भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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३४६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र केही लिये है; प्रत्युत उसकी महत्ता यह कहकर गाई है, कि स्त्री और शूद्र आदि सब लोगोंको वह सुलभ है (गीता ९. ३२) । महाभारतमेंभी ऐसी कथाएँ हैं, कि तुलाधार (वैश्य) और व्याध (बहेलिया) इसी धर्मका आचरण करते थे; और उन्होंने ब्राह्मणोंकोभी उसका उपदेश किया था (मभा. शां. २६१; वन. २१५) । निष्काम कर्मयोगका आचरण करनेवाले प्रमुख पुरुषोंके जो उदाहरण भागवत धर्म- ग्रंथोंमें दिये जाते हैं, वे केवल जनक-श्रीकृष्ण आदि क्षत्रियोंकेही नहीं हैं; प्रत्युत उनमें वसिष्ठ, जैगीषव्य और व्यास प्रभृति ज्ञानी ब्राह्मणोंकाभी समावेश रहता है। यह न भूलना चाहिये, कि यद्यपि गीतामें कर्ममार्गही प्रतिपाद्य है, तोभी निरे कर्म अर्थात् ज्ञानरहित कर्म करनेके मार्गको गीता मोक्षप्रद नहीं मानती। ज्ञानरहित कर्म करनेकेभी दो भेद हैं। एक तो दंभसे या आसुरी बुद्धिसे कर्म करना और दूसरा श्रद्धासे। इनमेंसे दंभके मार्ग या आसुरी मार्गको केवल गीतानेही नहीं (गीता १६. १६; १७. २८) तो मीमांसकोंनेभी गर्ह्य तथा नरकप्रद माना है; एवं ऋग्वेदमेंभी अनेक स्थलोंपर श्रद्धाकी महत्ता वर्णित है (ऋ. १०. १५१; ९. ११३. २; २. १२. ५)। परंतु दूसरे मार्गके विषयमें- अर्थात् ज्ञान-व्यतिरिक्त किंतु शास्त्रोंपर श्रद्धा रखकर कर्म करनेके मार्गके विषयमें- मीमांसकोंका कहना है, कि परमेश्वरके स्वरूपका यथार्थ ज्ञान न हो; तोभी शास्त्रोंपर विश्वास रखकर केवल श्रद्धापूर्वक यज्ञायाग आदि कर्म मरणपर्यंत करते जानेसे अंतमें मोक्षही मिलता है। पिछले प्रकरण- में कह चुके हैं, कि कर्मकांडरूपसे मीमांसकोंका यह मार्ग बहुत प्राचीन कालसे चला आ रहा है। वेदसंहिता और ब्राह्मणोंमें यह कहींभी नहीं कहा गया है, कि संन्यास आश्रम आवश्यक है; उलटे जैमिनीने वेदोंका यही स्पष्ट मत बतलाया है, कि गृहस्थाश्रममें रहनेसेही मोक्ष मिलता है (वे. सू. ३. ४. १७-२०) और उसका यह कथन निराधारभी नहीं है। क्योंकि कर्मकांडके इस प्राचीन मार्गको गौण माननेका आरंभ उपनिषदोंमेंही पहले पहल देखा जाता है। यद्यपि उपनिषद् वैदिक हैं, तथापि उनके विषय-प्रतिपादनसे प्रकट होता है, कि वे संहिता और ब्राह्मणोंके पीछेके हैं, इसके माने यह नहीं, कि उसके पहले परमेश्वरका ज्ञान हुआही न था। हाँ, उप- निषत्कालमेंही यह मत पहले पहल अमलमें अवश्य आने लगा, कि मोक्ष पानेके लिये ज्ञानके पश्चात् वैराग्यसे कर्मसंन्यास करना चाहिये और उसके पश्चात् संहिता एवं ब्राह्मणोंमें वर्णित कर्मकांडको गौणत्व आ गया। उसके पहले कर्मही प्रधान माना जाता था। उपनिषत्कालमें वैराग्ययुक्त ज्ञान अर्थात् संन्यासकी इस प्रकार जीत होने लगनेपर यज्ञायाग प्रभृति कर्मोंकी ओर या चातुर्वर्ण्य धर्मकी ओरभी ज्ञानी पुरुष योंही दुर्लक्ष करने लगे; और तभीसे यह समझ मंद होने लगी, कि लोकसंग्रह करना हमारा कर्तव्य है। स्मृति-प्रणेताओंने अपने अपने ग्रंथोंमें यह कहकर, कि गृहस्थाश्रममें यज्ञायाग आदि श्रौत या चातुर्वर्ण्यके स्मार्त कर्म करनेही चाहिये, गृहस्था- श्रमकी बड़ाई गाई है सही; परंतु स्मृतिकारोंके मतमें और अंतमेंभी वैराग्य, संन्यास