श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअर्थात् समाजकी पूर्णावस्थामें – अपवादरहित और नित्यरूपसे बना रहेगा। और बहुत क्या कहें, समाजकी वर्तमान अपूर्णावस्थामेंभी अनेक अवसरोंपर देखा जाता है, कि जो काम शांतिसे हो जाता है, वह क्रोधसे नहीं होता। जब अर्जुन देखने लगा, कि दुष्ट दुर्योधनकी सहायता करनेके लिये कौन कौन योद्धा आये हैं, तब उनमें पिता- मह और गुरु जैसे पूज्य मनुष्योंपर दृष्टि पड़तेही उसके ध्यानमें यह बात आ गई, कि दुर्योधनकी दुष्टताका प्रतिकार करनेके लिये मुझे केवल कर्मही नहीं करना पड़ेगा, तो अर्थासक्त गुरुजनोंको शस्त्रोंसे मारनेका दुष्कर कामभी करना पड़ेगा, (गीता २. ५)। और इसीसे वह कहने लगा, कि यद्यपि दुर्योधन दुष्ट हो गया है, तथापि "न पापे प्रतिपापः स्यात्" वाले न्यायसे मुझेभी उसके साथ दुष्ट न हो जाना चाहिये। "यदि वे मेरी जानभी ले लें, तोभी (गीता १. ४६) मेरा 'निर्वैर' अंतःकरणसे चुपचाप बैठ रहनाही उचित है।" अर्जुनकी इस शंकाको दूर भगा देनेके लियेही गीता- शास्त्रकी प्रवृत्ति हुई है; और यही कारण है, कि गीतामें इस विषयका जैसा स्पष्टीकरण किया गया है, वैसा और किसीभी धर्मग्रंथमें नहीं पाया जाता। उदाहरणार्थ, बौद्ध और ईसाई धर्म निर्वैरत्वके तत्त्वको वैदिक धर्मके समानही स्वीकार तो करते हैं; परंतु उनके धर्म-ग्रंथोंमें यह बात स्पष्टतया कहींभी नहीं बतलाई है, कि लोकसंग्रहकी अथवा आत्मसंरक्षणकीभी चिंता न करनेवाले सर्व कर्मत्यागी संन्यासी पुरुषका व्यव- हार और बुद्धिके अनासक्त एवं निर्वैर हो जानेपरभी उसी अनासक्त और निर्वैर- बुद्धिसे सारे बर्ताव करनेवाले कर्मयोगीका व्यवहार, ये दोनों सर्वांशमें एक नहीं हो सकते। इसके विपरीत पश्चिमी नीतिशास्त्रवेत्ताओंके आगे यह समस्या है, कि ईसाने जो उपरोक्त निर्वैरत्वका उपदेश किया है, उसका जगत्की नीतिसे समुचित मेल कैसे मिलावें?* और नित्शे नामक आधुनिक जर्मन पंडितने जो अपने ग्रंथोंमें यह मत लिखा है, कि निर्वैरत्वका यह धर्म-तत्त्व गुलामीका और घातक है; एवं इसीको श्रेष्ठ माननेवाले ईसाई धर्मने यूरोप खंडको नामर्द कर डाला है। परंतु हमारे धर्म- ग्रंथोंको देखनेसे ज्ञात होगा, कि न केवल गीताको, प्रत्युत मनुकोभी यह बात पूर्णतया अवगत और संमत थी, कि संन्यास और कर्मयोग इन दोनों धर्म-मार्गोंसे इस विषयमें भेद करना चाहिये। क्योंकि मनुने यह नियम, "क्रुध्यन्तं न प्रतिक्रुध्येत्" – क्रोधित होनेवालेपर फिर क्रोध न करो (मनु. ६. ४८); न गृहस्थ-धर्ममें बतलाया है; और न राज-धर्ममें; बतलाया है केवल यति-धर्ममेंही। परंतु आजकलके टीकाकार इस बातपर ध्यान नहीं देते, कि इन वचनोंमेंसे कौन वचन किस मार्गका है अथवा उसका कहाँ उपयोग करना चाहिये? उन लोगोंने संन्यास और कर्ममार्ग इन दोनों मार्गोंके परस्पर-विरोधी सिद्धांतोंको गड़बड़कर एकत्र कह डालनेकी जो प्रणाली अपनायी है, उस प्रणालीसे प्रायः कर्मयोगके सच्चे सिद्धांतोंके संबंधमें कैसे भ्रम
- See Paulsen's System of Ethics, Book III, chap. X (Eng. Trans). and Nietzsche's Anti-Christ.