बर्ताव करना है। क्योकि मनुष्यका ज्ञान कितनाही पूर्ण क्यों न हो गया हो और उसकी बुद्धि साम्या-