भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 389

३४४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र स्मृति-ग्रंथोंमें यह नियम कहींभी नहीं है, कि एक शिवकीही उपासना करनी चाहिये । इसके विपरीत, विष्णुकाही वर्णन अधिक पाया जाता है और कुछ स्थलोंपर तो गणपति प्रभृतिकोभी उपास्य बतलाया है। इसके सिवा शिव और विष्णु, दोनों देवता वैदिक हैं अर्थात् वेदमैंही इनका वर्णन किया गया है, इसलिये इनमेंसे एककोही स्मार्त कहना ठीक नहीं है। श्रीशंकराचार्य स्मार्त मतके पुरस्कर्ता कहे जाते हैं। पर शांकर मठमें उपास्य-देवता शारदा है और शांकरभाष्यमें जहाँ जहाँ प्रतिमा-पूजनका प्रसंग छिड़ा है, वहाँ वहाँ आचार्यने शिवलिंगका निर्देश न कर शालग्राम अर्थात् विष्णु-प्रतिमाकाही उल्लेख किया है (वे. सू. शां. भा. १. २. ७; १. ३. १४; ४. १. ३; छां. शां. भा. ८. १. १)। इसी प्रकार कहा जाता है, कि पंचदेवपूजाका प्रारंभभी पहले पहल शंकराचार्यनेही किया था। इन सब बातोंका विचार करनेसे यही सिद्ध होता है, कि केवल 'शिवभक्त' या 'विष्णुभक्त' इनपर ध्यान नहीं देना चाहिये। किंतु जिनकी दृष्टिसे स्मृति-ग्रंथोंमेंही पहले स्पष्ट रीतिसे वर्णित आश्रम- व्यवस्थाके अनुसार तरुण अवस्थामें यथाशास्त्र संसारके सब कार्य करनेपर बुढ़ापेमें समस्त कर्म छोड़ चतुर्थाश्रम या संन्यास लेनाही अंतिम साध्य था, वेही स्मार्त कहलाते थे और जो लोग भगवानके उपदेशानुसार यह समझते थे, कि ज्ञान एवं उज्ज्वल भगवद्भक्तिके साथ-ही-साथ मरणपर्यंत गृहस्थाश्रमकेही कार्य निष्काम बुद्धिसे करते रहना चाहिये, उन्हें भागवत कहते थे। इन दोनों शब्दोंके मूल अर्थ यही हैं; और इसीसे ये दोनों शब्द, सांख्य और योग अथवा संन्यास और कर्मयोगके क्रमशः समानार्थक होते हैं। भगवानके अवतारकृत्यसे कहो या ज्ञानयुक्त गार्हस्थ्य-धर्मके महत्त्वपर ध्यान देनेसे कहो; संन्यास-आश्रम लुप्त-सा हो गया था; और कलि- वर्ज्योंमें अर्थात् कलियुगमें जिन बातोंको शास्त्रने निषिद्ध माना है, उनमें संन्यासकी गिनती की गई थी।* फिर जैन और बौद्ध धर्मके प्रवर्तकोंने कापिलसांख्यके मतको स्वीकारकर, इस मतका विशेष प्रचार किया, कि संसारका त्यागकर संन्यास लिये- बिना मोक्ष नहीं मिलता। इतिहासमें प्रसिद्ध है, कि बुद्धने स्वयं तरुण अवस्थामेंही राजपाट, स्त्री और बाल-बच्चोंको छोड़कर संन्यास-दीक्षा ले ली थी। यद्यपि श्री- शंकराचार्यने जैन और बौद्ध मतोंका खंडन किया है, तथापि जैन और बौद्धोंने जिस संन्यास-धर्मका विशेष प्रचार किया था, उसेही श्रौत-स्मार्त संन्यास कहकर आचार्यने कायम रखा। और उससे उन्होंने गीताका इत्यर्थभी ऐसा निकाला, कि वही संन्यास- धर्म गीताका प्रतिपाद्य विषय है। परंतु वास्तवमें गीता स्मार्त-मार्गका ग्रंथ नहीं है

  • निर्णयसिंधुके तृतीय परिच्छेदका कलिवर्ज्य प्रकरण देखो। इसमें "अग्नि- होत्रं गवालम्भं संन्यासं पलपैतृकम् । देवराच्च सुतोत्पत्तिः कलौ पंच विवर्जयेत् ” और “संन्यासश्च न कर्तव्यो ब्राह्मणेन विजानता” इत्यादि स्मृतिवचन हैं। अर्थ : अग्निहोत्र, गोवध, संन्यास, श्राद्धमें मांस-भक्षण और नियोग, कलियुगमें ये पाँचों निषिद्ध हैं। इनमेंसे संन्यासका निषिद्धत्व श्रीशंकराचार्यने पीछेसे निकाल डाला।