श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसिद्धावस्था और व्यवहार ४०१ ( अपना लड़का भलेही हो ) - उसे अकेलेको छोड़ देनाही उचित है; और इस समर्थनमें यह श्लोक कहा है :- त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् । ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ॥ “ कुलके ( बचावके ) लिये एक व्यक्तिको, गांवके लिये कुलको, और पूरे लोक- समूहके लिये गाँवको, एवं आत्माके लिये पृथिवीको छोड़ दें ” ( मभा. आदि. ११५. ३६; मभा ६१. ११ ) । इस श्लोकके पहले तीन चरणोंका तात्पर्य वही है, कि जिसका उल्लेख ऊपर किया गया है; और चौथे चरणमें आत्मरक्षाका तत्त्व बतलाया गया है । 'आत्म' शब्द सामान्य सर्वनाम है, इससे यह आत्मरक्षाका तत्त्व जैसे एक व्यक्तिको उपयुक्त होता है, वैसेही एकत्रित लोकसमूहको, जातिको, देशको अथवा राष्ट्रकोभी उपयुक्त होता है; और कुलके लिये एक पुरुषको, ग्रामके लिये कुलको, एवं देशके लिये ग्रामको छोड़ देनेकी क्रमशः चढ़ती हुई इस प्राचीन प्रणालीपर जब हम ध्यान देते हैं, तब स्पष्ट दीख पड़ता है, कि 'आत्म' शब्दका अर्थ इन सबकी अपेक्षा इस स्थलपर अधिक महत्त्वका है । फिरभी कुछ स्वार्थी या शास्त्र न जानने- वाले लोग इस चरणका कभी कभी विपरीत अर्थात् निरा स्वार्थ-प्रधान अर्थ किया करते हैं । अतएव यहाँ कह देना चाहिये, कि आत्मरक्षाका यह तत्त्व स्वार्थपरायणता नहीं है । क्योंकि जिन शास्त्रकारोंने निरे स्वार्थसाधु चार्वाक-पंथको राक्षसी बतलाया है ( गीता अ. १६ ), संभव नहीं है, कि वेही स्वार्थके लिये किसीसेभी जगत्को डुबानेके लिये कहें । ऊपरके श्लोकमें 'अर्थे' शब्दका अर्थ सिर्फ़ स्वार्थ-प्रधान नहीं है किंतु “ संकट आनेपर उसके निवारणार्थ ” ऐसा करना चाहिये; और कोशकारोंनेभी यही अर्थ किया है । स्वार्थपरायणता और आत्मरक्षामें बड़ा भारी अंतर है । कामो- पभोगकी इच्छा अथवा लोभसे अपना स्वार्थ साधनेके लिये दुनियाका नुकसान करना स्वार्थपरायणता है । यह अमानुषी और नीच है । उक्त श्लोकके प्रथम तीन चरणोंमें कहा है, कि एकके हितकी अपेक्षा अनेकोंके हितपर सदैव ध्यान देना चाहिये । तथापि प्राणिमात्रमें एकही आत्मा रहनेके कारण प्रत्येक मनुष्यको इस जगत्में सुख- से रहनेका एकही-सा नैसर्गिक अधिकार है । और इस सर्वमान्य महत्त्वके नैसर्गिक स्वत्वकी ओर दुर्लक्ष्य कर जगत्के किसीभी एक व्यक्तिकी या समाजकी हानि करनेका अधिकार, दूसरे किसी व्यक्ति या समाजको नीतिकी दृष्टिसे कदापि प्राप्त नहीं हो सकता - फिर चाहे वह समाज बल और संख्यामें कितनाही बढ़ा-चढ़ा क्यों न हो ! अथवा उसके पास छीना-झपटी करनेके साधन दूसरोंसे अधिक क्यों न हो ! यदि कोई इस युक्तिका अवलंबन करे, कि एककी अपेक्षा अथवा थोडोंकी अपेक्षा बहुतोंका हित अधिक योग्यताका है। और इस युक्तिसे, संख्यामें अधिक बढ़े हुए समाजके स्वार्थी बर्तावका समर्थन करे, तो वह युक्तिवाद केवल राक्षसी समझा जावेगा । इस गी. र. २६