भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 442

सिद्धावस्था और व्यवहार ३९७ यह तत्त्व भागवतमेंभी (भाग. ८. १९. १३) एक स्थानपर बतलाया गया है; और अन्यान्य पुराणोंमें जो ये कथाएँ हैं-कि भगवानने जिन दुष्टोंका संहार किया, उन्हींको फिर दयालु होकर सद्गति दे डाली - उनका रहस्यभी यही है। इन्हीं सब विचारोंको मनमें लाकर श्रीसमर्थ रामदासस्वामीने कहा है, कि "उद्धतके लिये उद्धत होना चाहिये।" और महाभारतमें भीष्मने परशुरामसे कहा है :- यो यथा वर्तते यस्मिन् तस्मिन्नेवं प्रवर्तयन् । नाधर्मं समवाप्नोति न चाश्रेयश्च विन्दति ॥ "अपने साथ जो जैसा बर्ताव करता है, उसके साथ वैसेही बर्तनेसे न तो अधर्म (अनीति) होता है; और न अकल्याणभी" (महा. उद्यो. १७९. ३०)। फिर आगे चलकर शांतिपर्वके सत्यानृत अध्यायमें फिर वही उपदेश युधिष्ठिरको किया है :- यस्मिन् यथा वर्तते यो मनुष्यः तस्मिन् तथा वर्तितव्यं स धर्मः । मायाचारो मायया बाधितव्यः साध्वाचारः साधुना प्रत्युपेयः ॥ "अपने साथ जो जैसा बर्ताव है, उसके साथ वैसाही बर्ताव करना धर्मनीति है। मायावी पुरुषके साथ मायावीपनसे और साधु पुरुषके साथ साधुताका व्यवहार करना चाहिये" (महा. शां. १०९. २९; उद्यो. ३६. ७)। ऐसेही ऋग्वेदमें इंद्रको उसके मायावीपनका दोष न देकर उसकी स्तुतिहीकी गई है, कि- "त्वं मायाभिरनवद्य मायिनं ... वृत्रं अर्दयः ।" (ऋ. १०. १४७. २; १. ८०. ७)- हे निष्पाप इंद्र ! मायावी वृत्रको तूने मायासेही मारा है। और भारवि कविने अपने 'किरातार्जुनीय' काव्यमेंभी ऋग्वेदके तत्त्वकाही अनुवाद इस प्रकार किया है :- व्रजन्ति ते मूढधियः पराभवं । भवन्ति मायाविषु ये न मायिनः ॥ “मायावियोंके साथ जो मायावी नहीं बनते, वे नष्ट हो जाते हैं" (किरा. १. ३०)। परंतु यहाँ और एक बातपर ध्यान देना चाहिये, कि दुष्ट पुरुषका प्रतिकार यदि साधुतामे हो सकता हो, तो पहले साधुतासेही करे। क्योंकि दूसरा यदि दुष्ट हो जाय, तो उसके साथ हमेंभी दुष्ट न हो जाना चाहिये, कोई एक यदि नकटा हो जाय तो सारा गाँवका गाँव अपनी नाक नहीं कटा लेता ! और क्या कहें, यह धर्म हैभी नहीं। इस "न पापे प्रतिपापः स्यात्" सूत्रका ठीक भावार्थ यही है; और इसी कारणसे विदुरनीतिमें धृतराष्ट्रको पहले यही नीतितत्त्व बतलाया गया है, कि "न तत्परस्य सन्दध्यात् प्रतिकूलं यदात्मनः" - जो व्यवहार स्वयं अपने लिये प्रतिकूल मालूम हो, वैसा बर्ताव दूसरोंके साथ न करे। इसके पश्चातही विदुरने कहा है :- अक्रोधेन जयेत्क्रोधं असाधुं साधुना जयेत् । जयेत्कदर्यं दानेन जयेत् सत्येन चानृतम् ॥