भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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३८४ सिद्धावस्था और व्यवहार

आये हैं।* किंतु हमें यह कहनेमें कोईभी दिक्कत नहीं जान पड़ती, कि ये आरोप या आक्षेप बिलकुल मूर्खताके अथवा दुराग्रहके हैं। और यह कहनेमेंभी कोई हानि नहीं है, कि आफ़ीकाका कोई काला-कलूट जंगली मनुष्य सुधरे हुए राष्ट्रके नीति- तत्त्वोंका आकलन करनेमें जिस प्रकार अपात्र और असमर्थ होता है, उसी प्रकार इन भले पादड़ी मानवोंकी बुद्धि वैदिक धर्मके स्थितप्रज्ञकी आध्यात्मिक पूर्णावस्थाका निरा आकलन करनेमेंभी, स्वधर्मके व्यर्थ दुराग्रह अथवा और कुछ ओछे एवं दुष्ट मनोविकारोंसे, असमर्थ हो गई है। उन्नीसवीं सदीके प्रसिद्ध जर्मन तत्त्वज्ञानी कांटने अपने नीतिशास्त्रविषयक ग्रंथमें अनेक स्थलोंपर लिखा है, कि कर्मके बाहरी फलको न देखकर नीतिके निर्णयार्थ कर्ताकी बुद्धिकाही विचार करना उचित है। § किंतु हमने नहीं देखा, कि कांटपर किसीने ऐसा आक्षेप किया हो। फिर वह गीताके नीति- तत्त्वकोही उपयुक्त कैसे होगा ? प्राणिमात्रमें समबुद्धि होतेही परोपकार करना तो देहका स्वभावही बन जाता है; और ऐसा हो जानेपर परम ज्ञानी एवं परम शुद्ध-बुद्धि- वाले मनुष्यके हाथसे कुकर्म होना उतनाही असंभव है, जितना कि अमृतसे मृत्यु हो जाना। कर्मके बाह्य फलका विचार न करनेके लिये जब गीता कहती है, तब उसका यह अर्थ नहीं है, कि जो दिलमें आ जाय, सो किया करो। प्रत्युत गीता कहती है, कि बाहरी परोपकार करनेका स्वाँग पाखंडसे या लोभसे बना सकता है किंतु प्राणिमात्रमें एक आत्माको पहचाननेसे बुद्धिमें जो स्थिरता और समता आ जाती है, उसका स्वाँग कोई नहीं बना सकता; तब किसीभी कामकी योग्यता-अयोग्यताका विचार करते समय कर्मके बाह्य परिणामकी अपेक्षा कर्ताकी बुद्धिपर योग्य दृष्टि रखनी चाहिये। गीताका संक्षेपमें यह सिद्धान्त कहा जा सकता है, कि कोरे जड़ कर्मोंमेंही नीति-तत्त्व नहीं; किंतु कर्ताकी बुद्धिपर वह सर्वथा अवलंबित रहता है। आगे गीतामेंही ( गीता १८. २५) कहा है, कि इस आध्यात्मिक सिद्धान्तके ठीक तत्त्वको न समझकर यदि


* कलकत्तेके एक पादड़ीकी ऐसी करतूतका उत्तर मिस्टर ब्रूक्सने दिया है, जो कि उनके Kurukshetra (कुरुक्षेत्र) नामक छपे हुए निबंधके अंतमें है; उसे देखिये ( Kurukshetra - Vyasasharma, Adyar, Madras, pp. 48--52 ). § "The second proposition is : That an action done from duty derives its moral worth not from the purpose which is to be attained by it, but from the maxim by which it is determined." .. The moral worth of an action "cannot lie anywhere but in the principle of the will, without regard to the ends which can be attained by action. " Kant's Metaphysics of Morals (trans. by Abbott in Kant's Theory of Ethics, p. 16. (The italics are author's and not our own) And again "When the question is of moral worth, it is not with the action; which we see that we are concerned; but with those inward principles of them which we do not see." p. 24 - Ibid.