श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 428, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंसिद्धावस्था और व्यवहार ३८३ समत्व बुद्धियोगकी अपेक्षा (कोरा) कर्म अत्यंत निकृष्ट है - उसका तात्पर्य यही है; और जब अर्जुनने यह प्रश्न किया, कि "भीष्म-द्रोणको कैसे मारूं?", तब उसको यही उत्तर दिया गया। इसका भावार्थ यह है, कि मरने या मारनेकी निरी क्रियाकी ओर ध्यान न देकर, देखना चाहिये, कि "मनुष्य किस बुद्धिसे उस कर्मको करता है?" अतएव इस श्लोकके तीसरे चरणमें उपदेश है,कि "तू बुद्धि अर्थात् सम-बुद्धिकी शरण जा;" और आगे उपसंहारात्मक अठारहवें अध्यायमेंभी भगवानने फिर कहा है, कि "बुद्धियोगका आश्रय करके तू अपने कर्म कर।" गीताके दूसरे एक श्लोकसेभी व्यक्त होता है, कि गीता निरे कर्मके विचारको कनिष्ठ समझकर, उस कर्मकी प्रेरक बुद्धिकेही विचारको श्रेष्ठ मानती है। अठारहवें अध्यायमें कर्मके भले बुरे - अर्थात् सात्त्विक, राजस और तामस - भेद बतलाये गये हैं। यदि केवल कर्मफलकी ओरही गीताकी दृष्टि होती, तो भगवानने यह कहा होता, कि जो कर्म बहुतेरोंको सुखदायक हो, वही सात्त्विक है। परंतु ऐसा न बतलाकर, अठारहवें अध्यायमें कहा है, कि "फलाशा छोड़कर निस्संग-बुद्धिसे किया हुआ कर्म सात्त्विक अथवा उत्तम है" (गीता १८. २३)। अर्थात् इससे प्रकट होता है, कि कर्मके बाह्य फलकी अपेक्षा कर्ताकी निष्काम, सम और निस्संग-बुद्धिकोही कर्म-अकर्मका विवेचन करनेमें गीता अधिक महत्त्व देती है। यही न्याय स्थितप्रज्ञके व्यवहारके लिये उपयुक्त करनेसे होता है, कि स्थितप्रज्ञ जिस साम्य-बुद्धिसे अपनी बराबरीवाले, छोटे और साधारण लोगोंके साथ बर्तता है, वह साम्य-बुद्धिही उसके आचरणका मुख्य तत्त्व है; और इस आचरणसे जो प्राणिमात्रका मंगल होता है, वह इस साम्य-बुद्धिका निरा बाहरी और आनुषंगिक परिणाम है। ऐसेही जिसकी बुद्धि पूर्णावस्थागें पहुँच गई हो, वह लोगोंको केवल आधिभौतिक सुख प्राप्त करा देनेके लियेही अपने सब व्यवहार न करेगा। यह ठीक है, कि वह दूसरोंका नुकसान न करेगा, पर यह उसका मुख्य ध्येय नहीं है। स्थितप्रज्ञ ऐसे प्रयत्न किया करता है, जिनसे समाजके लोगोंकी बुद्धि अधिकाधिक शुद्ध होती जावें; और अंतमें वे लोग अपने समानही आध्यात्मिक पूर्णावस्थामें जा पहुँचे। मनुष्यके कर्तव्योंमेंसे यही श्रेष्ठ और सात्त्विक कर्तव्य है। केवल आधिभौतिक सुख-वृद्धिके प्रयत्नोंको हम गौण अथवा राजस समझते हैं। गीताका सिद्धान्त है, कि कर्म-अकर्मके निर्णयार्थ कर्मके बाह्य फलपर ध्यान न देकर, कर्ताकी शुद्ध-बुद्धिकोही प्रधानता देनी चाहिये। इसपर कुछ लोगोंका यह तर्कपूर्ण मिथ्या आक्षेप है, कि यदि कर्मफलको न देखकर केवल शुद्ध-बुद्धिकाही इस प्रकार विचार करें, तो मानना होगा, कि शुद्ध-बुद्धिवाला मनुष्य कोईभी बुरा काम कर सकता है! और तब तो वह सभी बुरे कर्म करनेके लिये स्वतंत्र हो जायेगा। इस आक्षेपको हमने केवल अपनीही कल्पनाके बलसे नहीं घर घसीटा है; किंतु गीता-धर्मपर कुछ पादड़ो बहादुरोंके किये हुए इस ढंगके आक्षेप हमारे देखनेमेंभी