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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

मान्य है। तथापि गीताको संन्यासमार्गका यह कर्म-विरोधी मत ग्राह्य नहीं है, कि मोक्ष- प्राप्तिके लिये अंतमें कर्मोंका सर्वथा छोड़ही बैठना चाहिये । पिछले प्रकरणमें हमने विस्तारसहित गीताका यह विशेष सिद्धान्त दिखलाया है, कि ब्रह्मज्ञानसे प्राप्त होनेवाले वैराग्य अथवा समतासेही ज्ञानी पुरुषको ज्ञान-प्राप्ति हो चुकने परभी सारे व्यवहार करते रहना चाहिये । जगतसे ज्ञानयुक्त कर्मको निकाल डालनेसे तो दुनिया अंधी हुई जाती है; और इससे उसका नाश हो जाता है; जब कि भगवानकीही इच्छा है, कि इस रीतिसे उसका नाश न हो, वह भली भाँति चलती रहे; तब ज्ञानी पुरुष- कोभी जगतके सभी कर्म निष्काम बुद्धिसे करते हुए सामान्य लोगोंको अच्छे बर्तावका प्रत्यक्ष नमूना दिखला देना चाहिये । इसी मार्गको अधिक श्रेयस्कर और ग्राह्य कहें, तो यह देखनेकी जरूरत पड़ती है, कि इस प्रकारका ज्ञानी पुरुष जगतके व्यवहार किस प्रकार करता है ? क्योंकि ऐसे ज्ञानी पुरुषका बर्तावही लोगोंके लिये आदर्श है। उसके कर्म करनेकी रीतिको परख लेनेसे धर्म-अधर्म, कार्य-अकार्य अथवा कर्तव्य-अकर्तव्यका निर्णय कर देनेवाला साधन या युक्ति - जिसे हम खोज रहे थे - आप-ही-आप हमारे हाथ लग जाती है। संन्यास-मार्गकी अपेक्षा कर्म-योगमार्गकी यही तो विशेषता है। इंद्रियोंका निग्रह करनेसे जिस पुरुषकी व्यवसायात्मक बुद्धि स्थिर हो कर " सब भूतोंमें एक आत्मा " इस साम्यको परख लेनेमें समर्थ हो जाय, उसकी वासनाभी शुद्धही होनी चाहिये । इस प्रकार वासनात्मक बुद्धिके शुद्ध, सम, निर्मम और पवित्र हो जानेसे फिर वह कोईभी पाप या मोक्षके लिये प्रतिबंधक कर्म करही नहीं सकता, क्योंकि पहले वासना है; फिर तदनुकूल कर्म, जब कि क्रम ऐसा है, तब शुद्ध वासनासे होनेवाला कर्म शुद्धही होना चाहिये; और जो शुद्ध है, वही मोक्षके लिये अनुकूल है। अर्थात् हमारे आगे जो 'कर्म-अकर्म-विचिकित्सा' या 'कार्य-अकार्य- व्यवस्थिति'का बिकट प्रश्न था, कि पारलौकिक कल्याणके मार्गमें आड़े न आकर इस संसारमें मनुष्यमात्रको कैसा बर्ताव करना चाहिये, उसका अपनी करनीसे प्रत्यक्ष उत्तर देनेवाला गुरु अब हमें मिल गया ( तै. १. ११.४; गीता ३. २१) । अर्जुनके आगे ऐसा गुरु श्रीकृष्णके रूपमें प्रत्यक्ष खड़ा था और जब अर्जुनको यह शंका हुई कि " क्या, ज्ञानी पुरुष युद्ध आदि कर्मोंको बंधनकारक समझकर छोड़ दे ? " तब उसको इस गुरुने दूर बहा दिया और अध्यात्मशास्त्रके सहारे अर्जुनको भली भाँति समझा दिया, कि किस युक्तिसे जगतके व्यवहार करते रहनेपर पाप नहीं लगता; और उसे युद्धके लिये प्रवृत्त किया । किंतु ऐसा चोखा ज्ञान देनेवाले गुरु प्रत्येक मनुष्यको जब चाहे तब नहीं मिल सकते और तीसरे प्रकरणके अंतमें, " महाजनो येन गतः स पन्थाः " इस वचनका विचार करते हुए हम बतला चुके हैं, कि ऐसे महापुरुषोंके निरे ऊपरी बर्तावपर सर्वथा अवलंबित रहभी नहीं सकते । अतएव जगतको अपने आचरणसे शिक्षा देनेवाले इन ज्ञानी पुरुषोंके बर्तावकी बड़ी बारीकीसे जाँचकर विचार करना चाहिये, कि इनके बर्तावका यथार्थ रहस्य या गी. र. २४

३७० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र मूल तत्त्व क्या है ? इसेही कर्मयोगशास्त्र कहते हैं; और ऊपर जो ज्ञानी पुरुष बतलाये गये हैं, उनकी स्थिति और कृतिही इस शास्त्रका आधार है । इस जगतके सभी पुरुष यदि इस प्रकारके आत्मज्ञानी और कर्मयोगी हों, तो कर्मयोगशास्त्रकी जरूरतही न पड़ेगी । नारायणीय धर्ममें एक स्थानपर कहा है :- एकान्तिनो हि पुरुषा दुर्लभा बहवो नृप । यद्येकान्तिभिराकीर्णं जगत् स्यात्कुरुनन्दन ॥ अहिंसकैरात्मविद्भिः सर्वभूतहिते रतै । भवेत् कृतयुगप्राप्तिः आशीः कर्मविवर्जिता ॥ “ एकांतिक अर्थात् प्रवृत्ति-प्रधान भागवत धर्मका पूर्णतया आचरण करनेवाले अनेक पुरुषोंका मिलना कठिन है । आत्मज्ञानी, अहिंसक और प्राणिमात्रकी भलाईके लिये कर्म करनेवाले एकान्तधर्मके ज्ञानी पुरुषोंसे यदि यह जगतभर जावे, तो आशी : कर्म – अर्थात् काम्य अथवा स्वार्थ-बुद्धिसे किये हुए सारे कर्म – इस जगतसे दूर होकर फिर कृतयुग प्राप्त हो जावेगा ” ( शां. ३४८. ६२, ६३ ) ! क्योंकि ऐसी स्थितिमें सभी पुरुषोंके ज्ञानवान् रहनेसे कोई किसीका नुकसान तो करेगाही नहीं; प्रत्युत प्रत्येक मनुष्य सबके कल्याणपर ध्यान देकर तदनुसारही शुद्ध अंतःकरण और निष्काम बुद्धिसे अपना बर्ताव करेगा । हमारे शास्त्रकारोंका मत है, कि बहुत पुराने समयमें एक वार समाजकी ऐसीही स्थिति थी; और वह फिर कभी-न-कभी प्राप्त होगीही ( मभा. शां. ५९. १४ ) । परंतु पश्चिमी पंडित अर्वाचीन इतिहासके आधारसे कहते हैं, कि पहले कभी ऐसी स्थिति नहीं थी, किंतु भविष्यमें मानव जातिके सुधारोंके सहारे कभी- न-कभी ऐसी स्थिति प्राप्त होनेकी संभावना है । जो हो; यहाँ इतिहासका विचार इस समय कर्तव्य नहीं है । हाँ, यह कहनेमें कोई हानि नहीं, कि समाजकी इस अत्युत्कृष्ट स्थिति अथवा पूर्णावस्थामें प्रत्येक मनुष्य परम ज्ञानी होगा; और वह जो व्यवहार करेगा, उसीको शुद्ध, पुण्यकारक, धम्र्य अथवा कर्तव्यकी पराकाष्ठा मानना चाहिये, इस मतको दोनोंही मानते हैं । प्रसिद्ध अंग्रेज सृष्टिशास्त्र-ज्ञाता स्पेन्सरने इसी मतका अपने नीतिशास्त्रविषयक ग्रंथके अंतमें प्रतिपादन किया है, और कहा है, कि प्राचीन कालमें ग्रीस देशके तत्त्वज्ञानी पुरुषोंने यही सिद्धान्त किया था ! * उदाहरणार्थ, यूनानी तत्त्ववेत्ता प्लेटो अपने ग्रंथमें लिखता है, कि तत्त्वज्ञानी पुरुषको जो कर्म प्रशस्त जँचे, वही शुभकारक और न्याय्य है; साधारण मनुष्योंको ये धर्म विदित नहीं होते, इसलिये उन्हें तत्त्वज्ञ पुरुषकेही निर्णयको प्रमाण मान लेना चाहिये । आरिस्टॉटल नामक दूसरा ग्रीक तत्त्वज्ञ अपने नीतिशास्त्रविषयक ग्रंथमें ( ३. ४ ) कहता है, कि ज्ञानी पुरुषका निर्णय सदैव अचूक रहता है, कि वह सच्चे तत्त्वको जाने रहता है; और ज्ञानी

  • Spencer's Data of Ethics, Chap. XV, pp. 275-278. स्पेन्सरने इसको Absolute Ethics नाम दिया है ।

सिद्धावस्था और व्यवहार ३७१ पुरुषका यह निर्णय या व्यवहारही औरोंको प्रमाणभूत है। एपिक्यूररस नामके एक और ग्रीक तत्त्वशास्त्रवेत्ताने इस प्रकारके प्रामाणिक परम ज्ञानी पुरुषके वर्णनमें कहा है, कि वह "शांत, सम-बुद्धिवाला और परमेश्वरके समान सदा आनंदमय रहता है; तथा उसको लोगोंसे अथवा उससे लोगोंको जरासाभी कष्ट नहीं होता"।* पाठकोंके ध्यानमें आही जावेगा, कि भगवद्गीतामें वर्णित स्थितप्रज्ञ, त्रिगुणातीत अथवा परम भक्त या ब्रह्मभूत पुरुषके वर्णनमें इस वर्णनकी कितनी समता है। "यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः" (गीता १२. १५) - जिससे लोक उद्विग्न नहीं होते अथवा जो लोगोंसे उद्विग्न नहीं होता, ऐसेही जो नित्य संतुष्ट है, जो हर्ष-खेद, भय-विषाद, सुख-दुःख आदि द्वंद्वोंसे मुक्त है, सदा अपने आपमेंही संतुष्ट है ("आत्मन्येवात्मना तुष्टः" गीता २.५५) त्रिगुणोंसे जिसका अंतःकरण चंचल नहीं होता ("गुणैर्यो न विचाल्यते" गीता १४. २३), स्तुति या निंदा और मान या अपमान जिसे एक-से हैं; तथा प्राणिमात्रके अंतर्गत आत्माकी एकताको परखकर (गीता १८. ५४), साम्य-बुद्धिसे आसक्ति छोड़कर, धैर्य और उत्साहसे अपना कर्तव्य-कर्म करनेवाला अथवा सम-लोष्ट-अश्म-कांचन (गीता १४. २४) - इत्यादि प्रकारसे भगवद्गीतामेंभी स्थितप्रज्ञके लक्षण तीन-चार बार विस्तारपूर्वक बतलाये गये हैं और इसी अवस्थाको सिद्धावस्था या ब्राह्मी स्थिति कहा गया है। योगवासिष्ठ आदिके प्रणेता इसी स्थितिको जीवन्मुक्तावस्था कहते हैं। इस स्थितिका प्राप्त हो जाना अत्यंत दुर्घट है, अतएव जर्मन तत्त्ववेत्ता कांटका कथन है, कि ग्रीक पंडितोंने इस स्थितिका जो वर्णन किया है, वह किसीएक वास्तविक पुरुषका वर्णन नहीं है; बल्कि शुद्ध नीतिके तत्त्वोंको लोगोंके मनमें भर देनेके लिये समस्त नीतिको मूलभूत शुद्ध वासनाकोही मनुष्य-देह देकर उन्होंने परले सिरेके ज्ञानी और नीतिमान् पुरुषका चित्र अपनी कल्पनासे तैयार किया है। लेकिन हमारे शास्त्रकारोंका सिद्धान्त है, कि यह स्थिति काल्पनिक नहीं, बिलकुल सच्ची है; और मनका निग्रह तथा प्रयत्न करनेसे इसी लोकमें प्राप्त हो जाती है और इस बातका प्रत्यक्ष अनुभवभी हमारे देशवालोंको प्राप्त है। तथापि यह बात साधारण नहीं है। गीतामें (गीता ७. ३) स्पष्टही कहा है, कि हजारों मनुष्योंमें कोई एक-आध मनुष्य इसकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करता है; और प्रयत्न करनेवालों इन हजारोंमेंसे किसी विरलेकोही अनेक जन्मोंके अनंतर यह परमावधिकी स्थिति अंतमें प्राप्त होती है।

  • Epicurus held the virtuous state to be "a tranquil, un- disturbed, innocuous, non-competitive fruition, which approached most nearly to the perfect happiness of the Gods, who "neither suffered vexation in themselves, nor caused vaxation to others." Spencer's Data of Ethics, p. 278, Bain's Mental and Moral Science, Ed. 1875, p. 530 इसीको Ideal Wise Man कहा है।

३७२ . गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र स्थितप्रज्ञ अवस्था या जीवनमुक्त अवस्था कितनीही दुष्प्राप्य क्यों न हो, पर जिस पुरुषको यह परमावधिकी सिद्धि एक बार प्राप्त हो गयी, उसे कार्य-अकार्यके अथवा नीतिशास्त्रके नियम बतलानेकी कभी आवश्यकता नहीं रहती – ऊपर इसके जो लक्षण बतला दिये हैं, उन्हींसे आगे यह बात वस्तुतः निष्पन्न हो जाती है। क्योंकि परमावधिकी शुद्ध, सम और पवित्र बुद्धिही नीतिका सर्वस्व है, इस कारण ऐसे स्थितप्रज्ञ पुरुषके लिये नीति-नियमोंका उपयोग करना मानो स्वयंप्रकाश सूर्यके समीप अंधकार होनेकी कल्पना करके उसे मशाल दिखलानेके समान असमंजसमें पड़ना है। किसी एक-आध पुरुषके इस पूर्णावस्थामें पहुँचने या न पहुँचनेके संबंधमें शंका हो सकेगी । परंतु जब एकबार निश्चय हो जाय, कि किसीभी रीतिसे क्यों न हो, कोई पुरुष इस पूर्णावस्थामें पहुँच गया है, तब उसके पापपुण्यके संबंधमें, अध्यात्म- शास्त्रके उल्लिखित सिद्धान्तको छोड़ और कोई कल्पनाही नहीं की जा सकती । कितॆक पश्चिमी राजधर्म-शास्त्रियोंके मतानुसार, जिस प्रकार एक स्वतंत्र पुरुषमें या पुरुषसमूहमें राजसत्ता अधिष्ठित रहती है और राजनियमोंसे प्रजाके बँधे रहनेपरभी, राजा उन नियमोंसे मुक्त रहता है, ठीक उसी प्रकार नीतिके राज्यमें स्थितप्रज्ञ पुरुषोंका अधिकार रहता है। उनके मनमें कोईभी काम्य बुद्धि नहीं रहती, अतः केवल शास्त्रसे प्राप्त कर्तव्योंको छोड़ और किसीभी हेतुसे कर्म करनेके लिये वे प्रवृत्त नहीं हुआ करते; अतएव अत्यंत निर्मल और शुद्ध वासनावाले इन पुरुषोंके व्यव- हारको पाप या पुण्य, नीति या अनीति शब्द कदापि लागू नहीं होते । वे तो पाप और पुण्यसे परे, बहुत दूर, पहुँच जाते हैं। श्रीशंकराचार्यने कहा है :- निस्त्रैगुण्ये पथि विचरतां को विधिः को निषेधः । “जो पुरुष त्रिगुणातीत हो गये, उनको विधिनिषेधरूपी नियम बाँध नहीं सकते ।” और बौद्ध ग्रंथकारोंनेभी लिखा है, कि “जिस प्रकार उत्तम हीरेको घिसना नहीं पड़ता, उसी प्रकार जो निर्वाणपदका अधिकारी हो गया, उसके कर्मको विधिनियमोंका अडंगा लगाना नहीं पड़ता” (मिलिंदप्रश्न ४. ५. ७)। कौषीतकी उपनिषद (कौषी. ३. १) में इंद्रने प्रतर्दनसे जो यह कहा है कि आत्मज्ञानी पुरुषोंको “मातृहत्या, पितृ- हत्या अथवा भ्रूणहत्या आदि पापभी नहीं लगते ।” अथवा गीता (गी. १८. १७) में जो यह वर्णन है, कि अहंकार-बुद्धिसे सर्वथा विमुक्त पुरुष यदि लोगोंको मारभी डाले, तोभी वह पाप-पुण्यसे सर्वदा अलिप्तही रहता है, उसका तात्पर्यभी यही है (पंचदशी १४. १६, १७) । ‘धम्मपद’ नामक बौद्ध ग्रंथमें इसी तत्त्वका अनुवाद किया गया है (धम्मपद, श्लोक २९४, २९५) ।* नई बाइबलमें ईसाके शिष्य

  • कौषीतकी उपनिषद्का वाक्य यह है-“यो मां विजानीयान्नास्य केनचित् कर्मणा लोको मीयते न मातृवधेन न पितृवधेन न स्तेयेन न भ्रूणहत्यया ।” और धम्मपदका श्लोक इस प्रकार है -

सिद्धावस्था और व्यवहार ३७३ पौलने जो यह कहा है, कि "मुझे सभी बातें (एकही-सी) धर्म्य हैं (१ कारिं. ६. १२; रोम. ८. २), उसका आशय जानके या इस वाक्यका - कि "जो भगवानके पुत्र (पूर्ण भक्त) हो गये, उनके हाथसे कभी पाप हो नहीं सकता" (जा. १. ३. ९)- आशयभी हमारे मतमें ऐसाही है। जो शुद्ध बुद्धिको प्रधानता न देकर केवल ऊपरी कर्मोमेही नीतिका निर्णय करना सीखे हुए हैं, उन्हें यह सिद्धान्त अद्भुत-सा मालूम होता है; और "विधिनियमोसे परेका", "मनमाना भलाबुरा करनेवाला", ऐसा अपनेही मनका कुतर्कपूर्ण अर्थ करके कुछ लोग उल्लिखित सिद्धान्तका इस प्रकार विपर्यास करते हैं, कि "स्थितप्रज्ञको सभी बुरे कर्म करनेकी स्वतंत्रता है।" पर अंधे- को खंभा न दीख पड़े, तो जिस प्रकार खंभा दोषी नहीं है, उसी प्रकार पक्षाभिमानके अंधे इन आक्षेप-कर्ताओंको उल्लिखित सिद्धान्तका ठीक ठीक अर्थ अवगत न हो, तो उसका दोषभी इस सिद्धान्तके मत्थे नहीं थोपा जा सकता। इसे गीताभी मानती है, कि किसीकी शुद्ध बुद्धिकी परीक्षा पहले पहल उसके बाहरी आचरणसेही करनी पड़ती है और जो इस कसौटीपर चौकस सिद्ध होनेमें अभी कुछ कम हैं, उन अपूर्णावस्थाके लोगोंको उक्त सिद्धान्त लागू करनेकी इच्छा अध्यात्मवादीभी नहीं करते। पर जब किसीकी बुद्धिके पूर्ण ब्रह्मनिष्ठ और निःसीम निष्काम होनेमें तिलभरभी संदेह न रहे, तब उस पूर्णावस्थामें पहुँचे हुए सत्पुरुषकी बात निराली हो जाती है। उसका एक-आध काम यदि लौकिक दृष्टिसे विपरीत दीख पड़े तोभी तत्त्वतः यही कहना पड़ता है, कि वह काम दीखनेमें कैसाभी क्यों न हो, उसका बीज निर्दोषही होना चाहिये। अथवा वह शास्त्रकी दृष्टिसे किसी योग्य कारणसे ही हुआ होगा, साधारण मनुष्योंके कामोंके समान उसका लोभमूलक या अनीतिका होना संभव नहीं है; क्योंकि उस सत्पुरुषकी बुद्धिकी पूरी शुद्धता और समता पहलेसेही निश्चित रहती है। बाइबलमे लिखा है, कि मातरं पितरं हंत्वा राजानो द्वे च खत्तिये । रट्ठं सानुचरं हंत्वा अनीघो याति ब्राह्मणो ॥ मातरं पितरं हंत्वा राजानो द्वे च सोत्थिये । वेय्यग्घपञ्चमं हंत्वा अनीघो याति ब्राह्मणो ॥ प्रकट है, कि धम्मपदमें यह कल्पना कौषीतकी उपनिषदसे ली गई है। किंतु बौद्ध ग्रंथकार प्रत्यक्ष मातृवध या पितृवध अर्थ न करके 'माता'का तृष्णा और 'पिता'का अभिमान अर्थ करते हैं। लेकिन हमारे मतमें इस श्लोकका नीतितत्त्व बौद्ध ग्रंथ कारोंको भली भाँति ज्ञात नहीं हो पाया, इसीसे उन्होंने यह औपचारिक अर्थ लगाया है। कौषीतकी उपनिषदमें 'मातृवधेन पितृवधेन' इत्यादि मंत्रके पहले इंद्रने कहा है, कि "यद्यपि मैने वृत्त अर्थात् ब्राह्मणका वध किया है, तोभी मुझे उससे पाप नही लगता।" इससे स्पष्ट होता है, कि यहाँपर प्रत्यक्ष वधही विवक्षित है। धम्मपदके अंग्रेजी अनुवादमें (S. B. E. Vol. X. pp. 70, 71) मेक्समूलर साहबने श्लोकोंकी जो टीका की है, हमारे मतमें वहभी ठीक नहीं है।

३७४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अब्राहम अपने पुत्रका बलिदान देना चाहता था; तोभी उसे पुत्रहत्या कर डालनेके प्रयत्नका पाप नहीं लगा; या बुद्धके शापसे उसका ससुर मर गया, तोभी उसे मनुष्य- हत्याका पातक छू तक नहीं गया; अथवा माताको मार डालनेपरभी परशुरामके हाथसे मातृहत्या नहीं हुई; उसका कारणभी यही (तत्त्व) है (जिसका उल्लेख ऊपर किया गया है)। गीतामें अर्जुनको जो यह उपदेश किया है, कि "तेरी बुद्धि यदि पवित्र और निर्मल हो, तो फलाशा छोड़कर केवल क्षात्रधर्मके अनुसार युद्धमें भीष्म और द्रोणको मार डालनेसेभी न तो तुझे पितामहके वधका पातक लगेगा और न गुरुहत्याका दोषभी। क्योंकि ऐसे समय ईश्वरी संकेतकी सिद्धिके लिये तू तो केवल निमित्त हो गया है" (गीता ११. ३३) उसमेंभी यही तत्त्व भरा है। व्यवहारमेंभी हम यही देखते हैं, कि यदि किसी लखपतीने किसी भीखमंगेसे दो पैसे छीन लिये हों, तो उस लखपतिको तो कोई चोर कहता नहीं, उलटे यही समझ लिया जाता है, कि भिखारीनेही कुछ अपराध किया होगा, कि जिसका लखपतीने उसको दंड दिया हो। यही न्याय इससेभी अधिक समर्पक रीतिसे या पूर्णतासे स्थितप्रज्ञ, अर्हत और भगवद्भक्तके बर्तावको उपयोगी होता है। क्योंकि लखपतिकी बुद्धि एक बार भलेही डिग जाय; परंतु यह जानीबूझी बात है, कि स्थितप्रज्ञकी बुद्धिको ये विकार कभी स्पर्श तक नहीं कर सकते। सृष्टिकर्ता परमेश्वर सब कर्म करनेपरभी जिस प्रकार पापपुण्यसे अलिप्त रहता है, उसी प्रकार इन ब्रह्मभूत साधु-पुरुषोंकी स्थिति सदैव पवित्र और निष्पाप रहती है। और तो क्या, समय समय पर ऐसे पुरुष स्वेच्छा अर्थात् अपनी मर्जीसे जो व्यवहार करते हैं, उन्हींसे आगे चलकर विधि-नियमोंके निबंध बन जाते हैं, और इसीसे कहते हैं, कि ये सत्पुरुष इन विधि नियमोंके जनक (उपजानेवाले) हैं--वे इनके दास कभी नहीं हो सकते। न केवल वैदिक धर्ममें, प्रत्युत बौद्ध और इसाई धर्ममेंभी यही सिद्धान्त पाया जाता है; तथा प्राचीन ग्रीक तत्त्वज्ञानियोंकोभी यह तत्त्व मान्य हो गया था; और अर्वाचीन कालमें कांटने* अपने नीतिशास्त्रके ग्रंथमें उपपत्तिसहित यही सिद्ध कर दिखलाया है। इस प्रकार नितनियमोंके कभीभी गंदले न होनेवाले मूल झरने या निर्दोष पाठेका (आदर्श) निश्चय हो चुकनेपर आपही सिद्ध हो जाता है, कि नीतिशास्त्र या कर्मयोगशास्त्रके मूल तत्त्व देखनेकी जिसे अभिलाषा

  • "A perfectly good will would therefore be equally subject to objective laws (viz. laws of good), but could not be conceived as obliged thereby to act lawfully, because of itself from its subjective constitution it can only be determined by the conception of good. Therefore no imperatives hold for the Divine will, or in general for a holy will; ought is here out of place, because the volition is already of itself necessarily in unison with the law. Kant's Meta- physic of Morals p. 31. (Abbott's trans. in Kant's Theory of Ethics, 6th Ed.) नित्शे किसीभी आध्यात्मिक उपपत्तिको स्वीकार नहीं करता,

सिद्धावस्था और व्यवहार ३७५ हो, उसे इन उदार और निष्कलंक सिद्ध पुरुषोंके चरित्रोंकाही सूक्ष्म अवलोकन करना चाहिये। इसी अभिप्रायसे भगवद्गीतामें अर्जुनने श्रीकृष्णसे ये प्रश्न पूछे हैं, कि “ स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्” ( गीता २. ५४ ) – स्थितप्रज्ञ पुरुषका बोलना, बैठना और चलना कैसे होता है ? अथवा चौदहवें अध्यायमें, “ कैर्लिङ्गैस्त्रीन् गुणान् एतान् अतीतो भवति प्रभो, किमाचारः” (गीता १४. २१ ) – पुरुष त्रिगुणातीत कैसे होता है ? उसका आचार क्या है ? और उसको किस प्रकार पहचानना चाहिये ? किसी सराफ़के पास सोनेका जेवर जँचवानेके लिये ले जानेपर अपनी दूकानमें रखी कसौटीपर उसको परख कर, फिर वह जिस प्रकार उसका खरा-खोटापन बतलाता है, उसी प्रकार कार्य-अकार्य या धर्म-अधर्मका निर्णय करनेके लिये स्थितप्रज्ञका बर्ताव एक कसौटी है। अतः गीताके उक्त प्रश्नोंमें यही अर्थ गर्भित है, कि मुझे उस कसौटीका ज्ञान करा दीजिये। अर्जुनके उपरोक्त प्रश्नोंका उत्तर देते हुए भगवानने स्थितप्रज्ञ अथवा त्रिगुणातीतकी स्थितिके जो वर्णन किये हैं, उन्हें कुछ लोग संन्यास-मार्गवाले ज्ञानी पुरुषोंके बतलाते हैं, उन्हें वे कर्मयोगियोंके नहीं मानते। क्योंकि संन्यासियोंको उद्देश्यकरही 'निराश्रयः' (गीता ४. २०) विशेषणका गीतामें प्रयोग हुआ है, और बारहवें अध्यायमें स्थितप्रज्ञ भगवद्भक्तोंका वर्णन करते समय 'सर्वारंभपरित्यागी' (गीता १२. १६) एवं 'अनिकेतः' (गीता १२. १९), इन स्पष्ट पदोंका प्रयोग किया गया है। परंतु निराश्रय अथवा अनिकेत पदोंका अर्थ “ घरबार छोड़कर जंगलोंमें भटकनेवाला” विवक्षित नहीं है, किंतु इसका अर्थ “ अनाश्रितः कर्मफलं”के ( गीता ६. १) समानार्थकही करना चाहिये – अर्थात् “कर्मफलका आश्रय न करनेवाला” अथवा “जिसके मनमें फलके लिये ठौर नहीं” इस ढंगका हो जायगा। गीताके अनुवादमें इन श्लोकोंके नीचे जो टिप्पणियाँ दी हैं, उनसे यह बात स्पष्ट दीख पड़ेगी। इसके अतिरिक्त स्थितप्रज्ञके वर्णनमेंही कहा है, कि “ इंद्रियोंको अपने वशमें रख कर व्यवहार करनेवाला” अर्थात् वह निष्काम कर्म करनेवाला होता है (गीता २. ६४)। और जिस श्लोकमें उक्त 'निराश्रय' पद आया है, वहाँ यह वर्णन है, कि “कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः” अर्थात् समस्त कर्म करकेभी वह अलिप्त रहता है। बारहवें अध्यायके अनिकेत आदि पदोंके लिये इसी न्यायका उपयोग करना चाहिये। क्योंकि इस अध्यायमें पहले कर्मफलके त्यागकी (कर्मत्यागकी नहीं) प्रशंसा कर चुकनेपर (गीता १२. १२) फलाशा त्यागकर कर्म करनेसे मिलनेवाली शांतिका दिग्दर्शन करनेके लिये आगे भगवद्भक्तके लक्षण बतलाये ह; और ऐसेही अठारहवें अध्यायमेंभी यह दिखलानेके तथापि उसने अपने ग्रंथमें उत्तम पुरुषका ( Superman ) जो वर्णन किया है, उसमें कहा है, कि उल्लिखित पुरुष भले और बुरेसे परे रहता है। उसके एक ग्रंथका नामभी Beyond Good and Evil है।

३७६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र लिये – कि आसक्तिविरहित कर्म करनेसे शांति कैसे मिलती है – ब्रह्मभूत पुरुषका पुनः वर्णन आया है ( गीता १८. ५० ) । अतएव यह मानना पड़ता है, कि ये सब वर्णन संन्यासमार्गवालोंके नहीं हैं; किंतु कर्मयोगी पुरुषोंकेही हैं। कर्मयोगी स्थित- प्रज्ञ और संन्यासी स्थितप्रज्ञ, दोनोंका ब्रह्मज्ञान, शांति, आत्मौपम्य और निष्काम बुद्धि अथवा नीतितत्त्व पृथक् पृथक् नहीं हैं। दोनों, पूर्ण ब्रह्मज्ञानी हैं, इस कारण दोनोंकी मानसिक स्थिति और शांति एक-सी होती हैं। परंतु इन दोनोंमें कर्म-दृष्टिसे महत्त्वका भेद यह है, कि पहला निरी शांतिमें डूबा रहता है; और किसीकीभी चिंता नहीं करता; तथा दूसरा अपनी शांति एवं आत्मौपम्य बुद्धिका व्यवहारमें यथासंभव नित्य उपयोग किया करता है। अतः यह न्यायसे सिद्ध है, कि व्यावहारिक धर्म-अधर्म-विवेचनके काममें, जिसके प्रत्यक्ष व्यवहारको प्रमाण मानना है, वह स्थितप्रज्ञ कर्म करनेवालाही होना चाहिये; यहाँ कर्मत्यागी साधु अथवा भिक्षुका विवक्षित होना संभव नहीं है। गीतामें अर्जुनको किये गये समग्र उपदेशका सार यह है, कि कर्मोंके छोड़ देनेकी न तो जरूरत है और न वे छूटभी सकते हैं ब्रह्मा- त्मैक्यका ज्ञान प्राप्त कर कर्मयोगीके समान व्यवसायात्मका बुद्धिको साम्यावस्थामें रखना चाहिये, जिससे उसके साथ-ही-साथ वासनात्मक बुद्धिभी सर्वदा शुद्ध, निर्मम और पवित्र रहेगी, एवं कर्मका बंधन न होगा। यही कारण, है, कि इस प्रकरणके आरंभके श्लोकमें यह धर्मतत्त्व बतलाया गया है, कि "केवल वाणी और मनसेही नहीं; किंतु प्रत्यक्ष कर्मसे जो सबका स्नेही और हितकर्ता हो गया, उसेही धर्मज्ञ कहना चाहिये।" जाजलिको यह धर्मतत्त्व बतलाते समय तुलाधारने वाणी और मनके साथही – बल्कि उससेभी पहले – उसमें कर्मकाभी प्रधानतासे निर्देश किया है। कर्मयोगी स्थितप्रज्ञकी अथवा जीवन्मुक्तकी बुद्धिके अनुसार सब प्राणियोंमें जिसकी साम्यबुद्धि हो गई; और जिसके स्वार्थका परार्थमें सर्वथा लय हो गया, उसको आगे विस्तृत नीतिशास्त्र सुनानेकी जरूरत नहीं। वह तो आप ही स्वयंप्रकाश अथवा 'बुद्ध' हो गया। अर्जुनका अधिकार इसी प्रकारका था। अतः उसे इससे अधिक उपदेश करनेकी जरूरतही न थी, कि "तू अपनी बुद्धिको सम और स्थिर कर;" तथा "कर्मको त्याग देनेके व्यर्थ भ्रममें न पड़कर स्थितप्रज्ञकी-सी बुद्धि रख और स्वधर्मके अनुसार प्राप्त सभी सांसारिक कर्म किया कर।" तथापि यह साम्य बुद्धि- रूप योग सभीको एकही जन्ममें प्राप्त नहीं हो सकता, इसीसे साधारण लोगोंके लिये स्थितप्रज्ञके बर्तावका और थोड़ा-सा विवेचन करना चाहिये। परंतु यह विवेचन करते समय भली भाँति स्मरण रहे, कि हम जिस स्थितप्रज्ञका विचार करेंगे, वह कृतयुगके पूर्णावस्थामें पहुँचे हुए समाजमें रहनेवाला नहीं है; बल्कि जिस समाजके बहुतेरे लोग स्वार्थमेंही डूबे रहते हैं, उसी कलियुगी समाजमें उसे बर्ताव करना है। क्योकि मनुष्यका ज्ञान कितनाही पूर्ण क्यों न हो गया हो और उसकी बुद्धि साम्या-

सिद्धावस्था और व्यवहार ३७७ वस्थामें कितनीही क्यो न पहुँच गई हो, तोभी उसे ऐसे लोगोंके साथ बर्ताव करना है, जो काम-क्रोध आदिके चक्करमें पड़े हुए हैं; और जिनकी बुद्धि अशुद्ध है। अतएव इन लोगोंके साथ व्यवहार करते समय यदि वह अहिंसा, दया, शांति और क्षमा आदि नित्य एवं परमावधिके सद्गुणोंकोही सब प्रकारसे सर्वदा स्वीकार करें, तो उसका निर्वाह न होगा !* अर्थात् जहाँ सभी स्थितप्रज्ञ हैं, उस समाजकी उन्नत नीति या धर्म-अधर्मसे, उस समाजके धर्म-अधर्म कुछ कुछ भिन्न तो रहेंगेही - कि जिसमें लोभी पुरुषोंकीही भरमार अधिक होगी - वरना साधु पुरुषोंको यह जगत् छोड़ देना पड़ेगा; और सर्वत्र दुष्टोंकाही बोलबाला हो जावेगा। इसका अर्थ यह नहीं है, कि साधु पुरुषको अपनी समता-बुद्धि छोड़ देनी चाहिये। फिरभी समता-समतामेंभी भेद है। गीतामें कहा है, कि "ब्राह्मणे गवि हस्तिनि" (गीता ५. १८) - ब्राह्मण, गाय और हाथीमें पंडितोंकी सम-बुद्धि होती है, इसलिये यदि कोई गायके लिये लाया हुआ चारा ब्राह्मणको और ब्राह्मणके लिये बनाई गई रसोई गायको खिलाने लगे, तो क्या उसे पंडित कहेंगे? संन्यास-मार्गवाले इस प्रश्नका महत्त्व भले न मानें; पर कर्मयोगशास्त्रकी बात ऐसी नहीं है। दूसरे प्रकरणके विवेचनसे पाठक यह जान गयेही होगें, कि कृतयुगी समाजके पूर्णावस्थावाले धर्म-अधर्मके स्वरूपपर ध्यान रखकर स्वार्थपरायण लोगोंके समाजमें स्थितप्रज्ञ यह निश्चय करके बर्ताव है, कि देशकालके अनुसार उसमें कौन कौन फ़र्क़ कर देने चाहिये। और कर्मयोगशास्त्रका यही तो विकट प्रश्न है। साधु पुरुष स्वार्थपरायण लोगोंपर नाराज नहीं होते अथवा उनकी लोभ-बुद्धि देखकर वे अपने मनकी समता डिगने नहीं देते; उलटे इन्हीं लोगोंके कल्याणके लियेही अपने उद्योग केवल कर्तव्य समझ कर वैराग्यसे जारी रखते हैं। इसी तत्त्वको मनमें रखकर श्रीसमर्थ रामदासस्वामीने दासबोधके पूर्वार्धमें पहले ब्रह्मज्ञान बतलाया है; और फिर ग्यारहवें दशकमें (दास. ११. १०; १२. ८-१०; १५. २) इसका वर्णन आरंभ किया है, कि स्थितप्रज्ञ या उत्तम

  • "In the second place, ideal conduct such as ethical theory is concerned with, is not possible for the ideal man in the midst of men otherwise constituted. An absolutely just or perfectly sympathetic person, could not live and act according to his nature in a tribe of cannibals. Among people who are treacherous and utterly without scruple, entire truthfulness and openness must bring ruin." 'Spencer's Data of Ethics, Chap XV, p. 280 स्पेन्सरने इसे Relative Ethics कहा है; और वह कहता है, कि On the evolution- hypothesis, the two ( Abosolute and Relative Ethics ) presuppose one another and only when they co-exist, can there exist that ideal conduct which Absolute Ethics has to formulate, and which Relative Ethics has to take as the standard by which to estimate divergencies from right, or degrees of wrong."

३७८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र पुरुष साधारण लोगोंको चतुर बनानेके लिये वैराग्यसे अर्थात् निःस्पृहतासे लोक- संग्रहके निमित्त उद्योग किस प्रकार किया करते हैं; और आगे अठारहवें दशकमें (दास. १८.२) कहा है, कि सभीको ज्ञानी पुरुष अर्थात् जानकारके ये गुण- कथा, बातचीत, युक्ति, दाव-पेंच, प्रसंग, साक्षेप, तर्क, चतुराई, राजनीति, सहन- शीलता, तीक्ष्णता, उदारता, अध्यात्मज्ञान, भक्ति, अलिप्तता, वैराग्य, धैर्य, उत्साह, कठोरता, निग्रह, समता और विवेक आदि-सिखने चाहिये। परंतु इस निःस्पृह साधुको लोभी मनुष्योंमेंही बर्तना है, इसलिये अंतमें (दास. १९.९.३०) श्रीसमर्थका यह उपदेश है, कि "लठ्ठका सामना लठ्ठेहीसे करा देना चाहिये। उजड्डके लिये उजड्डही चाहिये; और नटखटके सामने नटखटकीही आवश्यकता है।" तात्पर्य, यह निर्विवाद है, कि पूर्णावस्थासे व्यवहारमें उतरनेपर अत्युच्च श्रेणीके धर्म-अधर्ममें थोड़ा-बहुत अंतर कर देना पड़ता है। इसपर आधिभौतिकवादियोंकी शंका है, कि पूर्णावस्थाके समाजमे नीचे उतरनेपर अनेक बातोंके सार-असारका विचार करके परमावधिके नीति-धर्ममें यदि थोड़ा-बहुत फर्क करनाही पड़ता है, तो नीति-धर्मकी नित्यता कहाँ रह गई ? और भारतसावित्रीमें व्यासने जो यह 'धर्मो नित्यः' तत्त्व बतलाया है, उसकी क्या दशा होगी ? वे कहते हैं, कि अध्यात्म-दृष्टिसे सिद्ध होनेवाला धर्मका नित्यत्व केवल कल्पनाप्रसूत है और प्रत्येक समाजकी स्थितिके अनुसार उस समयमे "अधिकांश लोगोंके अधिक सुख"-वाले तत्त्वसे जो नीतिधर्म प्राप्त होंगे, वेही चोखे नीति- नियम हैं। परंतु यह युक्तिवाद ठीक नहीं है। भूमितिशास्त्रके नियमानुसार यदि कोई बिना चौड़ाईके सरल रेखा अथवा सर्वांशमें निर्दोष गोलाकार न खींच सके, तो जिस प्रकार इतनेहीसे सरल रेखाकी अथवा शुद्ध गोलाकारकी शास्त्रीय व्याख्या गलत या निरर्थक नहीं हो जाती, उसी प्रकार सरल और शुद्ध नियमोंकी बात है। जबतक किसी बातके परमावधिके शुद्ध स्वरूपका निश्चय पहले न कर लिया जावे, तबतक व्यवहारमें दीख पड़नेवाली उस बातकी अनेक सूरतोंमें सुधार करना अथवा सार-असारका विचार करके अंतमें उसके तारतम्यको पहचान लेनाभी संभव नहीं है। और यही कारण है, कि जो सराफ़ पहलेही निर्णय करता है, कि पूर्ण शुद्ध सोना कौन-सा है ? दिशाप्रदर्शक ध्रुवमत्स्य यंत्र अथवा ध्रुव नक्षत्रकी ओर दुर्लक्षकर अपार महोदधिकी लहरों और वायुकेही तारतम्यको देखकर यदि जहाजके खलासी बराबर अपने जहाजकी पतवार घुमाने लगें, तो उनकी जो स्थिति होगी, वही स्थिति नीति-नियमोंके परमावधिके स्वरूपपर ध्यान न देकर केवल देशकालके अनुसार बर्तनेवाले मनुष्योंकी होनी चाहिये। अतएव यदि निरी आधिभौतिक- दृष्टिसेही विचार करें, तोभी यह पहले अवश्य निश्चित कर लेना पड़ता है, कि ध्रुव जैसा अटल और नित्य नीति-तत्त्व कौन-सा है ? और इस आवश्यकताको एक बार मान लेनेसेही सारा आधिभौतिक पक्ष लँगड़ा हो जाता है। क्योंकि सुखदुःख

सिद्धावस्था और व्यवहार ३७९ आदि सभी विषयोपभोग नामरूपात्मक हैं। अतएव ये अनित्य और विनाशवान् मायाकीही सीमामें रह जाते हैं। इसलिये केवल इन्हीं बाह्य प्रमाणोंके आधारसे सिद्ध होनेवाला कोईभी नीति-नियम नित्य नहीं हो सकता। आधिभौतिक बाह्य सुखदुःखकी कल्पना जैसे जैसे बदलती जावेगी, वैसेही वैसे उसकी बुनियादपर रचे हुए नीतिधर्मोंकोभी बदलते रहना चाहिये। अतः नित्य बदलती रहनेवाली नीति-धर्मकी इस स्थितिको टालनेके लिये माया-सृष्टिके विषयोपभोग छोड़कर नीति-धर्मकी इमारत इस "सब भूतोंमें एक आत्मा"-वाले अध्यात्मज्ञानके मजबूत आधार- परही खड़ी करनी पड़ती है। क्योंकि पीछे नवें प्रकरणमें कह चुके हैं, कि आत्माको छोड़ जगतमें दूसरी कोईभी वस्तु नित्य नहीं है। यही तात्पर्य व्यासजीके इस वचनका है, कि "धर्मो नित्यः सुखदुःख त्वनित्ये" - नीति अथवा सदाचरणके धर्म नित्य हैं; और सुखदुःख अनित्य हैं। यह सच है, कि दुष्ट और लोभियोंके समाजमें अहिंसा एवं सत्य प्रभृति नित्य नीति-धर्म पूर्णतासे पाले नहीं जा सकते; पर उसका दोष इन नित्य नीति-धर्मोंको देना उचित नहीं है। सूर्यकी किरणोंसे किसी पदार्थकी परछाई चौरस मैदानपर सपाट और ऊँचे-नीच स्थानपर ऊँची-नीची पडती देख जैसे यह अनुमान नहीं किया जा सकता, कि वह परछाई मूलमेंही ऊँची-नीची होगी; उसी प्रकार जब कि दुष्टोंके समाजमें नीति-धर्मका पराकाष्ठाका शुद्ध स्वरूप नहीं पाया जाता, तब यह नहीं कह सकते, कि अपूर्णावस्थाके समाजमें पाया जानेवाला नीति-धर्मका अपूर्ण स्वरूपही मुख्य अथवा मूलका है। यह दोष समाजका है, नीतिका नहीं। इसीसे चतुर पुरुष शुद्ध और नित्य नीति-धर्मोंसे झगड़ा न मचा कर ऐसे प्रयत्न किया करते हैं, कि जिनसे समाज ऊँचा उठता हुआ पूर्णावस्था में जा पहुँचे। लोभी मनुष्योंके समाजमें इस प्रकार बर्तते समय नित्य नीति-धर्मोंके कुछ अपवाद यद्यपि अपरिहार्य मानकर हमारे शास्त्रकारोंने बतलाये हैं, तथापि उसके लिये वे प्राय- श्चित्तभी बतलाते हैं। परंतु पश्चिमी आधिभौतिक नीतिशास्त्र इन्हीं अपवादोंको मूछोंपर ताव देकर प्रतिपादन करते हैं, एवं इन प्रतिवादोंका निश्चय करते समय, वे उपयोगमें आनेवाले बाह्य फलोंके तारतम्यके तत्वकोही भ्रमसे नीतिका मूल तत्त्व मानते हैं। अब पाठक समझ जायेंगे, कि पिछले प्रकरणोंमें हमने ऐसा भेद क्यों दिखलाया है ? यह बतला दिया, कि स्थितप्रज्ञ ज्ञानी पुरुषकी बुद्धि और उसका बर्तावही नीतिशास्त्रका आधार है। एवं यहभी बतला दिया, कि उससे निकलनेवाले नीति- नियमोंको - उनके नित्य होनेपरभी - समाजकी अपूर्णावस्थामें थोड़ा-बहुत बदलना पड़ता है; तथा इस रीतिसे बदले जाने परभी नीतिनियमोंकी नित्यतामें उस परि- वर्तनसे कोई बाधा क्यों और कैसे नहीं आती। अब उस पहले प्रश्नका विचार करते हैं, कि स्थितप्रज्ञ ज्ञानी पुरुष अपूर्णावस्थाके समाजमें जो बर्ताव करता है, उसका मूल अथवा बीज-तत्त्व क्या है ? चौथे प्रकरणमें कह चुके हैं, कि यह विचार दो प्रकारसे

किया जा सकता है। एक तो कर्ताकी बुद्धिको प्रधान मानकर और दूसरा उसके बाहरी बर्तावसे । इनमेंसे यदि केवल दूसरीही दृष्टिसे विचार करें, तो विदित होगा कि, स्थितप्रज्ञ जो जो व्यवहार करते हैं, वे प्रायः सब लोगोंके हितकेही होते हैं। गीतामें दो बार कहा गया है, कि परम ज्ञानी सत्पुरुष "सर्वभूतहिते रताः" - प्राणिमात्रके कल्याणमें निमग्न रहते हैं ( गीता ५. २५; १२.४); और महा- भारतमेंभी यही अर्थ अन्य कई स्थानोंमें आया है। हम ऊपर कह चुके हैं, कि स्थित- प्रज्ञ सिद्ध पुरुष अहिंसा आदि जिन नियमोंका पालन करते हैं, वही धर्म अथवा सदा- चारका नमूना है। इन अहिंसा आदि नियमोंका प्रयोजन अथवा इस धर्मका लक्षण बतलाते हुए महाभारतमें धर्मका बाहरी उपयोग दिखलानेवाले ऐसे अनेक वचन हैं - "अहिंसा सत्यवचनं सर्वभूतहितं परम्" ( वन. २०६. ७३ ) - अहिंसा और सत्य भाषण, ये नीति-धर्म प्राणिमात्रके हितके लिये हैं। "धारणाद्धर्ममित्याहुः" ( शां. १०९. १२) - जगतका धारण करनेसे धर्म है। "धर्म हि श्रेय इत्याहुः" ( अनु. १०५. १४) - कल्याणही धर्म है। "प्रभवार्थाय भूतानां धर्मप्रवचनं कृतम्" ( शां. १०९. १० ) - लोगोंके अभ्युदयके लियेही धर्म-अधर्मशास्त्र बना है; अथवा "लोकयात्रार्थमेवेह धर्मस्य नियमः कृतः । उभयत्र सुखोदर्कः" ( शां. २५८. ४) - धर्म-अधर्मके नियम इसलिये रचे गये हैं, कि उनसे लोकव्यवहार चले; और दोनों लोकोंमें कल्याण हो । इसी प्रकार कहा है, कि धर्म-अधर्म-संशयके समय ज्ञानी पुरुषकोभी लोकयात्रा च द्रष्टव्या धर्मश्चात्महितानि च । "लोकव्यवहार, नीतिधर्म और अपना कल्याण - इन बाहरी बातोंका तारतम्यसे विचार करके" ( अनु. ३७. १६; वन २०५. ९० ) फिर जो कुछ करना हो, उसका निश्चय करना चाहिये; और वनपर्वमें राजा शिबीने धर्म-अधर्मके निर्णयार्थ इसी युक्तिका उपयोग किया है ( वन. १३१. ११, १२ ) । इन वचनोंसे प्रकट होता है, कि समाजका उत्कर्षही स्थितप्रज्ञके व्यवहारकी 'बाह्य नीति' होती है। और यदि यह ठीक है, तो आगे सहजही यह प्रश्न उत्पन्न होता है, कि आधिभौतिक- वादियोंके इस "अधिकांश लोगोंके अधिक सुख अथवा ( सुख शब्दको व्यापक करके ) हित या कल्याण "वाले नीति-तत्त्वको अध्यात्मवादीभी क्यों नहीं स्वीकार कर लेते ? चौथे प्रकरणमें हमने दिखला दिया हैं, कि इस "अधिकांश लोगोंके अधिक सुख" सूत्रमें बुद्धिके आत्मप्रसादसे होनेवाले सुखका अथवा उन्नतिका और पार- लौकिक कल्याणका अंतर्भाव नहीं होता, - इसमें यह बड़ा भारी दोष है। किंतु 'सुख' शब्दका अर्थ अधिक व्यापक करके यह दोष अनेक अंशोंमें निकाल डाला जा सकेगा; और नीति-धर्मकी नित्यताके संबंधमें ऊपरही दी हुई आध्यात्मिक उप- पत्तिभी कई लोगोंको विशेष महत्त्वकी जँचेगी। इसलिये नीतिशास्त्रके अध्या- त्मिक और आधिभौतिक मार्गोंमें जो महत्त्वका भेद है, उसका यहाँ और थोड़ासा स्पष्टीकरण कर देना आवश्यक है।

सिद्धावस्था और व्यवहार ३८१ नीतिकी दृष्टिसे किसी कर्मकी योग्यता अथवा अयोग्यताका विचार दो प्रकारोंमें किया जाता है :- ( १ ) उस कर्मका केवल बाह्य फल देख कर अर्थात् यह देख कर कि उसका दृश्य परिणाम जगत्पर क्या हुआ है या होगा ? ( २ ) यह देख कर, कि उस कर्मको करनेवालेकी बुद्धि अर्थात् वासना कैसी है ? पहलेको आधिभौतिक मार्ग कहते हैं। दूसरेके फिर दो पक्ष होते हैं; और इन दोनोंके पृथक् पृथक् नाम हैं। ये सिद्धान्त पिछले प्रकरणोंमें बतलाये जा चुके हैं, कि शुद्ध कर्म होनेके लिये वासनात्मक बुद्धि शुद्ध रखनी पड़ती है और वासनात्मक बुद्धि शुद्ध रखनेके लिये व्यवसायात्मका अर्थात् कार्य-अकार्यका निर्णय करनेवाली बुद्धिभी स्थिर, सम और शुद्ध रहनी चाहिये। इन सिद्धान्तोंके अनुसार किसीकेभी कर्मोंकी शुद्धता जाँचनेके लिये देखना पड़ता है, कि उसकी वासनात्मक बुद्धि शुद्ध है या नहीं ? और वासनात्मक बुद्धिकी शुद्धता जाँचने लगे, तो अंतमें देखनाही पड़ता है, कि व्यवसा- यात्मका बुद्धि शुद्ध है या अशुद्ध ? सारांश, कर्ताकी बुद्धि अर्थात् वासनाकी शुद्धताका निर्णय अंतमें व्यवसायात्मका बुद्धिकी शुद्धतामे करना पड़ता है ( गीता २. ४१ ) । इसी व्यवसायात्मक बुद्धिको सदसद्विवेचन-शक्तिके रूपमें स्वतंत्र देवता मान लेनेसे वह आधिदैविक मार्ग हो जाता है। परंतु यह बुद्धि स्वतंत्र दैवत नहीं है; किंतु आत्माका एक अंतरिंद्रिय है, अतः बुद्धिको प्रधानता न देकर, आत्माको प्रधान मान करके वासनाकी शुद्धताका विचार करनेसे यह नीतिके निर्णयका आध्यात्मिक मार्ग हो जाता है। हमारे शास्त्रकारोंका मत है, कि इन सब मार्गोंमें आध्यात्मिक मार्ग श्रेष्ठ है; और प्रसिद्ध जर्मन तत्त्ववेत्ता कांटने यद्यपि ब्रह्मात्मैक्यका सिद्धान्त स्पष्ट रूपसे नहीं दिया है, तथापि उसने अपने नीतिशास्त्रके विवेचनका आरंभ शुद्ध-बुद्धिसे अर्थात् एक प्रकारसे अध्यात्म-दृष्टिसेही किया है, एवं उसने इसकी पूर्ण उपपत्तिभी दी है, कि ऐसा क्यों करना चाहिये। * ग्रीनका अभिप्रायभी ऐसाही है; परंतु इस विषयका पूरा विवेचन इस छोटे-से ग्रंथमें नहीं किया जा सकता। हम चौथे प्रकरणमें दो-एक उदाहरण देकर स्पष्ट दिखला चुके हैं, कि नीति-तत्त्वोंका पूरा निर्णय करनेके लिये कर्मके बाहरी फलकी अपेक्षा कर्ताकी शुद्ध-बुद्धिपर विशेष ध्यान क्यों देना पड़ता है, और इस संबंधमें अधिक विचार आगे - पंद्रहवें प्रकरणमें पाश्चात्य और पौरस्त्य नीति-मार्गोंकी तुलना करते समय - किया जावेगा। अभी इतनाही कहते हैं, कि कोईभी कर्म तभी होता है, जब कि पहले उस कर्मको करनेकी बुद्धि उत्पन्न हो, इसलिये कर्मकी योग्यता-अयोग्यताका विचारभी सभी अंशोंमें बुद्धिकी शुद्धता- अशुद्धताके विचारपरही अवलंबित रहता है। बुद्धि बुरी होगी; तो कर्मभी बुरा होगा, परंतु केवल बाह्य कर्मके बुरे होनेसेही यह अनुमान नहीं किया जा सकता,

* Kant's Theory of Ethics, trans. by Abbott. 6th Ed. especially Metaphysics of Morals therein.

३८२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कि बुद्धिभी बुरी होनीही चाहिये। क्योंकि भूलसे, कुछ-का-कुछ समझ लेनेसे अथवा अज्ञानसेभी वैसा कर्म हो सकता है; और फिर उसे नीतिशास्त्रकी दृष्टिसे बुरा नहीं कह सकते । “अधिकांश लोगोंके अधिक सुख”-वाला नीतिशास्त्र-तत्त्व केवल बाहरी परिणामोंके लियेही उपयोगी होता है; और जब कि इन सुखदुःखात्मक बाहरी परिणामोंको निश्चित रीतिसे मापनेका बाहरी साधन अब तक नहीं मिला है, तब नीति-तत्त्वोंकी इस कसौटीमे सदैव यथार्थ निर्णय होनेका भरोसाभी नहीं किया जा सकता । इसी प्रकार मनुष्य कितनाही सयाना क्यों न हो जाय, यदि उसकी बुद्धि पूर्ण शुद्ध न हो गई हो, तो यह नहीं कह सकते, कि वह प्रत्येक अवसरपर धर्मसेही बर्तेगा । विशेषतः जहाँ उसका स्वार्थ आ डटा, वहाँ तो फिर कहनाही क्या है ? – “स्वार्थे सर्वे विमुह्यन्ति येऽपि धर्मविदो जनाः” (मभा. वि. ५१. ४)। सारांश, मनुष्य कितनाही बड़ा ज्ञानी, धर्मवेत्ता और सयाना क्यों न हो, किन्तु यदि उसकी बुद्धि प्राणिमात्रमें सम न हो गई हो, तो यह नहीं कह सकते; कि उसका कर्म सदैव शुद्ध अथवा नीतिकी दृष्टिसे निर्दोषही रहेगा । अतएव हमारे शास्त्रकारोने निश्चित कर दिया है, कि नीतिका विचार करते समय कर्मके बाह्य फलकी अपेक्षा कर्ताकी बुद्धिकाही प्रधानतासे विचार करना चाहिये । साम्य-बुद्धिही अच्छे बर्तावका चोखा बीज है। यही भावार्थ भगवद्गीताके इस उपदेशमेंभी है ( गीता २. ४९ ) :- दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय । बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥ कुछ लोग, इस श्लोकमें, बुद्धिका अर्थ ज्ञान समझकर कहते हैं, कि इसमें कर्म और ज्ञान, इन दोनोंमेंसे ज्ञानकोही श्रेष्ठता दी है। पर हमारे मतमें यह अर्थ ठीक नहीं है। इस स्थलपर शांकरभाष्यमेंभी 'बुद्धियोग'का अर्थ 'समत्व बुद्धियोग' दिया हुआ है; और यह श्लोक कर्मयोगके प्रकरणमें आया है। अतएव वास्तवमें इसका अर्थ कर्मप्रधानही करना चाहिये; और वही सरल रीतिसेही है। कर्म करनेवाले लोग दो प्रकारके होते हैं। पहले प्रकारके फलपर – उदाहरणार्थ, उससे कितने लोगोंको कितना सुख होगा, इसपर – दृष्टि जमा कर कर्म करते हैं; और दूसरे बुद्धिको सम और निष्काम रखकर कर्म करते हैं – फिर कर्मधर्म-संयोगसे उससे जो परिणाम होना हो, सो हुआ करे। इनमेंसे 'फलहेतवः' अर्थात् “फलपर दृष्टि रखकर कर्म करनेवाले” लोगोंको नैतिक दृष्टिसे कृपण अर्थात् कनिष्ठ श्रेणीके बतलाकर, समत्व- बुद्धिसे कर्म करनेवालोंको इस श्लोकमें श्रेष्ठता दी है। इस श्लोकके पहले दो चरणोंमें जो यह कहा है, कि “दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय” – हे धनंजय !

  • इस श्लोकका सरल अर्थ यह है – “हे धनंजय ! (सम-) बुद्धिके योगकी अपेक्षा (कोरा) कर्म बिलकुलही निकृष्ट है। अतएव (सम-) बुद्धिकाही आश्रय कर। फलपर दृष्टि रखकर कर्म करनेवाले (पुरुष) कृपण अर्थात् ओछे दर्जेके है।”

सिद्धावस्था और व्यवहार ३८३ समत्व बुद्धियोगकी अपेक्षा (कोरा) कर्म अत्यंत निकृष्ट है - उसका तात्पर्य यही है; और जब अर्जुनने यह प्रश्न किया, कि "भीष्म-द्रोणको कैसे मारूं?", तब उसको यही उत्तर दिया गया। इसका भावार्थ यह है, कि मरने या मारनेकी निरी क्रियाकी ओर ध्यान न देकर, देखना चाहिये, कि "मनुष्य किस बुद्धिसे उस कर्मको करता है?" अतएव इस श्लोकके तीसरे चरणमें उपदेश है,कि "तू बुद्धि अर्थात् सम-बुद्धिकी शरण जा;" और आगे उपसंहारात्मक अठारहवें अध्यायमेंभी भगवानने फिर कहा है, कि "बुद्धियोगका आश्रय करके तू अपने कर्म कर।" गीताके दूसरे एक श्लोकसेभी व्यक्त होता है, कि गीता निरे कर्मके विचारको कनिष्ठ समझकर, उस कर्मकी प्रेरक बुद्धिकेही विचारको श्रेष्ठ मानती है। अठारहवें अध्यायमें कर्मके भले बुरे - अर्थात् सात्त्विक, राजस और तामस - भेद बतलाये गये हैं। यदि केवल कर्मफलकी ओरही गीताकी दृष्टि होती, तो भगवानने यह कहा होता, कि जो कर्म बहुतेरोंको सुखदायक हो, वही सात्त्विक है। परंतु ऐसा न बतलाकर, अठारहवें अध्यायमें कहा है, कि "फलाशा छोड़कर निस्संग-बुद्धिसे किया हुआ कर्म सात्त्विक अथवा उत्तम है" (गीता १८. २३)। अर्थात् इससे प्रकट होता है, कि कर्मके बाह्य फलकी अपेक्षा कर्ताकी निष्काम, सम और निस्संग-बुद्धिकोही कर्म-अकर्मका विवेचन करनेमें गीता अधिक महत्त्व देती है। यही न्याय स्थितप्रज्ञके व्यवहारके लिये उपयुक्त करनेसे होता है, कि स्थितप्रज्ञ जिस साम्य-बुद्धिसे अपनी बराबरीवाले, छोटे और साधारण लोगोंके साथ बर्तता है, वह साम्य-बुद्धिही उसके आचरणका मुख्य तत्त्व है; और इस आचरणसे जो प्राणिमात्रका मंगल होता है, वह इस साम्य-बुद्धिका निरा बाहरी और आनुषंगिक परिणाम है। ऐसेही जिसकी बुद्धि पूर्णावस्थागें पहुँच गई हो, वह लोगोंको केवल आधिभौतिक सुख प्राप्त करा देनेके लियेही अपने सब व्यवहार न करेगा। यह ठीक है, कि वह दूसरोंका नुकसान न करेगा, पर यह उसका मुख्य ध्येय नहीं है। स्थितप्रज्ञ ऐसे प्रयत्न किया करता है, जिनसे समाजके लोगोंकी बुद्धि अधिकाधिक शुद्ध होती जावें; और अंतमें वे लोग अपने समानही आध्यात्मिक पूर्णावस्थामें जा पहुँचे। मनुष्यके कर्तव्योंमेंसे यही श्रेष्ठ और सात्त्विक कर्तव्य है। केवल आधिभौतिक सुख-वृद्धिके प्रयत्नोंको हम गौण अथवा राजस समझते हैं। गीताका सिद्धान्त है, कि कर्म-अकर्मके निर्णयार्थ कर्मके बाह्य फलपर ध्यान न देकर, कर्ताकी शुद्ध-बुद्धिकोही प्रधानता देनी चाहिये। इसपर कुछ लोगोंका यह तर्कपूर्ण मिथ्या आक्षेप है, कि यदि कर्मफलको न देखकर केवल शुद्ध-बुद्धिकाही इस प्रकार विचार करें, तो मानना होगा, कि शुद्ध-बुद्धिवाला मनुष्य कोईभी बुरा काम कर सकता है! और तब तो वह सभी बुरे कर्म करनेके लिये स्वतंत्र हो जायेगा। इस आक्षेपको हमने केवल अपनीही कल्पनाके बलसे नहीं घर घसीटा है; किंतु गीता-धर्मपर कुछ पादड़ो बहादुरोंके किये हुए इस ढंगके आक्षेप हमारे देखनेमेंभी

३८४ सिद्धावस्था और व्यवहार

आये हैं।* किंतु हमें यह कहनेमें कोईभी दिक्कत नहीं जान पड़ती, कि ये आरोप या आक्षेप बिलकुल मूर्खताके अथवा दुराग्रहके हैं। और यह कहनेमेंभी कोई हानि नहीं है, कि आफ़ीकाका कोई काला-कलूट जंगली मनुष्य सुधरे हुए राष्ट्रके नीति- तत्त्वोंका आकलन करनेमें जिस प्रकार अपात्र और असमर्थ होता है, उसी प्रकार इन भले पादड़ी मानवोंकी बुद्धि वैदिक धर्मके स्थितप्रज्ञकी आध्यात्मिक पूर्णावस्थाका निरा आकलन करनेमेंभी, स्वधर्मके व्यर्थ दुराग्रह अथवा और कुछ ओछे एवं दुष्ट मनोविकारोंसे, असमर्थ हो गई है। उन्नीसवीं सदीके प्रसिद्ध जर्मन तत्त्वज्ञानी कांटने अपने नीतिशास्त्रविषयक ग्रंथमें अनेक स्थलोंपर लिखा है, कि कर्मके बाहरी फलको न देखकर नीतिके निर्णयार्थ कर्ताकी बुद्धिकाही विचार करना उचित है। § किंतु हमने नहीं देखा, कि कांटपर किसीने ऐसा आक्षेप किया हो। फिर वह गीताके नीति- तत्त्वकोही उपयुक्त कैसे होगा ? प्राणिमात्रमें समबुद्धि होतेही परोपकार करना तो देहका स्वभावही बन जाता है; और ऐसा हो जानेपर परम ज्ञानी एवं परम शुद्ध-बुद्धि- वाले मनुष्यके हाथसे कुकर्म होना उतनाही असंभव है, जितना कि अमृतसे मृत्यु हो जाना। कर्मके बाह्य फलका विचार न करनेके लिये जब गीता कहती है, तब उसका यह अर्थ नहीं है, कि जो दिलमें आ जाय, सो किया करो। प्रत्युत गीता कहती है, कि बाहरी परोपकार करनेका स्वाँग पाखंडसे या लोभसे बना सकता है किंतु प्राणिमात्रमें एक आत्माको पहचाननेसे बुद्धिमें जो स्थिरता और समता आ जाती है, उसका स्वाँग कोई नहीं बना सकता; तब किसीभी कामकी योग्यता-अयोग्यताका विचार करते समय कर्मके बाह्य परिणामकी अपेक्षा कर्ताकी बुद्धिपर योग्य दृष्टि रखनी चाहिये। गीताका संक्षेपमें यह सिद्धान्त कहा जा सकता है, कि कोरे जड़ कर्मोंमेंही नीति-तत्त्व नहीं; किंतु कर्ताकी बुद्धिपर वह सर्वथा अवलंबित रहता है। आगे गीतामेंही ( गीता १८. २५) कहा है, कि इस आध्यात्मिक सिद्धान्तके ठीक तत्त्वको न समझकर यदि


* कलकत्तेके एक पादड़ीकी ऐसी करतूतका उत्तर मिस्टर ब्रूक्सने दिया है, जो कि उनके Kurukshetra (कुरुक्षेत्र) नामक छपे हुए निबंधके अंतमें है; उसे देखिये ( Kurukshetra - Vyasasharma, Adyar, Madras, pp. 48--52 ). § "The second proposition is : That an action done from duty derives its moral worth not from the purpose which is to be attained by it, but from the maxim by which it is determined." .. The moral worth of an action "cannot lie anywhere but in the principle of the will, without regard to the ends which can be attained by action. " Kant's Metaphysics of Morals (trans. by Abbott in Kant's Theory of Ethics, p. 16. (The italics are author's and not our own) And again "When the question is of moral worth, it is not with the action; which we see that we are concerned; but with those inward principles of them which we do not see." p. 24 - Ibid.

सिद्धावस्था और व्यवहार ३८५ कोई मनमानी करने लगे, तो उस पुरुषको राक्षस या तामसी बुद्धिवाला कहना चाहिये । एक बार सम-बुद्धि हो जानेसे, फिर उस पुरुषको कर्तव्य-अकर्तव्यका और अधिक उपदेश नहीं करना पड़ता - इसी तत्त्वपर ध्यान देकर साधु तुकारामने शिवाजी महाराजको जो यह उपदेश किया, कि "इसका एकही कल्याणकारक अर्थ है, कि प्राणिमात्रमें एक आत्माको देखो", उसमेंभी भगवद्गीताके अनुसार कर्मयोगका एकही तत्त्व बतलाया गया है (तु. गा. ४४२८. ९१) । यहाँ फिरभी कह देना उचित है, कि यद्यपि पूर्ण साम्य-बुद्धिही सदाचारका बीज हो, तथापि इससे यहभी अनुमान न करना चाहिये, कि जबतक इस प्रकारकी पूर्ण शुद्ध-बुद्धि न हो जावे, तब- तक कर्म करनेवाला चुपचाप हाथपर हाथ धरे बैठा रहे । स्थितप्रज्ञके समान बुद्धि करलेना तो परम ध्येय है । परंतु गीताके आरंभमेंही (गीता २.४०) यह उपदेश किया है, कि इस परम ध्येयके पूर्णतया सिद्ध होनेतक प्रतीक्षा न करके जितना हो सके उतनाही, निष्काम बुद्धिसे प्रत्येक मनुष्य अपने कर्म करता रहे, इसीसे बुद्धि अधिक शुद्ध होती चली जायगी; और अंतमें पूर्ण सिद्धि हो जायगी । ऐसा आग्रह करके समयको मुक्त न गँवा दे, कि जबतक पूर्ण सिद्धि पा न जाऊँगा, तबतक कर्म करूँगाही नहीं । 'सर्वभूतहित' अथवा "अधिकांश लोगोंके अधिक कल्याण "वाला नीति-तत्त्व केवल बाह्य कर्म उपयुक्त होनेके कारण शाखाग्राही और कृपण है, परंतु "प्राणिमात्रमें एक आत्मा "वाली - स्थितप्रज्ञकी 'साम्यबुद्धि' मूलग्राही है; और उसीको नीति- निर्णयके काममें श्रेष्ठ मानना चाहिये - इस प्रकार यद्यपि यह बात सिद्ध हो चुकी; तथापि इसपर अनेकोंके आक्षेप हैं, कि इस सिद्धान्तसे व्यावहारिक बर्तावकी उपपत्ति ठीक ठीक नहीं लगती । ये आक्षेप प्रायः संन्यास-मार्गी स्थितप्रज्ञके संसारी व्यवहारको देखकरही इन लोगोंको सूझे हैं। किंतु थोडासा विचार करनेसे किसीकोभी सहजही दीख पड़ेगा, कि ये आक्षेप स्थितप्रज्ञ कर्मयोगीके बर्तावको उपयुक्त नहीं होते । और तो क्या ? यहभी कह सकते हैं, कि प्राणिमात्रमें एक आत्मा अथवा आत्मौपम्य बुद्धिके तत्त्वसे व्यावहारिक नीति-धर्मकी जैसी अच्छी उपपत्ति लगती है, वैसी और किसीभी तत्त्वसे नहीं लगती । उदाहरणके लिये सब देशोंमें और सब नीतिशास्त्रोंमें प्रधान माने गये परोपकार धर्मकोही लीजिये । "दूसरेका आत्माही मेरा आत्मा है" इस अध्यात्म-तत्त्वसे परोपकार-धर्मकी जैसी उपपत्ति लगती है, वैसी किसीभी आधि- भौतिक वादसे नहीं लगती । बहुत हुआ तो, आधिभौतिकशास्त्र इतनाही कह सकते हैं, कि परोपकार-बुद्धि एक नैसर्गिक गुण है; और वह उत्क्रांतिवादके अनुसार बढ़ रहा है । किंतु इतनेसेही परोपकारकी नित्यता सिद्ध नहीं हो जाती । यही नहीं; बल्कि स्वार्थ और परार्थके झगड़ेमें, इन दोनों घोड़ोंपर सवार होनेके लालची चतुर स्वार्थियो- कोभी अपना मतलब गाँठनेमें इसके कारण अवसर मिल जाता है, यह बात हम चौथे प्रकरणमें बतला चुके हैं। इसपरभी कुछ लोग कहते हैं, कि परोपकार-बुद्धिकी नित्यता गी. र. २५

३८६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सिद्ध करनेसे लाभही क्या है ? प्राणिमात्रमें एकही आत्मा मानकर यदि प्रत्येक पुरुष सदैव प्राणिमात्रकाही हित करने लग जाय, तो उसका जीवन-निर्वाह कैसे होगा ? और जब वह इस प्रकार अपनाही योगक्षेम नहीं चला सकेगा तब वह और लोगोंका कल्याण करही कैसे सकेगा ? लेकिन ये शंकाएँ न तो नईही हैं; और न ऐसी हैं, कि जो टाली न जा सकें । भगवानने गीतामेंही इस प्रश्नका यों उत्तर दिया है – “ तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ” ( गीता. ९. २२ ) ; और अध्यात्मशास्त्रकी युक्तियोंसेभी यही अर्थ निष्पन्न होता है । जिसे लोककल्याण करनेकी बुद्धि हो गई उसे खाना-पीना नहीं छोड़ना पड़ता, परंतु उसकी बुद्धि ऐसी होनी चाहिये, कि मैं लोकोपकारके लियेही देह धारण करता हूँ। जनकने कहा है ( मभा. अश्व. ३२ ), कि जब ऐसी बुद्धि रहेगी, तभी इंद्रियाँ वशमें रहेंगी; और लोककल्याण होगा । और मीमांसकोंके इस सिद्धान्तका तत्त्वभी यही है, कि यज्ञ करके शेष बचा हुआ अन्न ग्रहण करनेवालेको 'अमृताशी' कहना चाहिये (गीता ४. ३१) । क्योंकि उनकी दृष्टिसे जगतका धारण-पोषण करनेवाला कर्मही यज्ञ है । अतएव यह लोककल्याण- कारक कर्म करते समय उसीसे अपना निर्वाह होता है; और करनाभी चाहिये । उनका निश्चय है, कि अपने स्वार्थके लिये यज्ञचक्रको डुबा देना अच्छा नहीं है । दासबोधमें ( १९. ४. १० ) श्रीसमर्थ रामदास स्वामीनेभी वर्णन किया है, कि “ वह परोपकार करताही रहता है, जिसकी सबको जरूरत बनी रहती है । ऐसी दशामें उसे भूमंडलमें किस बातकी कम रह सकती है ?” व्यवहारकी दृष्टिसे देखे, तोभी यही ज्ञात होता है, कि यह उपदेश बिलकुल यथार्थ है । सारांश, जगतमें देखा जाता है, कि लोककल्याणमें जुटे रहनेवाले पुरुषका योगक्षेम कभी अटकता नहीं है । केवल परोपकार करनेके लिये उसे निष्काम बुद्धिसे तैयार रहना चाहिये । एक बार इस भावनाके दृढ़ हो जानेपर, कि “ सभी लोग मुझमें हैं और मैं सब लोगोंमें हूँ ”, फिर यह प्रश्नही नहीं हो सकता, कि परार्थ स्वार्थ भिन्न है या नहीं । 'मैं' पृथक् और 'लोग' पृथक् इस आधिभौतिक द्वैत-बुद्धिसे “ अधिकांश लोगोंके अधिक सुख ” करनेके लिये जो प्रवृत्त होता है, उसके मनमें ऊपर लिखी हुई भ्रामक शंकाएँ उत्पन्न हुआ करती हैं । परंतु जो “ सर्वं खल्विदं ब्रह्म ” इस अद्वैत-बुद्धिसे परोपकार करनेके लिये प्रवृत्त हो जाय, उसे यह शंकाही नहीं रहती । सर्वभूतात्मैक्य-बुद्धिसे निष्पन्न होनेवाले सर्वभूतहितके इस आध्यात्मिक तत्त्वमें, और स्वार्थ एवं परार्थरूपी द्वैतके अर्थात् अधिकांश लोगोंके सुखके तारतम्यसे निकलनेवाले लोककल्याणके आधिभौतिक तत्त्वमें इतनाही भेद है, जो ध्यान देने योग्य है । साधु पुरुष मनमें लोककल्याण करनेका हेतु रखकर, लोककल्याण नहीं किया करते । जिस प्रकार प्रकाश फैलाना सूर्यका स्वभाव है, उसी प्रकार ब्रह्मज्ञानसे मनमें सर्वभूतात्मैक्यका पूर्ण परिचय हो जानेपर लोककल्याण करना तो इन साधु-पुरुषोंका सहज स्वभाव हो जाता है । और ऐसा स्वभाव बन जानेपर सूर्य जैसे दूसरोंको प्रकाश देता हुआ अपने आपको प्रकाशित

सिद्धावस्था और व्यवहार ३८७ कर लेता है, वैसेही साधुपुरुषोंके परार्थ उद्योगसेही उनका योगक्षेमभी आपही-आप सिद्ध होता है। परोपकार करनेके इस देह-स्वभाव और अनासक्त बुद्धिके एकत्र हो जानेपर कितनेही संकट क्यों न चले आवें, तोभी उनकी बिलकुल परवाह न कर और यह न सोच कर, कि संकटोंको सहना भला है, या लोककल्याणको छोड़ देना भला है, ब्रह्मात्मैक्य बुद्धिवाले साधुपुरुष, अपना कार्य सदा जारी रखते है। तथा यदि प्रसंग आ जाय तो आत्मबलिभी दे देनेके लिये तैयार रहते हैं, उन्हें उसकी कुछभी चिंता नही होती। किंतु जो लोग स्वार्थ और परार्थको दो भिन्न वस्तुएँ समझ, उन्हें तराजूके दो पलड़ोंमें डाल काँटेका झुकाव देखकर धर्म-अधर्मका निर्णय करना सीखे हुए हैं, उनकी लोककल्याण करनेकी इच्छाका इतना तीव्र हो जाना कदापि संभव नहीं है। अतएव प्राणिमात्रके हितका तत्त्व यद्यपि भगवद्गीताको संमत है, तथापि उसकी उपपत्ति अधिकांश लोगोंके अधिक बाहरी सुखोंके तारतम्यसे नहीं लगाई है; किंतु लोगोंकी संख्या अथवा उनके सुखोंकी न्यूनाधिकताके विचारोंको आगंतुक अतएव कृपण कहा है; तथा शुद्ध व्यवहारकी मूलभूत साम्य-बुद्धिकी उपपत्ति गीतामें अध्यात्मशास्त्रके नित्य ब्रह्मज्ञानके आधारपर बतलाई है। इससे दीख पड़ेगा, कि प्राणिमात्रके हितार्थ उद्योग करने या लोककल्याण अथवा परोपकार करनेकी युक्तिसंगत उपपत्ति अध्यात्म-दृष्टिसे क्योंकर लगती है ? अब समाजमें एक दूसरेके साथ बर्तनेके संबंधमें साम्य-बुद्धिकी दृष्टिसे हमारे शास्त्रोंमें जो मूल नियम बतलाये गये, हैं, उनका विचार करते हैं। "यत्र वा अस्य सर्वमात्मैवा भूत्" (बृह. २. ४. १४) - जिसे सर्व आत्ममय हो गया, वह साम्य-बुद्धिसेही सबके साथ बर्तता है, यह तत्त्व बृहदारण्यकके सिवा ईशावास्य (ईश. ६) और कैवल्य (कै. १. १०) उपनिषदोंमें तथा मनुस्मृतिमेंभी (मनु. १२. ९१, १२५) है। एवं इसी तत्त्वका गीताके छठे अध्यायमें (गीता ६. २९) "सर्वभूतस्थ- मात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि"के रूपमें अक्षरशः उल्लेख है। सर्वभूतात्मैक्य अथव- साम्य-बुद्धिके इसी तत्त्वका रूपांतर आत्मौपम्य-दृष्टि है। क्योंकि इससे सहजही यह अनुमान निकलता है, कि जब मैं प्राणिमात्रमें हूँ और मुझमें सभी प्राणि हैं, तब मैं अपने साथ जैसे बर्तता हूँ वैसेही अन्य प्राणियोंके साथभी मुझे बर्ताव करना चाहिये। अतएव भगवानने कहा है, कि इस "आत्मौपम्य-दृष्टि अर्थात् समतासे जो सबके साथ बर्तता है, वही उत्तम कर्मयोगी स्थितप्रज्ञ है" और फिर अर्जुनको इसी प्रकार बर्ताव करनेका उपदेश दिया है (गीता. ६. ३०-३२)। अर्जुन अधिकारी था, इस कारण गीतामें इस तत्त्वको खोलकर समझानेकी कोई जरूरत न थी। किंतु साधारण लोगोंको नीतिका और धर्मका बोध करानेके लिये रचे हुए महाभारतमें अनेक स्थानोंपर यह बतलाकर (मभा. शां. २३८. २१; २६१. ३३) व्यासदेवने इसका गंभीर और व्यापक अर्थ स्पष्ट कर दिखलाया है। उदाहरण लीजिये; गीता

३८८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र और उपनिषदोंमें संक्षेपसे बतलाये हुए आत्मौपम्यके इसी तत्त्वको पहले इस प्रकार समझाया है :- आत्मोपमस्तु भूतेषु यो वै भवति पूरुषः । न्यस्तदण्डो जितक्रोधः स प्रेत्य सुखमेधते ॥ “जो पुरुष अपनेही समान दूसरेको मानता है, और जिसने क्रोधको जीत लिया है, वह परलोकमें सुख पाता है” (मभा. अनु. ११३. ६)। परस्पर एक दूसरेके साथ बर्ताव करनेके वर्णनको यहीं समाप्त न करके आगे कहा है :- न तत्परस्य सन्दध्यात् प्रतिकूलं यदात्मनः । एष संक्षेपतो धर्मः कामादन्यः प्रवर्तते ॥ “ऐसा बर्ताव औरोंके साथ न करे, कि जो स्वयं अपनेको प्रतिकूल अर्थात् दुःख- कारक जँचे। यही सब धर्मों और नीतियोंका सार है; और बाकी सभी व्यवहार लोभमूलक हैं” (मभा. अनु. ११३. ८) और अंतमें बृहस्पतीने युधिष्ठिरसे कहा है:- प्रत्याख्याने च दाने च सुखदुःखे प्रियाप्रिये । आत्मौपम्येन पुरुषः प्रमाणमधिगच्छति ॥ यथापरः प्रक्रमते परेषु तथा परे प्रक्रमन्तेऽपरस्मिन् । तथैव तेषूपमा जीवलोके यथा धर्मो निपुणेनोपदिष्टः ॥ “सुख या दुःख, प्रिय या अप्रिय, दान अथवा निषेध – इन सब बातोंका दूसरोंके विषयमें वैसाही अनुमान करे, जैसा कि अपने विषयमें जान पड़े। दूसरोंके साथ मनुष्य जैसा बर्ताव करता है, दूसरेभी उसके साथ वैसाही व्यवहार करते हैं। अतएव यही उपमा लेकर इस जगतमें आत्मौपम्यकी दृष्टिसे बर्ताव करनेको सयाने लोगोंने धर्म कहा है (मभा. अनु. ११३. ९, १०) “न तत्परस्य सन्दध्यात् प्रतिकूलं यदात्मनः” यह श्लोक विदुरनीतिमेंभी (मभा. उद्यो. ३८. ७२) है; और आगे शांतिपर्वमें (मभा. शां. १६७. ९) विदुरने फिर यही तत्त्व युधिष्ठिरको बतलाया है। परंतु आत्मौपम्यनियमका यह एक भाग हुआ, कि दूसरोंको दुःख न दो, क्योंकि जो तुम्हें दुःखदायी है, वही और लोगोंकोभी दुःखदायी होता है। अब इसपर कदाचित् किसीको यह दीर्घशंका हो, कि इससे यह निश्चयात्मक अनुमान कहाँ निकलता है, कि तुम्हें जो सुखदायक जँचे, वही औरोंकोभी सुखदायक है, और इसलिये ऐसे ढंगका बर्ताव करो, जो औरोंकोभी सुखदायक हो ? इस शंकाके निरसनार्थ भीष्मने युधिष्ठिरको धर्मके लक्षण बतलाते समय इससेभी अधिक स्पष्टीकरण करके इस नियमके दोनों भागोंका स्पष्ट उल्लेख कर दिया है :- यदन्यैर्विहितं नेच्छेदात्मनः कर्म पूरुषः । न तत्परेषु कुर्वीत जानन्नप्रियमात्मनः ॥ जीवितं यः स्वयं चेच्छेत्कथं सोऽन्यं प्रघातयेत् । यद्यदात्मनि चेच्छेत तत्परस्यापि चिन्तयेत् ॥