भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 426

सिद्धावस्था और व्यवहार ३८१ नीतिकी दृष्टिसे किसी कर्मकी योग्यता अथवा अयोग्यताका विचार दो प्रकारोंमें किया जाता है :- ( १ ) उस कर्मका केवल बाह्य फल देख कर अर्थात् यह देख कर कि उसका दृश्य परिणाम जगत्पर क्या हुआ है या होगा ? ( २ ) यह देख कर, कि उस कर्मको करनेवालेकी बुद्धि अर्थात् वासना कैसी है ? पहलेको आधिभौतिक मार्ग कहते हैं। दूसरेके फिर दो पक्ष होते हैं; और इन दोनोंके पृथक् पृथक् नाम हैं। ये सिद्धान्त पिछले प्रकरणोंमें बतलाये जा चुके हैं, कि शुद्ध कर्म होनेके लिये वासनात्मक बुद्धि शुद्ध रखनी पड़ती है और वासनात्मक बुद्धि शुद्ध रखनेके लिये व्यवसायात्मका अर्थात् कार्य-अकार्यका निर्णय करनेवाली बुद्धिभी स्थिर, सम और शुद्ध रहनी चाहिये। इन सिद्धान्तोंके अनुसार किसीकेभी कर्मोंकी शुद्धता जाँचनेके लिये देखना पड़ता है, कि उसकी वासनात्मक बुद्धि शुद्ध है या नहीं ? और वासनात्मक बुद्धिकी शुद्धता जाँचने लगे, तो अंतमें देखनाही पड़ता है, कि व्यवसा- यात्मका बुद्धि शुद्ध है या अशुद्ध ? सारांश, कर्ताकी बुद्धि अर्थात् वासनाकी शुद्धताका निर्णय अंतमें व्यवसायात्मका बुद्धिकी शुद्धतामे करना पड़ता है ( गीता २. ४१ ) । इसी व्यवसायात्मक बुद्धिको सदसद्विवेचन-शक्तिके रूपमें स्वतंत्र देवता मान लेनेसे वह आधिदैविक मार्ग हो जाता है। परंतु यह बुद्धि स्वतंत्र दैवत नहीं है; किंतु आत्माका एक अंतरिंद्रिय है, अतः बुद्धिको प्रधानता न देकर, आत्माको प्रधान मान करके वासनाकी शुद्धताका विचार करनेसे यह नीतिके निर्णयका आध्यात्मिक मार्ग हो जाता है। हमारे शास्त्रकारोंका मत है, कि इन सब मार्गोंमें आध्यात्मिक मार्ग श्रेष्ठ है; और प्रसिद्ध जर्मन तत्त्ववेत्ता कांटने यद्यपि ब्रह्मात्मैक्यका सिद्धान्त स्पष्ट रूपसे नहीं दिया है, तथापि उसने अपने नीतिशास्त्रके विवेचनका आरंभ शुद्ध-बुद्धिसे अर्थात् एक प्रकारसे अध्यात्म-दृष्टिसेही किया है, एवं उसने इसकी पूर्ण उपपत्तिभी दी है, कि ऐसा क्यों करना चाहिये। * ग्रीनका अभिप्रायभी ऐसाही है; परंतु इस विषयका पूरा विवेचन इस छोटे-से ग्रंथमें नहीं किया जा सकता। हम चौथे प्रकरणमें दो-एक उदाहरण देकर स्पष्ट दिखला चुके हैं, कि नीति-तत्त्वोंका पूरा निर्णय करनेके लिये कर्मके बाहरी फलकी अपेक्षा कर्ताकी शुद्ध-बुद्धिपर विशेष ध्यान क्यों देना पड़ता है, और इस संबंधमें अधिक विचार आगे - पंद्रहवें प्रकरणमें पाश्चात्य और पौरस्त्य नीति-मार्गोंकी तुलना करते समय - किया जावेगा। अभी इतनाही कहते हैं, कि कोईभी कर्म तभी होता है, जब कि पहले उस कर्मको करनेकी बुद्धि उत्पन्न हो, इसलिये कर्मकी योग्यता-अयोग्यताका विचारभी सभी अंशोंमें बुद्धिकी शुद्धता- अशुद्धताके विचारपरही अवलंबित रहता है। बुद्धि बुरी होगी; तो कर्मभी बुरा होगा, परंतु केवल बाह्य कर्मके बुरे होनेसेही यह अनुमान नहीं किया जा सकता,

* Kant's Theory of Ethics, trans. by Abbott. 6th Ed. especially Metaphysics of Morals therein.