श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 435, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ें३९० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र आगे चलकर करेंगे। ऊपरके विवेचनसे स्पष्ट दीख पड़ेगा, कि जिसकी “ सर्व- भूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ” ऐसी स्थिति हो गई, वह औरोंसे बर्तने समय आत्मौपम्य-बुद्धिसेही सदैव काम लिया करता है; और हम प्राचीन कालसे समझते चले आ रहे हैं, कि ऐसे बर्तावका यही एक मुख्य नीति-तत्त्व है। इसे कोईभी स्वीकार कर लेगा, कि समाजमें मनुष्योंके पारंपरिक व्यव- हारका निर्णय करनेके लिये आत्मौपम्य-बुद्धिका यह सूत्र “ अधिकांश लोगोने अधिक हित "वाले आधिभौतिक तत्त्वकी अपेक्षा अधिक अर्थपूर्ण, निर्दोष, निस्संदिग्ध, व्यापक, स्वल्प और बिल्कुल अन-पढ़ोंकीभी समझमें जल्दी आ जानेयोग्य है।* धर्म-अधर्मशास्त्रके इस रहस्य (“ एष संक्षेपतो धर्मः ”) अथवा मूल तत्त्वकी अध्यात्म-दृष्टिसे जैसी उपपत्ति लगती है, वैसी कर्मके बाहरी परिणामपरही नजर देनेवाले आधिभौतिकवादसे नहीं लगती; और इसीसे धर्म-अधर्मशास्त्रके इस प्रधान नियमको उन पश्चिमी पंडितोंके ग्रंथोंमें प्रायः प्रमुख स्थान नहीं दिया जाता, कि जो आधिभौतिक-दृष्टिसे कर्मयोगका विचार करते हैं। और तो क्या, आत्मौ- पम्य दृष्टिके सूत्रको ताकमें रखकर, वे समाजबंधनकी उपपत्ति “ अधिकांश लोगोंके अधिक सुख ” प्रभृति केवल दृश्य तत्त्वोंसेही लगानेका प्रयत्न किया करते हैं। परंतु उपनिषदोंमें, मनुस्मृतिमें, गीतामें महाभारतके अन्यान्य प्रकरणोंमें और केवल बौद्ध धर्ममेंही नहीं; प्रत्युत अन्यान्य देशों एवं धर्मोंमेंभी आत्मौपम्यके इस सरल नीति-तत्त्व- कोही सर्वत्र अग्रस्थान दिया हुआ पाया जाता है। यहूदी और ईसाई धर्म-पुस्तकोंमें जो यह आज्ञा है, कि “ तू अपने पड़ोसियोंसे अपनेही समान प्रीति कर ” ( लेव्हि. १९. १८; मेथ्यू. २२. ३९ ), वह इसी नियमका रूपांतर है। ईसाई लोग इसे सोनेका अर्थात् सोनेसरीखा मूल्यवान् नियम कहते हैं; परंतु आत्मैक्यकी उपपत्ति उनके धर्ममें नहीं है। ईसाका यह उपदेशभी आत्मौपम्य-सूत्रका एक भाग है, कि “ लोगोसे तुम अपने साथ जैसा बर्ताव कराना पसंद करते हो, उनके साथ तुम्हें स्वयंभी वैसाही बर्ताव करना चाहिये ” ( मा. ७. १२; ल्यू. ६. ३१ ) ; और यूनानी तत्त्व- वेत्ता आरिस्टाटलके ग्रंथमें मनुष्योंके परस्पर बर्ताव करनेका यही तत्त्व अक्षरशः बतलाया गया है। आरिस्टाटल ईसासे कोई तीन सौ वर्ष पहले हो गया; परंतु उससेभी लगभग दो सौ वर्ष पहले चीनी तत्त्ववेत्ता खुं-फू-त्से ( अंग्रेजी अपभ्रंश कानफ्यूशियस ) उत्पन्न हुआ था। उसने आत्मौपम्य दृष्टिका उल्लिखित नियम चीनी भाषाकी प्रणालीके अनुसार एकही शब्दमें बतला दिया है! परंतु यह तत्त्व हमारे यहाँ कानफ्यू- शियससेभी बहुत पहलेसे उपनिषदोंमें ( ईश. ६. केन. १२ ) और फिर महाभारतमें,
- सूत्र शब्दकी व्याख्या इस प्रकार की जाती है :- “ अल्पाक्षरमसन्दिग्धं सार- वद्विश्वतोमुखम् । अस्तोभमनवद्यं च सूत्रं सूत्रविदो विदुः ।। ” गानेके सुभीतेके लिये किसीभी मंत्रमें जिन अनर्थक अक्षरोंका प्रयोग किया जाता है, उन्हें स्तोभाक्षर कहते हैं। सूत्रमें ऐसे अनर्थक अक्षर नहीं होते। इसीसे इस लक्षणमें यह 'अस्तोभ' पद आया है।