भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 440

सिद्धावस्था और व्यवहार ३९५ यह 'सर्वसहा'भी, यदि इसे कोई लात मारे, तो मारनेवालेके तलवेमें उतनेही जोरका प्रत्याघात कर अपनी समता-बुद्धि व्यक्त कर देती है। इससे भली भाँति समझा जा सकता है, कि मनमें वैर न रहनेपरभी (अर्थात् निर्वैर) प्रतिकार कैसे किया जाता है ? कर्मविपाक प्रक्रियामें कह चुके हैं, कि इसी कारणसे भगवान्भी " ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् " ( गीता ४. ११ ) – जो मुझे जैसे भजते हैं, उन्हें वैसेही फल देता हूँ – इस प्रकार व्यवहार तो करते हैं; परंतु फिरभी 'वैषम्य-नैर्घृण्य' दोषोंसे अलिप्त रहते हैं। इसी प्रकार व्यवहार अथवा कानून-कायदेमेंभी खूनी आदमीको फाँसीकी सजा देनेवाले न्यायाधीशको, कोई उसका दुश्मन नहीं कहता । अध्यात्मशास्त्रका सिद्धान्त है, कि जब किसीकी बुद्धि निष्काम होकर साम्यावस्था में पहुँच जावे, तब वह मनुष्य अपनी इच्छासे किसी दूसरेका नुकसान नहीं करता, उससे यदि किसी दूसरेका नुकसान होभी जाय, तो समझना चाहिये, कि वह दूसरेके कर्मका फल है; अथवा निष्काम बुद्धिवाला स्थितप्रज्ञ ऐसे समयपर जो काम करता है – फिर देखनेमें वह मातृ-वध या गुरु-वध-सरीखा कितनाही भयंकर क्यों न हो – उसके शुभ- अशुभ फलका बंधन अथवा लेप उसको नहीं लगता ( गीता ४. १४ ; ९. २८; १८. १७ ) । फ़ौजदारी कानूनमें आत्मसंरक्षाके जो नियम हैं वे इसी तत्त्वपर रचे गये हैं। कहते हैं, कि जब लोगोंने मनुसे राजा होनेकी प्रार्थना की, तब उन्होंने पहले यह उत्तर दिया, कि " अनाचारसे चलनेवालोंका शासन करनेके लिये राज्यको स्वीकार करके मैं पापमें नहीं पड़ना चाहता।" परंतु जब लोगोंने यह वचन दिया, कि " तमब्रुवन् प्रजाः मा भैः कर्तृनेनो गमिष्यति " (मभा. शां. ६७. २३) – डरिये नहीं, जिसका पाप उसीको लगेगा, आपको तो रक्षा करनेका पुण्यही मिलेगा; और प्रतिज्ञा की, कि " प्रजाकी रक्षा करनेमें जो खर्च लगेगा, उसे हम लोग 'कर' देकर पूरा करेंगे", तब मनुने प्रथम राजा होना स्वीकार किया । सारांश, जैसे अचेतन सृष्टिका कभीभी न बदलनेवाला यह नियम है, कि " आघातके बराबरही प्रत्याघात " हुआ करता है; वैसेही सचेतन सृष्टिमें उस नियमका यह रूपांतर है, कि " जैसेको तैसा " होना चाहिये । वे साधारण लोग, कि जिनकी बुद्धि साम्या- वस्थामें पहुँच नहीं गई है, इस कर्मविपाकके नियमके विषयमें अपनी ममत्व-बुद्धि उत्पन्न कर लेते हैं, और क्रोधसे अथवा द्वेषसे आघातकी अपेक्षा अधिक प्रत्याघात करके आघातका बदला लिया करते हैं; अथवा अपनेसे दुबले मनुष्यके साधारण या काल्प- निक अपराधके लिये प्रतिकार-बुद्धिके निमित्तसे उसको लूट कर अपना फायदा कर लेनेके लिये सदा प्रवृत्त होते हैं। किंतु साधारण मनुष्योंके समान बदला लेनेकी, दंभकी, अभिमानकी, क्रोधसे – लोभसे, या द्वेषसे दुर्बलोंको लूटनेकी अथवा टेकसे अपने अभिमान, शेखी, सत्ता और शक्तिकी प्रदर्शनी दिखलानेकी बुद्धि जिसके मनमें न रहे, उसकी शांत, निर्वैर और सम-बुद्धि वैसेही नहीं बिगड़ती है, जैसे कि अपने ऊपर गिरी हुई गेंदको सिर्फ़ पीछे लौटा देनेसे बुद्धिमें कोईभी विकार नहीं उपजता; और