भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 447, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 447

४०२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

प्रकार दूसरे लोग यदि अन्यायसे वर्तने लगें, तो बहुतेरोंके तो क्या, सारी पृथ्वीके हितकी अपेक्षाभी आत्मरक्षा अर्थात् अपने बचावका नैतिक अधिकार औरभी अधिक सबल हो जाता है; यही उक्त चौथे चरणका भावार्थ है और पहले तीन चरणोंमें जिस अर्थका वर्णन है, उसके लिये महत्त्वपूर्ण अपवादके नाते उसे साथही बतला दिया है। इसके सिवा यहभी देखना चाहिये, कि यदि हम स्वयं जीवित रहेंगे, तो लोककल्याण कर सकेंगे। अतएव लोकहितकी दृष्टिसे विचार करें, तोभी विश्वामित्र- के समान यही कहना पड़ता है, कि "जीवन् धर्ममवाप्नुयात्" – जीयेंगे तो धर्म करेंगे; अथवा कालिदासके अनुसार यही कहना पड़ता है, कि "शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्" (कुमा. ५. ३३) – शरीरही सब धर्मोंका मूलभूत साधन है; या मनुके कथनानुसार कहना पड़ता है, कि "आत्मानं सततं रक्षेत्" - स्वयं अपनी रक्षा सदासर्वदा करनी चाहिये । यद्यपि आत्मरक्षाका अधिकार सारे जगतके हितकी अपेक्षा इस प्रकार श्रेष्ठ है, तथापि दूसरे प्रकरणमें कह चुके हैं, कि कई अवसरों- पर कुलके लिये, देशके लिये, धर्मके लिये अथवा परोपकारके लिये स्वयं अपनीही इच्छासे साधु लोग अपनी जानपर खेल जाते हैं। उक्त श्लोकके पहले तीन चरणोंमें यही तत्त्व वर्णित है। ऐसे प्रसंगपर मनुष्य आत्मरक्षाके अपने श्रेष्ठ स्वत्वपरभी स्वेच्छासे पानी फेर दिया करता है, अतः ऐसे कामकी नैतिक योग्यताभी सबसे श्रेष्ठ समझी जाती है। तथापि इस बातका अचूक निश्चय कर देनेके लिये, कि ऐसे अवसर कब उत्पन्न होते हैं, निरा पांडित्य या तर्कशक्ति पूर्ण समर्थ नहीं है। इसलिये धृतराष्ट्रके उल्लिखित कथानकसे यह बात प्रकट होती है, कि विचार करनेवाले मनुष्यका अंतःकरण पहलेसेही शुद्ध और सम रहना चाहिये। महाभारतमेंही कहा है, कि धृतराष्ट्रकी बुद्धि इतनी मंद न थी, कि वे विदुरके उपदेशको समझ न सकें, परंतु पुत्रप्रेम उनकी बुद्धिको सम होने कहाँ देता था ? कुबेरको जिस प्रकार लाख रुपयेकी कभी कमी नहीं पड़ती, उसी प्रकार जिसकी बुद्धि एक बार सम हो चुकी, उसे कुलात्मैक्य, देशात्मैक्य या धर्मात्मैक्य आदि निम्न श्रेणीकी एकताओंका कभी तोटा पड़ताही नहीं है। ब्रह्मात्मैक्यमें इन सबका अंतर्भाव हो जाता है। फिर देश- धर्म, कुलधर्म आदि संकुचित धर्मोंका अथवा सर्वभूतहितके व्यापक धर्मका – अर्थात् इनमेंसे जिस-जिसकी स्थितिके अनुसार, अथवा आत्मरक्षाके निमित्त जिस समयमें जिसे जो धर्म श्रेयस्कर हो, उसको उसी धर्मका – उपदेश करके जगतके धारण- पोषणका काम साधु लोग करते हैं। इसमें संदेह नहीं कि मानव जातिकी वर्तमान स्थितिमें देशाभिमानही मुख्य सद्गुण हो गया है; और सुधरे हुए राष्ट्रभी इन विचारों और तैयारियोंमें अपने ज्ञानका, कुशलताका और द्रव्यका उपयोग किया करते हैं, कि पास-पड़ोसके शत्रुदेशीय बहुत-से लोगोंको प्रसंग पड़नेपर थोड़ेही समय हम क्यों कर जानसे मार सकेंगे। किंतु स्पेन्सर और कोंट प्रभृति पंडितोंने अपने ग्रंथोंमें स्पष्ट रीतिसे कह दिया है, कि केवल इसी एक कारणसे देशाभिमानकोही नीतिकी

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक) · पृष्ठ 447, कुल 956 में से · BharatKosha