श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
DevanagariHindipublished956 पृष्ठ
पृष्ठ 409, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 409
३६४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र शंकराचार्यका आक्षेप सरल अर्थकी अपेक्षा संन्यासनिष्ठा-प्रधान एकवाक्यताकी ओर विशेष था, एक और दूसरा कारणभी है। तैत्तिरीय उपनिषदके शांकरभाष्यमें (तै. २. ११) ईशावास्य. मंत्रका इतनाही भाग दिया है कि “अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते”; और उसके साथही यह मनुवचन भी दे दिया है, कि “तपसा कल्मषं हन्ति विद्ययाऽमृतमश्नुते” (मनु. १२. १०४); और इन दोनोंही वचनोंमें 'विद्या' शब्दका एकही मुख्यार्थ अर्थात् ब्रह्मज्ञान आचार्यने स्वीकार किया है। परंतु यहाँ आचार्यका कथन है, कि “तीर्त्वा = तैरकर या पारकर”, इस पदसे मृत्युलोकको तैर जानेकी क्रिया पहले पूरी हो जानेपर फिर (एक-साथही नहीं) विद्यासे अमृतत्व प्राप्त होनेकी क्रिया संघटित होती है। किंतु कहना नहीं होगा, कि यह अर्थ पूर्वार्धके 'उभयं सह' शब्दोंके विरुद्ध हो जाता है और प्रायः इसी कारणसे ईशावास्यके शांकरभाष्यमें यह अर्थ छोड़ दिया गया हो। कुछभी हो; ईशावास्यके ग्यारहवें मंत्रका शांकरभाष्यमें निराला व्याख्यान करनेका जो कारण है, वह इससे व्यक्त हो जाता है। यह कारण सांप्रदायिक है; और भाष्य-कर्ताकी सांप्रदायिक दृष्टि स्वीकार न करनेवालोंको प्रस्तुत भाष्यका यह व्याख्यान मान्य न होगा। यह बात हमेंभी मंजूर है, कि श्रीमच्छंकराचार्य जैसे अलौकिक ज्ञानी पुरुषके प्रतिपादन किये हुए अर्थको छोड़ देनेका प्रसंग यदि टले, तो अच्छा है! परंतु सांप्रदायिक दृष्टि त्यागनेसे ये प्रसंग तो आयेंगेही; और इसी कारण हमसे पहलेभी ईशावास्यके मंत्र - अर्थ शांकर- भाष्यसे विभिन्न प्रकारसे अर्थात् जैसे हम कहते हैं, वैसेही अन्य भाष्यकारोंने लगाये हैं। उदाहरणार्थ, वाजसनेयी संहितापर अर्थात् ईशावास्योपनिषदपरभी उवटाचार्यका जो भाष्य है, उसमें “विद्यां चाविद्यां च” इस मंत्रका व्याख्यान करते हुए ऐसा अर्थ दिया है, कि “विद्या = आत्मज्ञान और अविद्या = कर्म; इन दोनोंके एकीकरणसेही अमृत अर्थात् मोक्ष मिलता है।” अनंताचार्यने इस उपनिषदके अपने भाष्यमें इसी ज्ञान-कर्म-समुच्चयात्मक अर्थको स्वीकार कर अंतमें साफ लिख दिया है, कि “इस मंत्रका सिद्धान्त और “यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते” (गीता ५. ५), गीताके इस वचनका अर्थ एकही है, एवं गीताके इस श्लोकमें जो 'सांख्य' और 'योग' शब्द हैं, वे क्रमसे 'ज्ञान' और 'कर्म'के द्योतक हैं।”* इसी प्रकार अपरार्कदेवनेभी
- पुणेके आनंदाश्रममें ईशावास्योपनिषदकी जो पुस्तक छपी है, उसमें ये सभी भाष्य हैं; और याज्ञवल्क्य-स्मृतिकी अपरार्ककी टीकाभी आनंदाश्रममेंही पृथक् छपी है। प्रो. मेक्समुलरने उपनिषदोंका जो अनुवाद किये हैं, उनमें ईशावास्यका भाषांतर शांकरभाष्यके अनुसार नहीं है। उन्होंने भाषांतरके अंतमें इसके कारण बतलाये हैं (Sacred Books of the East Series, Vol. I. pp. 314-320)। अनंताचार्यका भाष्य मेक्समुलर साहबको उपलब्ध नहीं हुआ था; और उनके ध्यानमें यह बातभी आई हुई दीख नहीं पड़ती, कि शांकरभाष्यमें निराले अर्थ क्यों किये गये हैं?