श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकिया जा सकता है। एक तो कर्ताकी बुद्धिको प्रधान मानकर और दूसरा उसके बाहरी बर्तावसे । इनमेंसे यदि केवल दूसरीही दृष्टिसे विचार करें, तो विदित होगा कि, स्थितप्रज्ञ जो जो व्यवहार करते हैं, वे प्रायः सब लोगोंके हितकेही होते हैं। गीतामें दो बार कहा गया है, कि परम ज्ञानी सत्पुरुष "सर्वभूतहिते रताः" - प्राणिमात्रके कल्याणमें निमग्न रहते हैं ( गीता ५. २५; १२.४); और महा- भारतमेंभी यही अर्थ अन्य कई स्थानोंमें आया है। हम ऊपर कह चुके हैं, कि स्थित- प्रज्ञ सिद्ध पुरुष अहिंसा आदि जिन नियमोंका पालन करते हैं, वही धर्म अथवा सदा- चारका नमूना है। इन अहिंसा आदि नियमोंका प्रयोजन अथवा इस धर्मका लक्षण बतलाते हुए महाभारतमें धर्मका बाहरी उपयोग दिखलानेवाले ऐसे अनेक वचन हैं - "अहिंसा सत्यवचनं सर्वभूतहितं परम्" ( वन. २०६. ७३ ) - अहिंसा और सत्य भाषण, ये नीति-धर्म प्राणिमात्रके हितके लिये हैं। "धारणाद्धर्ममित्याहुः" ( शां. १०९. १२) - जगतका धारण करनेसे धर्म है। "धर्म हि श्रेय इत्याहुः" ( अनु. १०५. १४) - कल्याणही धर्म है। "प्रभवार्थाय भूतानां धर्मप्रवचनं कृतम्" ( शां. १०९. १० ) - लोगोंके अभ्युदयके लियेही धर्म-अधर्मशास्त्र बना है; अथवा "लोकयात्रार्थमेवेह धर्मस्य नियमः कृतः । उभयत्र सुखोदर्कः" ( शां. २५८. ४) - धर्म-अधर्मके नियम इसलिये रचे गये हैं, कि उनसे लोकव्यवहार चले; और दोनों लोकोंमें कल्याण हो । इसी प्रकार कहा है, कि धर्म-अधर्म-संशयके समय ज्ञानी पुरुषकोभी लोकयात्रा च द्रष्टव्या धर्मश्चात्महितानि च । "लोकव्यवहार, नीतिधर्म और अपना कल्याण - इन बाहरी बातोंका तारतम्यसे विचार करके" ( अनु. ३७. १६; वन २०५. ९० ) फिर जो कुछ करना हो, उसका निश्चय करना चाहिये; और वनपर्वमें राजा शिबीने धर्म-अधर्मके निर्णयार्थ इसी युक्तिका उपयोग किया है ( वन. १३१. ११, १२ ) । इन वचनोंसे प्रकट होता है, कि समाजका उत्कर्षही स्थितप्रज्ञके व्यवहारकी 'बाह्य नीति' होती है। और यदि यह ठीक है, तो आगे सहजही यह प्रश्न उत्पन्न होता है, कि आधिभौतिक- वादियोंके इस "अधिकांश लोगोंके अधिक सुख अथवा ( सुख शब्दको व्यापक करके ) हित या कल्याण "वाले नीति-तत्त्वको अध्यात्मवादीभी क्यों नहीं स्वीकार कर लेते ? चौथे प्रकरणमें हमने दिखला दिया हैं, कि इस "अधिकांश लोगोंके अधिक सुख" सूत्रमें बुद्धिके आत्मप्रसादसे होनेवाले सुखका अथवा उन्नतिका और पार- लौकिक कल्याणका अंतर्भाव नहीं होता, - इसमें यह बड़ा भारी दोष है। किंतु 'सुख' शब्दका अर्थ अधिक व्यापक करके यह दोष अनेक अंशोंमें निकाल डाला जा सकेगा; और नीति-धर्मकी नित्यताके संबंधमें ऊपरही दी हुई आध्यात्मिक उप- पत्तिभी कई लोगोंको विशेष महत्त्वकी जँचेगी। इसलिये नीतिशास्त्रके अध्या- त्मिक और आधिभौतिक मार्गोंमें जो महत्त्वका भेद है, उसका यहाँ और थोड़ासा स्पष्टीकरण कर देना आवश्यक है।