श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 424, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंसिद्धावस्था और व्यवहार ३७९ आदि सभी विषयोपभोग नामरूपात्मक हैं। अतएव ये अनित्य और विनाशवान् मायाकीही सीमामें रह जाते हैं। इसलिये केवल इन्हीं बाह्य प्रमाणोंके आधारसे सिद्ध होनेवाला कोईभी नीति-नियम नित्य नहीं हो सकता। आधिभौतिक बाह्य सुखदुःखकी कल्पना जैसे जैसे बदलती जावेगी, वैसेही वैसे उसकी बुनियादपर रचे हुए नीतिधर्मोंकोभी बदलते रहना चाहिये। अतः नित्य बदलती रहनेवाली नीति-धर्मकी इस स्थितिको टालनेके लिये माया-सृष्टिके विषयोपभोग छोड़कर नीति-धर्मकी इमारत इस "सब भूतोंमें एक आत्मा"-वाले अध्यात्मज्ञानके मजबूत आधार- परही खड़ी करनी पड़ती है। क्योंकि पीछे नवें प्रकरणमें कह चुके हैं, कि आत्माको छोड़ जगतमें दूसरी कोईभी वस्तु नित्य नहीं है। यही तात्पर्य व्यासजीके इस वचनका है, कि "धर्मो नित्यः सुखदुःख त्वनित्ये" - नीति अथवा सदाचरणके धर्म नित्य हैं; और सुखदुःख अनित्य हैं। यह सच है, कि दुष्ट और लोभियोंके समाजमें अहिंसा एवं सत्य प्रभृति नित्य नीति-धर्म पूर्णतासे पाले नहीं जा सकते; पर उसका दोष इन नित्य नीति-धर्मोंको देना उचित नहीं है। सूर्यकी किरणोंसे किसी पदार्थकी परछाई चौरस मैदानपर सपाट और ऊँचे-नीच स्थानपर ऊँची-नीची पडती देख जैसे यह अनुमान नहीं किया जा सकता, कि वह परछाई मूलमेंही ऊँची-नीची होगी; उसी प्रकार जब कि दुष्टोंके समाजमें नीति-धर्मका पराकाष्ठाका शुद्ध स्वरूप नहीं पाया जाता, तब यह नहीं कह सकते, कि अपूर्णावस्थाके समाजमें पाया जानेवाला नीति-धर्मका अपूर्ण स्वरूपही मुख्य अथवा मूलका है। यह दोष समाजका है, नीतिका नहीं। इसीसे चतुर पुरुष शुद्ध और नित्य नीति-धर्मोंसे झगड़ा न मचा कर ऐसे प्रयत्न किया करते हैं, कि जिनसे समाज ऊँचा उठता हुआ पूर्णावस्था में जा पहुँचे। लोभी मनुष्योंके समाजमें इस प्रकार बर्तते समय नित्य नीति-धर्मोंके कुछ अपवाद यद्यपि अपरिहार्य मानकर हमारे शास्त्रकारोंने बतलाये हैं, तथापि उसके लिये वे प्राय- श्चित्तभी बतलाते हैं। परंतु पश्चिमी आधिभौतिक नीतिशास्त्र इन्हीं अपवादोंको मूछोंपर ताव देकर प्रतिपादन करते हैं, एवं इन प्रतिवादोंका निश्चय करते समय, वे उपयोगमें आनेवाले बाह्य फलोंके तारतम्यके तत्वकोही भ्रमसे नीतिका मूल तत्त्व मानते हैं। अब पाठक समझ जायेंगे, कि पिछले प्रकरणोंमें हमने ऐसा भेद क्यों दिखलाया है ? यह बतला दिया, कि स्थितप्रज्ञ ज्ञानी पुरुषकी बुद्धि और उसका बर्तावही नीतिशास्त्रका आधार है। एवं यहभी बतला दिया, कि उससे निकलनेवाले नीति- नियमोंको - उनके नित्य होनेपरभी - समाजकी अपूर्णावस्थामें थोड़ा-बहुत बदलना पड़ता है; तथा इस रीतिसे बदले जाने परभी नीतिनियमोंकी नित्यतामें उस परि- वर्तनसे कोई बाधा क्यों और कैसे नहीं आती। अब उस पहले प्रश्नका विचार करते हैं, कि स्थितप्रज्ञ ज्ञानी पुरुष अपूर्णावस्थाके समाजमें जो बर्ताव करता है, उसका मूल अथवा बीज-तत्त्व क्या है ? चौथे प्रकरणमें कह चुके हैं, कि यह विचार दो प्रकारसे