श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र पुरुष साधारण लोगोंको चतुर बनानेके लिये वैराग्यसे अर्थात् निःस्पृहतासे लोक- संग्रहके निमित्त उद्योग किस प्रकार किया करते हैं; और आगे अठारहवें दशकमें (दास. १८.२) कहा है, कि सभीको ज्ञानी पुरुष अर्थात् जानकारके ये गुण- कथा, बातचीत, युक्ति, दाव-पेंच, प्रसंग, साक्षेप, तर्क, चतुराई, राजनीति, सहन- शीलता, तीक्ष्णता, उदारता, अध्यात्मज्ञान, भक्ति, अलिप्तता, वैराग्य, धैर्य, उत्साह, कठोरता, निग्रह, समता और विवेक आदि-सिखने चाहिये। परंतु इस निःस्पृह साधुको लोभी मनुष्योंमेंही बर्तना है, इसलिये अंतमें (दास. १९.९.३०) श्रीसमर्थका यह उपदेश है, कि "लठ्ठका सामना लठ्ठेहीसे करा देना चाहिये। उजड्डके लिये उजड्डही चाहिये; और नटखटके सामने नटखटकीही आवश्यकता है।" तात्पर्य, यह निर्विवाद है, कि पूर्णावस्थासे व्यवहारमें उतरनेपर अत्युच्च श्रेणीके धर्म-अधर्ममें थोड़ा-बहुत अंतर कर देना पड़ता है। इसपर आधिभौतिकवादियोंकी शंका है, कि पूर्णावस्थाके समाजमे नीचे उतरनेपर अनेक बातोंके सार-असारका विचार करके परमावधिके नीति-धर्ममें यदि थोड़ा-बहुत फर्क करनाही पड़ता है, तो नीति-धर्मकी नित्यता कहाँ रह गई ? और भारतसावित्रीमें व्यासने जो यह 'धर्मो नित्यः' तत्त्व बतलाया है, उसकी क्या दशा होगी ? वे कहते हैं, कि अध्यात्म-दृष्टिसे सिद्ध होनेवाला धर्मका नित्यत्व केवल कल्पनाप्रसूत है और प्रत्येक समाजकी स्थितिके अनुसार उस समयमे "अधिकांश लोगोंके अधिक सुख"-वाले तत्त्वसे जो नीतिधर्म प्राप्त होंगे, वेही चोखे नीति- नियम हैं। परंतु यह युक्तिवाद ठीक नहीं है। भूमितिशास्त्रके नियमानुसार यदि कोई बिना चौड़ाईके सरल रेखा अथवा सर्वांशमें निर्दोष गोलाकार न खींच सके, तो जिस प्रकार इतनेहीसे सरल रेखाकी अथवा शुद्ध गोलाकारकी शास्त्रीय व्याख्या गलत या निरर्थक नहीं हो जाती, उसी प्रकार सरल और शुद्ध नियमोंकी बात है। जबतक किसी बातके परमावधिके शुद्ध स्वरूपका निश्चय पहले न कर लिया जावे, तबतक व्यवहारमें दीख पड़नेवाली उस बातकी अनेक सूरतोंमें सुधार करना अथवा सार-असारका विचार करके अंतमें उसके तारतम्यको पहचान लेनाभी संभव नहीं है। और यही कारण है, कि जो सराफ़ पहलेही निर्णय करता है, कि पूर्ण शुद्ध सोना कौन-सा है ? दिशाप्रदर्शक ध्रुवमत्स्य यंत्र अथवा ध्रुव नक्षत्रकी ओर दुर्लक्षकर अपार महोदधिकी लहरों और वायुकेही तारतम्यको देखकर यदि जहाजके खलासी बराबर अपने जहाजकी पतवार घुमाने लगें, तो उनकी जो स्थिति होगी, वही स्थिति नीति-नियमोंके परमावधिके स्वरूपपर ध्यान न देकर केवल देशकालके अनुसार बर्तनेवाले मनुष्योंकी होनी चाहिये। अतएव यदि निरी आधिभौतिक- दृष्टिसेही विचार करें, तोभी यह पहले अवश्य निश्चित कर लेना पड़ता है, कि ध्रुव जैसा अटल और नित्य नीति-तत्त्व कौन-सा है ? और इस आवश्यकताको एक बार मान लेनेसेही सारा आधिभौतिक पक्ष लँगड़ा हो जाता है। क्योंकि सुखदुःख