श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसिद्धावस्था और व्यवहार ३८७ कर लेता है, वैसेही साधुपुरुषोंके परार्थ उद्योगसेही उनका योगक्षेमभी आपही-आप सिद्ध होता है। परोपकार करनेके इस देह-स्वभाव और अनासक्त बुद्धिके एकत्र हो जानेपर कितनेही संकट क्यों न चले आवें, तोभी उनकी बिलकुल परवाह न कर और यह न सोच कर, कि संकटोंको सहना भला है, या लोककल्याणको छोड़ देना भला है, ब्रह्मात्मैक्य बुद्धिवाले साधुपुरुष, अपना कार्य सदा जारी रखते है। तथा यदि प्रसंग आ जाय तो आत्मबलिभी दे देनेके लिये तैयार रहते हैं, उन्हें उसकी कुछभी चिंता नही होती। किंतु जो लोग स्वार्थ और परार्थको दो भिन्न वस्तुएँ समझ, उन्हें तराजूके दो पलड़ोंमें डाल काँटेका झुकाव देखकर धर्म-अधर्मका निर्णय करना सीखे हुए हैं, उनकी लोककल्याण करनेकी इच्छाका इतना तीव्र हो जाना कदापि संभव नहीं है। अतएव प्राणिमात्रके हितका तत्त्व यद्यपि भगवद्गीताको संमत है, तथापि उसकी उपपत्ति अधिकांश लोगोंके अधिक बाहरी सुखोंके तारतम्यसे नहीं लगाई है; किंतु लोगोंकी संख्या अथवा उनके सुखोंकी न्यूनाधिकताके विचारोंको आगंतुक अतएव कृपण कहा है; तथा शुद्ध व्यवहारकी मूलभूत साम्य-बुद्धिकी उपपत्ति गीतामें अध्यात्मशास्त्रके नित्य ब्रह्मज्ञानके आधारपर बतलाई है। इससे दीख पड़ेगा, कि प्राणिमात्रके हितार्थ उद्योग करने या लोककल्याण अथवा परोपकार करनेकी युक्तिसंगत उपपत्ति अध्यात्म-दृष्टिसे क्योंकर लगती है ? अब समाजमें एक दूसरेके साथ बर्तनेके संबंधमें साम्य-बुद्धिकी दृष्टिसे हमारे शास्त्रोंमें जो मूल नियम बतलाये गये, हैं, उनका विचार करते हैं। "यत्र वा अस्य सर्वमात्मैवा भूत्" (बृह. २. ४. १४) - जिसे सर्व आत्ममय हो गया, वह साम्य-बुद्धिसेही सबके साथ बर्तता है, यह तत्त्व बृहदारण्यकके सिवा ईशावास्य (ईश. ६) और कैवल्य (कै. १. १०) उपनिषदोंमें तथा मनुस्मृतिमेंभी (मनु. १२. ९१, १२५) है। एवं इसी तत्त्वका गीताके छठे अध्यायमें (गीता ६. २९) "सर्वभूतस्थ- मात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि"के रूपमें अक्षरशः उल्लेख है। सर्वभूतात्मैक्य अथव- साम्य-बुद्धिके इसी तत्त्वका रूपांतर आत्मौपम्य-दृष्टि है। क्योंकि इससे सहजही यह अनुमान निकलता है, कि जब मैं प्राणिमात्रमें हूँ और मुझमें सभी प्राणि हैं, तब मैं अपने साथ जैसे बर्तता हूँ वैसेही अन्य प्राणियोंके साथभी मुझे बर्ताव करना चाहिये। अतएव भगवानने कहा है, कि इस "आत्मौपम्य-दृष्टि अर्थात् समतासे जो सबके साथ बर्तता है, वही उत्तम कर्मयोगी स्थितप्रज्ञ है" और फिर अर्जुनको इसी प्रकार बर्ताव करनेका उपदेश दिया है (गीता. ६. ३०-३२)। अर्जुन अधिकारी था, इस कारण गीतामें इस तत्त्वको खोलकर समझानेकी कोई जरूरत न थी। किंतु साधारण लोगोंको नीतिका और धर्मका बोध करानेके लिये रचे हुए महाभारतमें अनेक स्थानोंपर यह बतलाकर (मभा. शां. २३८. २१; २६१. ३३) व्यासदेवने इसका गंभीर और व्यापक अर्थ स्पष्ट कर दिखलाया है। उदाहरण लीजिये; गीता