भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 444, कुल 956 में से

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सिद्धावस्था और व्यवहार ३९९ बिलकुल ठीक होते हैं। परंतु मनुष्यके व्यवहार उसके इच्छाधीन हैं, और ऊपर जिस त्रैलोक्य-चिंतामणिकी माताका उल्लेख किया है, उसके दुष्टोंपर प्रयोग करनेका निश्चित विचार जिस धर्मज्ञानसे होता है, वह धर्मज्ञानभी अत्यंत सूक्ष्म है; इस कारण विशेष अवसरपर बड़े बड़े लोगभी सचमुच इस दुविधामें पड़ जाते हैं, कि जो हम करना चाहते हैं, वह योग्य है या अयोग्य ? अथवा धर्म्य है या अधर्म्य ? - “ किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ” ( गीता ४. १६ ) । ऐसे अवसर- पर कोरे विद्वान किंतु सदैव थोड़े-बहुत स्वार्थके पंजेमें फँसे हुए, पुरुषोंकी पंडिताई- पर या केवल अपने सार-असार-विचारके भरोसेपरही कोई काम न कर बैठे; बल्कि पूर्ण साम्यावस्थामें पहुँचे हुए परमावधिके साधु-पुरुषकी शुद्ध बुद्धिकीही शरणमें जा कर उसी गुरुके निर्णयको प्रमाण माने। क्योंकि निरा तार्किक पांडित्य जितना अधिक होगा, युक्तियाँभी उतनीही अधिक निकलेंगी। इसी कारण बिना शुद्धबुद्धिके कोरे पांडित्यसे ऐसे बिकट प्रश्नोंका कभी सच्चा और समाधानकारक निर्णय नहीं होने पाता; अतएव उसको शुद्ध और निष्कामबुद्धिवाला गुरुही करना चाहिये। जो शास्त्रकार अत्यंत सर्वमान्य हो चुके हैं, उनकी बुद्धि इस प्रकारकी शुद्ध रहती है, और यही कारण है, जो भगवानने अर्जुनसे कहा है - “ तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ” ( गीता १६. २४ ) - कार्य-अकार्यका निर्णय करनेमें तुझे शास्त्रको प्रमाण मानना चाहिये। तथापि यह न भूल जाना चाहिये, कि कालमानके अनुसार श्वेतकेतु जैसे आगेके साधुपुरुषोंको इन शास्त्रोंमेंभी फ़र्क करनेका अधिकार प्राप्त होता रहता है। निर्वैर और शांत साधु-पुरुषोंके आचरणके संबंधमें लोगोंकी आजकल जो गैर- समझ देखी जाती है, उसका कारण यह है, कि कर्मयोगमार्ग प्रायः लुप्त हो गया है; और सारे संसारहीको त्याज्य माननेवाले संन्यास-मार्गका चारों ओर दौर-दौरा हो गया है। गीताका यह उपदेश अथवा उद्देश्यभी नहीं है, कि निर्वैर होनेसे निष्प्रतिकार- भी होना चाहिये। जिसे लोकसंग्रहकी चिंताही नहीं है, उसे जगतमें दुष्टोंकी प्रबलता फैले तो - और न फैले तो - करनाही क्या है ? उसकी जान रहे, चाहे चली जाय; सब एकही-सा है। किंतु पूर्णावस्थामें पहुँचे हुए कर्मयोगी प्राणिमात्रमें आत्माकी एकताको पहचान कर यद्यपि सभीके साथ निर्वैरताका व्यवहार किया करते हैं, तथापि अनासक्त-बुद्धिसे पात्रता-अपात्रताका, सार-असार-विचार करके स्वधर्मानु- सार प्राप्त हुए कर्म करनेमें वे कभी नहीं चूकते; और कर्मयोग कहता है, कि इस रीतिसे किये हुए कर्म कर्ताकी साम्य-बुद्धिमेंभी कुछ न्यूनता नहीं आने देते। गीता- धर्म-प्रतिपादित कर्मयोगके इस तत्त्वको मान लेनेपर कुलाभिमान और देशाभिमान आदि कर्तव्य-धर्मोंकीभी कर्मयोगशास्त्रके अनुसार योग्य उपपत्ति लगाई जा सकती है। यद्यपि यह अंतिम सिद्धान्त है, कि समग्र मानव जातिका - प्राणिमात्रका - जिससे हित होता हो, वही धर्म है; तथापि परमावधिकी इस स्थितिको प्राप्त करनेके

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