श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 434, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंसिद्धावस्था और व्यवहार ३८९ “हम दूसरोंसे अपने साथ जैसे बर्तावका किया जाना पसंद नहीं करते वैसा अर्थात् अपनी रुचिके अनुकूल बर्ताव हमेंभी दूसरोंके साथ न करना चाहिये। जो स्वयं जीवित रहनेकी इच्छा करता है, वह दूसरोंको कैसे मारेगा ? ऐसी इच्छा रखें, कि जो हम चाहते हैं, वही और लोगभी चाहते हैं।” (मभा. शां. २५८.१९,२१)। और दूसरे स्थानपर इसी नियमको बतलाते हुए इन 'अनुकूल' अथवा 'प्रतिकूल' विशेषणोंका प्रयोग न करके किसीभी प्रकारके आचरणके विषयमें विदुरने कहा है, कि सामान्यतः- तस्माद्धर्मप्रधानेन भवितव्यं यतात्मना। तथा च सर्वभूतेषु वर्तितव्यं यथात्मनि ॥ “इंद्रियनिग्रह करके धर्मसे बर्तना चाहिये; और अपने समानही सब प्राणियोंसे बर्ताव करे” (मभा. शां. १६७. ९)। क्योंकि शुकानुप्रश्नमें व्यास कहते हैं :- यावानात्मनि वेदात्मा तावानात्मा परात्मनि। य एवं सतं वेद सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ “जो सदैव यह जानता है, कि अपने शरीरमें जितना आत्मा है, उतनाही दूसरेके शरीरमेंभी है, वही अमृतत्व अर्थात् मोक्ष प्राप्त कर लेनेमें समर्थ होता है” (मभा. शां. २३८. २२)। बुद्धको आत्माका अस्तित्व मान्य न था। कमसे-कम उसने यह तो स्पष्टही कह दिया है, कि आत्मविचारकी व्यर्थ उलझनमें न पड़ना चाहिये। तथापि उसनेभी यह बतलाते हुए, कि बौद्ध भिक्षु लोग औरोंके साथ कैसा बर्ताव करें ? - आत्मौपम्यदृष्टिका यह उपदेश किया है :- यथा अहं तथा एते यथा एते तथा अहम् । अत्तानं (आत्मानं) उपमं कत्वा (कृत्वा) न हनेय्यं न घातये ॥ “जैसे मैं, वैसे ये; जैसे ये, वैसे मैं, ( इस प्रकार ) अपनी उपमा समझकर न तो ( किसीकोभी ) मारे; और न मरवावे” (सुत्तनिपात, नालकसुत्त २७)। धम्म- पद नामके दूसरे पाली बौद्ध ग्रंथमेंभी (धम्मपद १२९, १३०) मेंभी इसी श्लोकका दूसरा चरण दो बार ज्यों-का-त्यों आया है; और आगे तुरंतही मनुस्मृति (५. ४५)। एव महाभारत (अनु. ११३. ५) इन दोनों ग्रंथोंमें पाये जानेवाले श्लोकोंका पाली भाषामें इस प्रकार अनुवाद किया गया है -- सुखकामानि भूतानि यो दण्डेन विहिंसति । अत्तनो सुखमेसानो ( इच्छन् ) पेच्च सो न लभते सुखम् ॥ “(अपने समानही) सुखकी इच्छा करनेवाले दूसरे प्राणियोकी जो अपने (अत्तनो) सुखके लिये दंडसे हिंसा करता है, उसे मरनेपर (पेच्च = प्रेत्य) सुख नहीं मिलता” (धम्मपद १३१)। आत्माके अस्तित्वको न माननेपरभी आत्मौपम्यकी यह भाषा जब कि बौद्ध ग्रंथोंमें पाई जाती है, तब यह प्रकटही है, कि बौद्ध ग्रंथकारोंने ये विचार वैदिक धर्म-ग्रंथोंसेही लिये हैं। अस्तु, इसका अधिक विचार