भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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आश्रमही श्रेष्ठ माना गया है, इसलिये उपनिषदोंके ज्ञानप्रवाहसे कर्मकांडको जो गौणता प्राप्त हो गई थी, उसको हटानेकी सामर्थ्य स्मृतिकारोंकी आश्रम-व्यवस्थामें नहीं रह सकती थी । ऐसी अवस्थामें ज्ञानकांड और कर्मकांडमेंसे किसीकोभी गौण न कहकर भक्तिके साथ इन दोनोंका मेलकर देनेके लिये गीताकी प्रवृत्ति हुई है। उपनिषत्-प्रणेताओंके ये सिद्धान्त गीताको मान्य हैं, कि ज्ञानके बिना मोक्षप्राप्ति नहीं होती; और यज्ञ-याग आदि कर्मोंसे, यदि बहुत हुआ तो, स्वर्गप्राप्ति हो जाती है (मुंड. १. २. १०; गीता २. ४१-४५) । परंतु गीताका यहभी सिद्धान्त है, कि सृष्टिक्रमको जारी रखनेके लिये यज्ञ अथवा कर्मके चक्रकोभी कायम रखना चाहिये

  • कर्मोंको कभीभी छोड़ देना निरा पागलपन या मूर्खता है। इसलिये गीताका उपदेश है, कि यज्ञयाग आदि श्रौत कर्म अथवा चातुर्वर्ण्य आदि व्यावहारिक कर्म अज्ञानपूर्वक श्रद्धासे न करके ज्ञान-वैराग्ययुक्त बुद्धिसे केवल कर्तव्य समझकर करो। इससे यज्ञचक्रभी नहीं बिगड़ने पायेगा; और तुम्हारे किये हुए कर्म मोक्षके आड़ेभी नहीं आवेंगे। कहना नहीं होगा, कि ज्ञानकांड और कर्मकांडका (संन्यास और कर्म) मेल मिलानेकी गीताकी यह शैली स्मृति-कर्ताओंकी अपेक्षा अधिक सरस है। क्योंकि व्यष्टिरूप आत्माका कल्याण यत्किंचित्भी न घटाकर उसके साथ सृष्टिके समष्टिरूप आत्माका कल्याणभी गीता-मार्गसे साधा जाता है। मीमांसक कहते हैं, कि कर्म अनादि और वेदप्रतिपादित हैं, इसलिये ज्ञान न हो, तोभी कर्म श्रद्धासे करनेही चाहिये। कितनेही (सब नहीं) उपनिषत्प्रणेता कर्मोंको गौण मानते हैं और यह कहते हैं - या यह माननेमें कोई क्षति नहीं, कि निदान उनका झुकाव ऐसाही है - कि कर्मोंको वैराग्यसे छोड़ देना चाहिये; और स्मृतिकार आयुके भेदसे - अर्थात् आश्रम- व्यवस्थासे उक्त दोनों मतोंकी इस प्रकार एकवाक्यता करते हैं, कि पूर्व आश्रमोंमें इन कर्मोंको करते रहना चाहिये और फिर चित्तशुद्धि हो जानेपर बुढ़ापेमें वैराग्यसे उन सब कर्मोंको छोड़कर संन्यास ले लेना चाहिये। परंतु गीताका माग इन तीनों पंथोंसे भिन्न है। ज्ञान और काम्य कर्मोंके बीच, यदि विरोध हो, तोभी ज्ञान और निष्काम कर्मोंमें कोई विरोध नहीं; इसीलिये गीताका कथन है, कि निष्काम बुद्धिसे सब कर्म सर्वदा करते रहो, उन्हें कभी मत छोड़ो। अब इन चारों मतोंकी तुलना करनेसे दीख पड़ेगा, कि यह मत सभीको मान्य है, कि ज्ञान होनेके पहले कर्मकी आवश्यकता है; परंतु उपनिषदों और गीताका कथन है; कि ऐसी स्थितिमें श्रद्धासे किये हुए कर्मका फल, केवल स्वर्गके सिवा दूसरा कुछ नहीं होता। इसके आगे, अर्थात् ज्ञानप्राप्ति हो चुकनेपर, कर्म किये जावें या नहीं - इस विषयमें उपनिषत्- कर्ताओंमेंभी मतभेद है। कई उपनिषत्कर्ताओंका मत है, कि ज्ञानसे समस्त काम्य बुद्धिका ह्रास हो चुकनेपर जो पुरुष मोक्षका अधिकारी हो गया है, उसे केवल स्वर्गकी प्राप्ति करा देनेवाले काम्य कर्म करनेका कुछभी प्रयोजन नहीं रहता; परंतु ईशावास्य आदि दूसरे कई उपनिषदोंमें प्रतिपादन किया गया है, कि मृत्यु-