श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कि बुद्धिभी बुरी होनीही चाहिये। क्योंकि भूलसे, कुछ-का-कुछ समझ लेनेसे अथवा अज्ञानसेभी वैसा कर्म हो सकता है; और फिर उसे नीतिशास्त्रकी दृष्टिसे बुरा नहीं कह सकते । “अधिकांश लोगोंके अधिक सुख”-वाला नीतिशास्त्र-तत्त्व केवल बाहरी परिणामोंके लियेही उपयोगी होता है; और जब कि इन सुखदुःखात्मक बाहरी परिणामोंको निश्चित रीतिसे मापनेका बाहरी साधन अब तक नहीं मिला है, तब नीति-तत्त्वोंकी इस कसौटीमे सदैव यथार्थ निर्णय होनेका भरोसाभी नहीं किया जा सकता । इसी प्रकार मनुष्य कितनाही सयाना क्यों न हो जाय, यदि उसकी बुद्धि पूर्ण शुद्ध न हो गई हो, तो यह नहीं कह सकते, कि वह प्रत्येक अवसरपर धर्मसेही बर्तेगा । विशेषतः जहाँ उसका स्वार्थ आ डटा, वहाँ तो फिर कहनाही क्या है ? – “स्वार्थे सर्वे विमुह्यन्ति येऽपि धर्मविदो जनाः” (मभा. वि. ५१. ४)। सारांश, मनुष्य कितनाही बड़ा ज्ञानी, धर्मवेत्ता और सयाना क्यों न हो, किन्तु यदि उसकी बुद्धि प्राणिमात्रमें सम न हो गई हो, तो यह नहीं कह सकते; कि उसका कर्म सदैव शुद्ध अथवा नीतिकी दृष्टिसे निर्दोषही रहेगा । अतएव हमारे शास्त्रकारोने निश्चित कर दिया है, कि नीतिका विचार करते समय कर्मके बाह्य फलकी अपेक्षा कर्ताकी बुद्धिकाही प्रधानतासे विचार करना चाहिये । साम्य-बुद्धिही अच्छे बर्तावका चोखा बीज है। यही भावार्थ भगवद्गीताके इस उपदेशमेंभी है ( गीता २. ४९ ) :- दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय । बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः ॥ कुछ लोग, इस श्लोकमें, बुद्धिका अर्थ ज्ञान समझकर कहते हैं, कि इसमें कर्म और ज्ञान, इन दोनोंमेंसे ज्ञानकोही श्रेष्ठता दी है। पर हमारे मतमें यह अर्थ ठीक नहीं है। इस स्थलपर शांकरभाष्यमेंभी 'बुद्धियोग'का अर्थ 'समत्व बुद्धियोग' दिया हुआ है; और यह श्लोक कर्मयोगके प्रकरणमें आया है। अतएव वास्तवमें इसका अर्थ कर्मप्रधानही करना चाहिये; और वही सरल रीतिसेही है। कर्म करनेवाले लोग दो प्रकारके होते हैं। पहले प्रकारके फलपर – उदाहरणार्थ, उससे कितने लोगोंको कितना सुख होगा, इसपर – दृष्टि जमा कर कर्म करते हैं; और दूसरे बुद्धिको सम और निष्काम रखकर कर्म करते हैं – फिर कर्मधर्म-संयोगसे उससे जो परिणाम होना हो, सो हुआ करे। इनमेंसे 'फलहेतवः' अर्थात् “फलपर दृष्टि रखकर कर्म करनेवाले” लोगोंको नैतिक दृष्टिसे कृपण अर्थात् कनिष्ठ श्रेणीके बतलाकर, समत्व- बुद्धिसे कर्म करनेवालोंको इस श्लोकमें श्रेष्ठता दी है। इस श्लोकके पहले दो चरणोंमें जो यह कहा है, कि “दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय” – हे धनंजय !
- इस श्लोकका सरल अर्थ यह है – “हे धनंजय ! (सम-) बुद्धिके योगकी अपेक्षा (कोरा) कर्म बिलकुलही निकृष्ट है। अतएव (सम-) बुद्धिकाही आश्रय कर। फलपर दृष्टि रखकर कर्म करनेवाले (पुरुष) कृपण अर्थात् ओछे दर्जेके है।”