श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंछूट जाना और ब्रह्मात्मैक्यको पहचानना है, एवं इसीलिये स्मृतिकारोंने गृहस्थाश्रमके कर्म विहित माने हैं। याज्ञवल्क्यने मैत्रेयीको जो "आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः" आदि उपदेश किया है, उसका मर्मभी यही है। अध्यात्मज्ञानकी नींवपर रचा हुआ कर्म- योगशास्त्र सबसे कहता है, कि "आत्मा वै पुत्रनामासि" मेंही आत्माकी व्यापकताको संकुचित न करके उसकी इस स्वाभाविक व्याप्तीको पहचानो, कि "लोको वै अय- मात्मा", और इस समझसे बर्ताव किया करो, कि "उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुं- बकम्" - यह सारी पृथिवीही बड़े लोगोंकी घरगृहस्थी है; प्राणिमात्रही उनका परिवार है। हमें विश्वास है, कि इस विषयमें हमारा कर्मयोगशास्त्र अन्यान्य देशोंके पुराने अथवा नये, किसीभी कर्मयोगशास्त्रसे हारनेवाला नहीं है; यही नहीं, तो उन सबको अपने पेटमें रखकर परमेश्वरके समान 'दश अंगुल' बचा रहेगा। इसपरभी कुछ लोग कहते हैं, कि आत्मौपम्य-भावसे 'वसुधैव कुटुंबकम्' रूपी वेदान्ती और व्यापक दृष्टि हो जानेपर हम सिर्फ उन सद्गुणोंकोही न खो बैठेंगे, कि जिन देशाभिमान, कुलाभिमान और धर्माभिमान आदि सद्गुणोंसे कुछ वंश अथवा राष्ट्र आजकल उन्नत अवस्थामें हैं, प्रत्युत यदि कोई हमें मारने या कष्ट देने आवेगा, तो "निर्वैरः सर्वभूतेषु” (गीता ११. ५५), गीताके इस वाक्यानुसार उसको दुष्ट-बुद्धिसे उलटकर न मारना हमारा धर्म हो जायगा (धम्मपद ३३८)। अतः दुष्टोंका प्रतिकार न होगा; और इस कारण उनके बुरे कर्मोंमें साधु-पुरुषोंकी जान जोखिममें पड़ जायेगी और दुष्टोंका दबदबा हो जानेसे पूरे समाज अथवा सारे राष्ट्रका उसमे नाशभी हो जावेगा। महाभारतमें स्पष्टही कहा है, कि "न पापे प्रनिपापः स्यात्साधुरेव सदा भवेत्” (मभा. वन. २०६. ४८) दुष्टोंके साथ दुष्ट न हो जावे; साधुतासे वर्ते, क्योंकि दुष्टतासे अथवा वैर निकालनेसे वैर कभी नष्ट नहीं होता - "न चापि वैरं वैरेण केशव व्युपशाम्यति ।" इसके विपरीत जिसकी हम पराजय करते हैं, वह स्वभावमेही दुष्ट होनेके कारण पराजित होनेपर औरभी अधिक उपद्रव मचाता रहता है, तथा वह फिर बदला लेनेका मौका खोजता रहता है - "जयो वैरं प्रसृजति ।" अतएव महाभारतमे स्पष्ट कहा है कि, शांतिसेही दुष्टोंका निवारण कर देना चाहिये (मभा. उद्यो. ७१. ५९, ६३)। महाभारतके येही श्लोक बौद्ध ग्रंथोंमें हैं (धम्मपद ५, २०१; महावग्ग १०. २, ३); और ऐसेही ईसानेभी इसी तत्त्वका अनुवाद इस प्रकार किया है, कि "तू अपने शत्रुओंसे प्रीति कर।" (मेथ्यू. ५. ४४); और "कोई एक कनपटीमें मारे, तो तू दूसरीभी आगे कर दे" (मेथ्यू. ५. ३९; ल्यू. ६. २९)। ईसामसीहसे पहलेके चीनी तत्त्वज्ञ ला-ओ-त्सेकाभी ऐसाही कथन है; और महाराष्ट्रकी संत-मंडलीमें तो एकनाथ महाराज जैसे साधुओंके इस प्रकार आचरण करनेकी बहुतेरी कथाएँभी हैं। क्षमा अथवा शांतिकी पराकाष्ठाका उत्कर्ष दिखलानेवाले इन उदाहरणोंकी पुनीत योग्यताको घटानेका हमारा कदापि हेतु नहीं है। इसमें कोई संदेह नहीं, कि सत्यसमानही यह क्षमा-धर्मभी अंतमें -