भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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३८६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सिद्ध करनेसे लाभही क्या है ? प्राणिमात्रमें एकही आत्मा मानकर यदि प्रत्येक पुरुष सदैव प्राणिमात्रकाही हित करने लग जाय, तो उसका जीवन-निर्वाह कैसे होगा ? और जब वह इस प्रकार अपनाही योगक्षेम नहीं चला सकेगा तब वह और लोगोंका कल्याण करही कैसे सकेगा ? लेकिन ये शंकाएँ न तो नईही हैं; और न ऐसी हैं, कि जो टाली न जा सकें । भगवानने गीतामेंही इस प्रश्नका यों उत्तर दिया है – “ तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ” ( गीता. ९. २२ ) ; और अध्यात्मशास्त्रकी युक्तियोंसेभी यही अर्थ निष्पन्न होता है । जिसे लोककल्याण करनेकी बुद्धि हो गई उसे खाना-पीना नहीं छोड़ना पड़ता, परंतु उसकी बुद्धि ऐसी होनी चाहिये, कि मैं लोकोपकारके लियेही देह धारण करता हूँ। जनकने कहा है ( मभा. अश्व. ३२ ), कि जब ऐसी बुद्धि रहेगी, तभी इंद्रियाँ वशमें रहेंगी; और लोककल्याण होगा । और मीमांसकोंके इस सिद्धान्तका तत्त्वभी यही है, कि यज्ञ करके शेष बचा हुआ अन्न ग्रहण करनेवालेको 'अमृताशी' कहना चाहिये (गीता ४. ३१) । क्योंकि उनकी दृष्टिसे जगतका धारण-पोषण करनेवाला कर्मही यज्ञ है । अतएव यह लोककल्याण- कारक कर्म करते समय उसीसे अपना निर्वाह होता है; और करनाभी चाहिये । उनका निश्चय है, कि अपने स्वार्थके लिये यज्ञचक्रको डुबा देना अच्छा नहीं है । दासबोधमें ( १९. ४. १० ) श्रीसमर्थ रामदास स्वामीनेभी वर्णन किया है, कि “ वह परोपकार करताही रहता है, जिसकी सबको जरूरत बनी रहती है । ऐसी दशामें उसे भूमंडलमें किस बातकी कम रह सकती है ?” व्यवहारकी दृष्टिसे देखे, तोभी यही ज्ञात होता है, कि यह उपदेश बिलकुल यथार्थ है । सारांश, जगतमें देखा जाता है, कि लोककल्याणमें जुटे रहनेवाले पुरुषका योगक्षेम कभी अटकता नहीं है । केवल परोपकार करनेके लिये उसे निष्काम बुद्धिसे तैयार रहना चाहिये । एक बार इस भावनाके दृढ़ हो जानेपर, कि “ सभी लोग मुझमें हैं और मैं सब लोगोंमें हूँ ”, फिर यह प्रश्नही नहीं हो सकता, कि परार्थ स्वार्थ भिन्न है या नहीं । 'मैं' पृथक् और 'लोग' पृथक् इस आधिभौतिक द्वैत-बुद्धिसे “ अधिकांश लोगोंके अधिक सुख ” करनेके लिये जो प्रवृत्त होता है, उसके मनमें ऊपर लिखी हुई भ्रामक शंकाएँ उत्पन्न हुआ करती हैं । परंतु जो “ सर्वं खल्विदं ब्रह्म ” इस अद्वैत-बुद्धिसे परोपकार करनेके लिये प्रवृत्त हो जाय, उसे यह शंकाही नहीं रहती । सर्वभूतात्मैक्य-बुद्धिसे निष्पन्न होनेवाले सर्वभूतहितके इस आध्यात्मिक तत्त्वमें, और स्वार्थ एवं परार्थरूपी द्वैतके अर्थात् अधिकांश लोगोंके सुखके तारतम्यसे निकलनेवाले लोककल्याणके आधिभौतिक तत्त्वमें इतनाही भेद है, जो ध्यान देने योग्य है । साधु पुरुष मनमें लोककल्याण करनेका हेतु रखकर, लोककल्याण नहीं किया करते । जिस प्रकार प्रकाश फैलाना सूर्यका स्वभाव है, उसी प्रकार ब्रह्मज्ञानसे मनमें सर्वभूतात्मैक्यका पूर्ण परिचय हो जानेपर लोककल्याण करना तो इन साधु-पुरुषोंका सहज स्वभाव हो जाता है । और ऐसा स्वभाव बन जानेपर सूर्य जैसे दूसरोंको प्रकाश देता हुआ अपने आपको प्रकाशित