श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलिये कुलाभिमान, धर्माभिमान और देशाभिमान आदि चढ़ती हुई सीढ़ियोंकी आवश्यकता तो कभीभी नष्ट होनेकी नहीं। निर्गुण ब्रह्मकी प्राप्तिके लिये जिस प्रकार सगुणोपासना आवश्यक है, उसी प्रकार- 'वसुधैव कुटुंबकम्' - की ऐसी बुद्धि पानेके लिये कुलाभिमान, जात्याभिमान, धर्माभिमान और देशाभिमान आदिकी आवश्यकता है, एवं समाजकी प्रत्येक पीढ़ी इसी जीनेसे ऊपर चढ़ती है, इस कारण हमी जीनेको सदैवही स्थिर रखना पड़ता है। ऐसेही जब अपने आसपासके लोग अथवा अन्य राष्ट्र नीचेकी सीढ़ीपर हों, तब यदि कोई एक-आध मनुष्य अथवा राष्ट्र चाहे, कि मैं अकेलेही ऊपरकी सीढ़ीपर बना रहूँ, तो वह कदापि सिद्ध हो नहीं सकता। क्योंकि ऊपर कहाही जा चुका है, कि परस्पर व्यवहारमें 'जैसेको तैसे' न्यायसे ऊपर-ऊपरकी श्रेणीवालोंको नीचे-नीचेकी श्रेणीवाले लोगोंके अन्यायका प्रति- कार करना विशेष प्रसंगपर आवश्यक रहता है। इसमें कोई शंका नहीं कि सुधरते सुधारते जगतके सभी मनुष्योंकी स्थिति एक दिन ऐसी जरूर हो जावेगी, कि वे प्राणिमात्रमें आत्माकी एकताको पहचानने लगें। अंततः मनुष्यमात्रको ऐसी स्थिति प्राप्त कर देनेकी आशा रखना कुछ अनुचितभी नहीं है। परंतु यह न्यायतःही सिद्ध है, कि आत्मोन्नतिकी परमावधिकी यह स्थिति जबतक सबको प्राप्त हो नहीं गई है, तबतक अन्यान्य राष्ट्रों अथवा समाजोंकी स्थितिपर ध्यान देकर साधु-पुरुष अपने समाजोंको उन उन समयोंमें श्रेयस्कर देशाभिमान आदि धर्मोंकाही उपदेश देते रहें। इसके अतिरिक्त इस दूसरी बातपरभी ध्यान देना चाहिये, कि मंजिल दर मंजिल तैयार करके, इमारत बन जानेपर, जिस प्रकार नीचेके हिस्से निकाल डाले नहीं जा सकते अथवा जिस प्रकार तलवार हाथमें आ जानेसे कुदालीकी, या सूर्य होनेसे, अग्निकीभी आवश्यकता बनीही रहती है, उसी प्रकार सर्वभूतहितकी अंतिम सीमापर पहुँच जानेपरभी न केवल देशाभिमानकीही, वरन् कुलाभिमानकी- भी आवश्यकता बनी ही रहती है। क्योंकि समाजसुधारकी दृष्टिसे देखें तो कुला- भिमान जो विशेष काम करता है, वह निरे देशाभिमानसे नहीं होता; और देशाभि- मानका कार्य निरी सर्वभूतात्मैक्य-दृष्टिसे सिद्ध नहीं होता। अर्थात समाजकी पूर्णावस्थामेंभी साम्यबुद्धिकेही समान देशाभिमान और कुलाभिमान आदि धर्मोंकीभी सदैव जरूरत रहतीही है। किंतु केवल अपनेही देशके अभिमानको परम साध्य मान लेनेसे जैसे एक राष्ट्र अपने लाभके लिये दूसरे राष्ट्रका मन-माना नुकसान करनेके लिये तैयार रहता है, वैसी बात सर्वभूतहितको परम साध्य माननेसे नहीं होती। कुलाभिमान, देशाभिमान और अंतमें पूरी मनुष्य जातिके हितमें यदि विरोध आने लगे, तो साम्यबुद्धिसे परिपूर्ण नीति-धर्मका यह महत्त्वपूर्ण और विशेष कथन है, कि उच्च श्रेणीके धर्मोंकी सिद्धिके लिये निम्न श्रेणीके धर्मोंको छोड़दें। विदुरने धृतराष्ट्र- को उपदेश करते हुए कहा है, कि युद्धमें कुलका क्षय हो जावेगा, अतः दुर्योधनके हठके लिये पांडवोंको राज्यका भाग न देनेकी अपेक्षा यदि दुर्योधन न माने तो