भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 441, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 441

३९६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र लोकसंग्रहकी दृष्टिसे ऐसे प्रत्याघातस्वरूप कर्म करना उसका धर्म अर्थात् कर्तव्य हो जाता है, कि जिससे दुष्टोंका दबदबा बढ़ कर कहीं गरीबोंपर अत्याचार न होने पावे ( गीता ३. २५ ) । गीताकेरे सा उपदेशका सार यही है, कि ऐसे प्रसंगपर सम-बुद्धिसे किया हुआ घोर युद्धभी धर्म्य और श्रेयस्कर है । वैरभाव न रखकर सबसे बर्तना, दुष्टोंके साथ दुष्ट न बन जाना, क्रोध करनेवालेपर क्रुद्ध न होना आदि धर्म- तत्त्व स्थितप्रज्ञ कर्मयोगीको मान्य तो हैही; परंतु संन्यासमार्गका यह मत कर्मयोग नहीं मानता, कि 'निर्वैर' शब्दका अर्थ केवल निष्क्रिय अथवा प्रतिकारशून्य है; किंतु वह निर्वैर शब्दका सिर्फ इतनाही अर्थ मानता है कि वैर अर्थात् मनकी दुष्ट बुद्धि छोड़ देनी चाहिये; और जब कि कर्म किसीके छूटने हैही नहीं, तब उसका कथन है, कि सिर्फ़ लोकसंग्रहके लिये अथवा प्रतिकारार्थ जितने कर्म आवश्यक और शक्य हों, उतने कर्म मनमें दुष्ट बुद्धिको स्थान न देकर - केवल कर्तव्य समझ - वैराग्य और निःसंग-बुद्धिसे करते रहना चाहिये ( गीता ३. १९ ) । अतः इस श्लोकमें ( गीता ११. ५५ ) सिर्फ 'निर्वैर' पदका प्रयोग न करते हुए - मत्कर्मकृन् मत्परमो मद्भक्तः संगवर्जितः । निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पांडव ॥ उसके पूर्व इस दूसरे महत्त्वके विशेषणकाभी प्रयोग करके - कि 'मत्कर्मकृत्' अर्थात् “ मेरे याने परमेश्वरके प्रीत्यर्थ अर्थात् परमेश्वरार्पण-बुद्धिसे सारे कर्म करनेवाला ”

  • भगवानने गीतामें निर्वैरत्व और निष्काम कर्मका, भक्तिकी दृष्टिसे, मेल मिला दिया है । इसीसे शांकरभाष्य तथा अन्य टीकाओंमेंभी कहा है, कि इस श्लोकमें पूरे गीता-शास्त्रका निचोड़ आ गया है । गीतामें यह कहींभी नहीं बतलाया, कि बुद्धिको निर्वैर करनेके लिये या उसके निर्वैर हो चुकने परभी, सभी प्रकारके कर्म छोड़ देने चाहिये । इस प्रकार प्रतिकारका कर्म निर्वैरत्व और परमेश्वरार्पण-बुद्धिसे करनेपर कर्ताको उसका कोईभी पाप या दोष तो लगताही नहीं; उलटे, प्रतिकारका काम हो चुकनेपर, जिन दुष्टोंका प्रतिकार किया गया है, उन्हींका आत्मौपम्य-दृष्टिसे कल्याण करनेकी बुद्धिभी मनसे नष्ट नहीं होनी । एक उदाहरण लीजिये; दुष्ट कर्मके कारण रावणको, निर्वैर और निष्पाप रामचंद्रने युद्धमें मार तो डाला; पर उसकी उत्तरक्रिया करनेमें जब विभीषण हिचकने लगा, तब रामचंद्रने उसको समझाया कि :- मरणांतानि वैराणि निर्वृत्तं नः प्रयोजनम् । क्रियतामस्य संस्कारो ममाप्येष यथा तव ॥ “ ( रावणके मनका ) वैर मरणके साथ चुकही गया । हमारा ( दुष्टोंका नाश करनेका ) काम हो चुका । अब यह जैसा तेरा ( भाई ) है, वैसाही मेराभी है । इसलिये इसका अग्निसंस्कार कर” ( वाल्मीकि रा. ६. १०९. २५ ) रामायणका