भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 390

संन्यास और कर्मयोग ३४५ और यद्यपि सांख्य या संन्यास-मार्गसेही गीताका आरंभ हुआ है, तोभी आगे सिद्धान्त- पक्षमें प्रवृत्ति-प्रधान भागवत-धर्मही उसमें प्रतिपादित है, इस प्रकार यह स्वयं महा- भारतकारका वचन है, जो हम पहलेही प्रकरणमें दे चुके हैं। इन दोनों पंथोंके वैदिकही होनेके कारण सब अंशोंमें न सही; तो अनेक अंशोंमें दोनोंकी एकवाक्यता करना शक्य है। परंतु ऐसी एकवाक्यता करना एक बात है; और यह कहना दूसरी बात है, कि गीतामें संन्यास-मार्गही प्रतिपाद्य है और यदि कहीं कर्म-मार्गको मोक्षप्रद कहा हो, तो वह सिर्फ़ अर्थवाद या पोची स्तुति है। रुचिवैचित्र्यके कारण किसीको भागवत धर्मकी अपेक्षा स्मार्त-धर्मही बहुत प्यारा जँचेगा, अथवा कर्मसंन्यासके लिये जो कारण सामान्यतः बतलाये जाते हैं, वेही उसे अधिक बलवान् प्रतीत होंगे, नहीं कौन कहे ? उदाहरणार्थ, इसमें किसीको शंका नहीं, कि श्रीशंकराचार्यको स्मार्त या संन्यास-धर्मही मान्य था; अन्य सब मार्गोंको वे अज्ञानमूलक मानते थे। परंतु सिर्फ़ उसी कारणसे यह नहीं कहा जा सकता, कि गीताका भावार्थभी वही होना चाहिये। यदि तुम्हें गीताका सिद्धान्त मान्य नहीं है, तो कोई चिंता नहीं, उसे न मानो। परंतु उससे गीताके आरंभमें जो कहा है, कि “इस संसारमें आयु बितानेके दो प्रकारके स्वतंत्र मोक्षप्रद मार्ग अथवा निष्ठाएँ हैं” उसका ऐसा अर्थ करना उचित नहीं है कि “संन्यास-निष्ठाही एकमात्र सच्चा और श्रेष्ठ मार्ग है।” गीतामें वर्णित ये दोनों मार्ग, वैदिक धर्ममें, जनक और याज्ञवल्क्यके पहलेसेही स्वतंत्र रीतिसे चले आ रहे हैं। पता लगता है, कि जनकके समान समाजके धारण और पोषण करनेके अधिकार क्षात्र-धर्मके अनुसार, वंशपरंपरासे या अपनी सामर्थ्यसे जिनको प्राप्त हो जाते थे, वे ज्ञानप्राप्तिके पश्चात्भी निष्काम बुद्धिसे अपने काम जारी रखकर जगत्का कल्याण करनेमेंही अपनी सारी आयु लगा देते थे। समाजके इस अधिकारपर ध्यान देकरही महाभारतमें अधिकार-भेदसे दोहरा वर्णन आया है, कि “सुखं जीवन्ति मुनयो भैक्ष्यवृत्तिं समाश्रिताः” (शां. १७८. ११) – जंगलोंमें रहनेवाले मुनि आनंदसे भिक्षावृत्तिको स्वीकार करते हैं – और “दंड एव हि राजेंद्र क्षात्रधर्मो न मुण्डनम्” (मभा. शां. २३. ४६) – दंडसे लोगोंका धारण- पोषण करनाही क्षत्रियका धर्म है; मुंडन करा लेना नहीं। परंतु इससे यहभी न समझ लेना चाहिये, कि सिर्फ़ प्रजापालनके अधिकारी क्षत्रियोंकोही, उनके अधिकारके कारण, कर्मयोग विहित था। कर्मयोगके उल्लिखित वचनका ठीक भावार्थ यह है, कि जो जिस कर्मके करनेका अधिकारी हो, वह ज्ञानके पश्चात्भी उस कर्मको करता रहे; और इसी कारणसे महाभारतमें कहा है, कि “एषा पूर्वतरा वृत्तिर्ब्राह्मणस्य विधीयते” (शां. २३७) – ज्ञानके पश्चात् ब्राह्मणभी अपने अधिकारानुसार यज्ञ- याग आदि कर्म प्राचीन कालमें जारी रखते थे। मनुस्मृतिमेंभी संन्यास आश्रमके बदले सब वर्णोंके लिये वैदिक कर्मयोगही विकल्पसे विहित माना गया है (मनु. ६. ८६–९६)। इसी तरह यह कहीं नहीं लिखा है, कि भागवतधर्म केवल क्षत्रियों-