श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३९८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र “ ( दूसरेके ) क्रोधको ( अपनी ) शांतिसे जीते । दुष्टको साधुतासे जीते । कृपणको दानसे जीते; और अनृतको सत्यसे जीते ” ( मभा. उद्यो. ३८. ७३, ७४ ) । पाली भाषामें बौद्धोंका जो ‘धम्मपद’ नामक नीतिग्रंथ है, उसमें ‘( धम्म. २३३ ) इसी श्लोकका ज्यों का त्यों अनुवाद है :-- अक्कोधेन जिने कोधं असाधुं साधुना जिने । जिने कदरियं दानेन सच्चेनलीकवादिनम् ॥ शांतिपर्वमें युधिष्ठिरको उपदेश करते हुए भीष्मनेभी इसी नीति-तत्त्वके गौरवका वर्णन इस प्रकार किया है :- कर्म चैतदसाधूनां असाधु साधुना जयेत् । धर्मेण निधनं श्रेयो न जयः पापकर्मणा ॥ “ दुष्टकी असाधुता अर्थात् दुष्ट कर्मका साधुतासे निवारण करना चाहिये । क्योंकि पापकर्मसे प्राप्त जीतकी अपेक्षा धर्मसे अर्थात् नीतिसे मर जानाभी श्रेयस्कर है ” ( मभा. ९५. १६ ) । किंतु ऐसी साधुतासे यदि दुष्टके दुष्कर्मोंका निवारण न होता हो, अथवा साम-उपचार और मेल-जोलकी बात इन दुष्टोंको नापसंद हो, तो ‘कण्ट- केनैव कण्टकम् ’के न्यायसे जो काँटा इन पुल्टिससे बाहर न निकलता हो, उसको साधारण काँटेसे अथवा लोहेके कांटे ( सुई ) सेही बाहर निकाल डालना आवश्यक है ( दास. १९. ९. १२-३१ ) । क्योंकि, प्रत्येक समय लोकसंग्रहके लिये दुष्टोंका निग्रह करना, भगवानके समान, साधु-पुरुषोंकाभी धर्मकी दृष्टिसे पहला कर्तव्य है । ‘ साधुतासे दुष्टताको जीते ’ इस वाक्यमेंही पहले यही बात मानी गई है, कि दुष्टता- को जीत लेना अथवा उसका निवारण करना साधु-पुरुषका पहला कर्तव्य है । फिर उसकी सिद्धिके लिये बतलाया है, कि पहले किस उपायकी योजना करे । यदि साधुतासे उसका निवारण न हो सकता हो - सीधी अँगुलीसे घी न निकले - तो ‘ जैसेको तैसे ’ बन कर दुष्टताका निवारण करनेमेंसे हमें हमारे धर्म-ग्रंथकार कभीभी नहीं रोकते । वे यह कहींभी प्रतिपादन नहीं करते, कि दुष्टताके आगे साधुपुरुष अपना बलिदान खुशीसे किया करें । सदा ध्यान रहे, कि जो पुरुष अपने बुरे कामोंसे पराई गर्दनें काटनेपर उतारू हो गया, उसे यह कहनेका कोईभी नैतिकहक़ नहीं रह जाता, कि और लोग मेरे साथ साधुताका बर्ताव करें । धर्म- शास्त्रमें स्पष्ट आज्ञा है ( मनु. ८. १९, ३५१ ), कि इस प्रकार जब साधु-पुरुषोंको कोई असाधु काम लाचारीसे करना पड़े, तो उसकी जिम्मेदारी शुद्ध बुद्धिवाले साधु-पुरुषोंपर नहीं रहती, किंतु उसका जिम्मेदार वही दुष्ट पुरुष हो जाता है, कि जिसके दुष्ट कर्मोंकाही वह नतीजा है । स्वयं बुद्धने देवदत्तका जो शासन किया, उसकी उपपत्ति बौद्ध ग्रंथकारोंनेभी इसी तत्त्वपर लगाई है ( मिलिंद प्र. ४. १. ३०-३४ ) । जड़ सृष्टिके व्यवहारमें ये आघात-प्रत्याघातरूपी कर्म नित्य और