श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र और उपनिषदोंमें संक्षेपसे बतलाये हुए आत्मौपम्यके इसी तत्त्वको पहले इस प्रकार समझाया है :- आत्मोपमस्तु भूतेषु यो वै भवति पूरुषः । न्यस्तदण्डो जितक्रोधः स प्रेत्य सुखमेधते ॥ “जो पुरुष अपनेही समान दूसरेको मानता है, और जिसने क्रोधको जीत लिया है, वह परलोकमें सुख पाता है” (मभा. अनु. ११३. ६)। परस्पर एक दूसरेके साथ बर्ताव करनेके वर्णनको यहीं समाप्त न करके आगे कहा है :- न तत्परस्य सन्दध्यात् प्रतिकूलं यदात्मनः । एष संक्षेपतो धर्मः कामादन्यः प्रवर्तते ॥ “ऐसा बर्ताव औरोंके साथ न करे, कि जो स्वयं अपनेको प्रतिकूल अर्थात् दुःख- कारक जँचे। यही सब धर्मों और नीतियोंका सार है; और बाकी सभी व्यवहार लोभमूलक हैं” (मभा. अनु. ११३. ८) और अंतमें बृहस्पतीने युधिष्ठिरसे कहा है:- प्रत्याख्याने च दाने च सुखदुःखे प्रियाप्रिये । आत्मौपम्येन पुरुषः प्रमाणमधिगच्छति ॥ यथापरः प्रक्रमते परेषु तथा परे प्रक्रमन्तेऽपरस्मिन् । तथैव तेषूपमा जीवलोके यथा धर्मो निपुणेनोपदिष्टः ॥ “सुख या दुःख, प्रिय या अप्रिय, दान अथवा निषेध – इन सब बातोंका दूसरोंके विषयमें वैसाही अनुमान करे, जैसा कि अपने विषयमें जान पड़े। दूसरोंके साथ मनुष्य जैसा बर्ताव करता है, दूसरेभी उसके साथ वैसाही व्यवहार करते हैं। अतएव यही उपमा लेकर इस जगतमें आत्मौपम्यकी दृष्टिसे बर्ताव करनेको सयाने लोगोंने धर्म कहा है (मभा. अनु. ११३. ९, १०) “न तत्परस्य सन्दध्यात् प्रतिकूलं यदात्मनः” यह श्लोक विदुरनीतिमेंभी (मभा. उद्यो. ३८. ७२) है; और आगे शांतिपर्वमें (मभा. शां. १६७. ९) विदुरने फिर यही तत्त्व युधिष्ठिरको बतलाया है। परंतु आत्मौपम्यनियमका यह एक भाग हुआ, कि दूसरोंको दुःख न दो, क्योंकि जो तुम्हें दुःखदायी है, वही और लोगोंकोभी दुःखदायी होता है। अब इसपर कदाचित् किसीको यह दीर्घशंका हो, कि इससे यह निश्चयात्मक अनुमान कहाँ निकलता है, कि तुम्हें जो सुखदायक जँचे, वही औरोंकोभी सुखदायक है, और इसलिये ऐसे ढंगका बर्ताव करो, जो औरोंकोभी सुखदायक हो ? इस शंकाके निरसनार्थ भीष्मने युधिष्ठिरको धर्मके लक्षण बतलाते समय इससेभी अधिक स्पष्टीकरण करके इस नियमके दोनों भागोंका स्पष्ट उल्लेख कर दिया है :- यदन्यैर्विहितं नेच्छेदात्मनः कर्म पूरुषः । न तत्परेषु कुर्वीत जानन्नप्रियमात्मनः ॥ जीवितं यः स्वयं चेच्छेत्कथं सोऽन्यं प्रघातयेत् । यद्यदात्मनि चेच्छेत तत्परस्यापि चिन्तयेत् ॥