भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 439

३९४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र उत्पन्न हो जाता है, उसका वर्णन हम पाँचवें प्रकरणमें कर चुके हैं। गीताके टीका- कारोंकी इस भ्रामक पद्धतिको छोड़ देनेसे सहजही ज्ञात हो जाता है, कि भागवत- धर्मी कर्मयोगी 'निर्वैर' शब्दका क्या अर्थ करते हैं; क्योंकि ऐसे अवसरपर दुष्टोंके साथ कर्मयोगी गृहस्थको कैसे बर्ताव करना चाहिये, उसके विषयमें परम भगवद्- भक्त प्रल्हादनेही कहा है, कि "तस्मान्नित्यं क्षमा तात पंडितैरपवादिता" (महा. वन. २८. ८) - हे तात ! इसी हेतु चतुर पुरुषोंने क्षमाके लिये सदा अपवाद बत- लाये हैं। जो कर्म हमें दुःखदायी हो, वही कर्म करके दूसरोंको दुःख न देनेका, आत्मौ- पम्य-दृष्टिका सामान्य धर्म है तो ठीक; परंतु महाभारतमें निर्णय किया गया है, कि जिस समाजमें इसी आत्मौपम्य-दृष्टिवाले सामान्य धर्मकी पड़तालके इस दूसरे धर्मके, कि हमेंभी दूसरे लोग दुःख न दें, पालनेवाले न हों, उस समाजमें किसी एकके इस धर्मको पालनेसे कोई लाभ न होगा। यह समता शब्दही दो व्यक्तियोंसे संबद्ध अर्थात् सापेक्ष है। अतएव आततायी पुरुषको मार डालनेसे जैसे अहिंसा धर्ममें बट्टा नहीं लगता, वैसेही दुष्टोंको उचित शासन कर देनेसे साधुओंकी आत्मौपम्य-बुद्धि या निर्वैरतामेंभी कुछ न्यूनता नहीं आती; बल्कि दुष्टोंके अन्यायका प्रतिकारकर दूसरोंको बचा लेनेका श्रेय अवश्य मिल जाता है। जिस परमेश्वरकी अपेक्षा किसीकीभी बुद्धि अधिक सम नहीं है; वह परमेश्वरभी जब साधुओंकी रक्षा और दुष्टोंका विनाश करनेके लिये समय समयपर अवतार लेकर लोकसंग्रह किया करता है (गीता ४. ७, ८), तब और पुरुषोंकी तो बातही क्या है ! यह कहना भ्रममूलक है, कि 'वसुधैव कुटुंबकम्' रूपी दृष्टि हो जानेसे अथवा फलाशा छोड़ देनेसे पात्रता-अपात्रताका अथवा योग्यता-अयोग्यताका भेदभी मिट जाना चाहिये। गीताका सिद्धान्त यह है, कि फलकी आशामें ममत्व-बुद्धि प्रधान होती है; और उसे छोड़ेबिना पाप-पुण्यसे छुटकारा नही मिलता। किंतु यदि किसी सिद्ध पुरुषको अपना स्वार्थ साधनेकी आवश्यकता न हो, तथापि यदि वह किसी अयोग्य आदमीको कोई ऐसी वस्तु ले लेने दे, कि जो उसके योग्य नहीं; तो उस सिद्ध पुरुषको अयोग्य आद- मियोंकी सहायता करनेका तथा योग्य साधुओं एवं समाजकीभी हानि करनेका पाप लगे बिना न रहेगा। कुबेरसे टक्कर लेनेवाला करोड़पति साहूकार यदि बाजारमें तरकारी लेने जावे, तो जिस प्रकार वह हरी धनियांकी गड्डी की कीमत लाख रुपये नहीं दे देता, उसी प्रकार पूर्ण साम्यावस्थामें पहुँचा हुआ पुरुष किसीकी पात्रता- अपात्रताका तारतम्य भूल नहीं जाता। उसकी बुद्धि सम तो रहती है; पर समताका यह अर्थ नहीं है, कि गायका चारा मनुष्यको और मनुष्यका भोजन गायको खिला दे। तथा भगवानने गीता (गीता १७. २०) मेंभी कहा है, कि 'दातव्य' समझकर जो सात्विक दान करना है, वहभी इसी "देशे काले च पात्रे च" अर्थात् देश, काल और पात्रताका विचारकर देना चाहिये। साधु-पुरुषोंकी साम्य-बुद्धिके वर्णनमें ज्ञानेश्वर महाराजने उन्हें पृथिवीकी उपमा दी है। इसी पृथिवीका दूसरा नाम 'सर्वसहा' है; किंतु