श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसिद्धावस्था और व्यवहार ३८५ कोई मनमानी करने लगे, तो उस पुरुषको राक्षस या तामसी बुद्धिवाला कहना चाहिये । एक बार सम-बुद्धि हो जानेसे, फिर उस पुरुषको कर्तव्य-अकर्तव्यका और अधिक उपदेश नहीं करना पड़ता - इसी तत्त्वपर ध्यान देकर साधु तुकारामने शिवाजी महाराजको जो यह उपदेश किया, कि "इसका एकही कल्याणकारक अर्थ है, कि प्राणिमात्रमें एक आत्माको देखो", उसमेंभी भगवद्गीताके अनुसार कर्मयोगका एकही तत्त्व बतलाया गया है (तु. गा. ४४२८. ९१) । यहाँ फिरभी कह देना उचित है, कि यद्यपि पूर्ण साम्य-बुद्धिही सदाचारका बीज हो, तथापि इससे यहभी अनुमान न करना चाहिये, कि जबतक इस प्रकारकी पूर्ण शुद्ध-बुद्धि न हो जावे, तब- तक कर्म करनेवाला चुपचाप हाथपर हाथ धरे बैठा रहे । स्थितप्रज्ञके समान बुद्धि करलेना तो परम ध्येय है । परंतु गीताके आरंभमेंही (गीता २.४०) यह उपदेश किया है, कि इस परम ध्येयके पूर्णतया सिद्ध होनेतक प्रतीक्षा न करके जितना हो सके उतनाही, निष्काम बुद्धिसे प्रत्येक मनुष्य अपने कर्म करता रहे, इसीसे बुद्धि अधिक शुद्ध होती चली जायगी; और अंतमें पूर्ण सिद्धि हो जायगी । ऐसा आग्रह करके समयको मुक्त न गँवा दे, कि जबतक पूर्ण सिद्धि पा न जाऊँगा, तबतक कर्म करूँगाही नहीं । 'सर्वभूतहित' अथवा "अधिकांश लोगोंके अधिक कल्याण "वाला नीति-तत्त्व केवल बाह्य कर्म उपयुक्त होनेके कारण शाखाग्राही और कृपण है, परंतु "प्राणिमात्रमें एक आत्मा "वाली - स्थितप्रज्ञकी 'साम्यबुद्धि' मूलग्राही है; और उसीको नीति- निर्णयके काममें श्रेष्ठ मानना चाहिये - इस प्रकार यद्यपि यह बात सिद्ध हो चुकी; तथापि इसपर अनेकोंके आक्षेप हैं, कि इस सिद्धान्तसे व्यावहारिक बर्तावकी उपपत्ति ठीक ठीक नहीं लगती । ये आक्षेप प्रायः संन्यास-मार्गी स्थितप्रज्ञके संसारी व्यवहारको देखकरही इन लोगोंको सूझे हैं। किंतु थोडासा विचार करनेसे किसीकोभी सहजही दीख पड़ेगा, कि ये आक्षेप स्थितप्रज्ञ कर्मयोगीके बर्तावको उपयुक्त नहीं होते । और तो क्या ? यहभी कह सकते हैं, कि प्राणिमात्रमें एक आत्मा अथवा आत्मौपम्य बुद्धिके तत्त्वसे व्यावहारिक नीति-धर्मकी जैसी अच्छी उपपत्ति लगती है, वैसी और किसीभी तत्त्वसे नहीं लगती । उदाहरणके लिये सब देशोंमें और सब नीतिशास्त्रोंमें प्रधान माने गये परोपकार धर्मकोही लीजिये । "दूसरेका आत्माही मेरा आत्मा है" इस अध्यात्म-तत्त्वसे परोपकार-धर्मकी जैसी उपपत्ति लगती है, वैसी किसीभी आधि- भौतिक वादसे नहीं लगती । बहुत हुआ तो, आधिभौतिकशास्त्र इतनाही कह सकते हैं, कि परोपकार-बुद्धि एक नैसर्गिक गुण है; और वह उत्क्रांतिवादके अनुसार बढ़ रहा है । किंतु इतनेसेही परोपकारकी नित्यता सिद्ध नहीं हो जाती । यही नहीं; बल्कि स्वार्थ और परार्थके झगड़ेमें, इन दोनों घोड़ोंपर सवार होनेके लालची चतुर स्वार्थियो- कोभी अपना मतलब गाँठनेमें इसके कारण अवसर मिल जाता है, यह बात हम चौथे प्रकरणमें बतला चुके हैं। इसपरभी कुछ लोग कहते हैं, कि परोपकार-बुद्धिकी नित्यता गी. र. २५