भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 448

सिद्धावस्था और व्यवहार ४०३ दृष्टिसे मानवजातिका परम साध्य मान नहीं सकते; और जो आक्षेप इन लोगोंके प्रतिपादित तत्त्वपर हो नहीं सकता, वही आक्षेप, हम नहीं समझते, कि अध्यात्म- दृष्टया प्राप्त सर्वभूतात्मैक्यरूप तत्त्वपरही कैसे हो सकता है ? छोटे बच्चेके कपडे उसके शरीरकेही अनुसार - बहुत हुआ तो जरा ढीले अर्थात् बाढ़के लिये गुंजाइश रख कर - जैसे ब्योंताने पड़ते हैं, वैसेही सर्वभूतात्मैक्य बुद्धिकीभी बात है। समाज हो या व्यक्ति, सर्वभूतात्मैक्य बुद्धिमे उसके आगे जो साध्य रखना है, वह उसके अधिकारके अनुरूप अथवा उसकी अपेक्षा जरा-सा और आगेका होगा; तभी वह उसको श्रेयस्कर हो सकता है; उसकी सामर्थ्यकी अपेक्षा बहुत अच्छी बात उसको एकदम करनेके लिये बतलाई जाय, तो उससे उसका कल्याण कभी नहीं हो सकता । परब्रह्मकी कोई सीमा न होनेपरभी उपनिषदोंमें उसकी उपासनाकी क्रम-क्रमसे बढ़ती हुई सीढ़ियाँ बतलानेका यही कारण है; और जिस समाजमें सभी स्थितप्रज्ञ हों, वहाँ क्षात्र-धर्मकी जरूरत न भी हो, तोभी जगतके अन्यान्य समाजोंकी तत्कालीन स्थितिपर ध्यान दे करके " आत्मानं सततं रक्षेत् "के ढंगपर हमारे धर्मशास्त्रकी चातुर्वर्ण्य व्यवस्थामें क्षात्र-धर्मका संग्रह किया गया है । यूनानके प्रसिद्ध तत्त्ववेत्ता प्लेटोने अपने ग्रंथमें जिस समाज-व्यवस्थाको अत्यंत उत्तम बतलाया है, उसमेंभी निरंतरके अभ्याससे युद्धकलामें प्रवीण वर्गको समाजरक्षकके नाते प्रमुखता दी है । इससे स्पष्टही दीख पड़ेगा कि तत्त्वज्ञानी लोग परमावधिकी शुद्ध और उच्च स्थितिके विचारोंमेंही डूब क्यों न रहा करें; परंतु वे तत्कालीन अपूर्ण समाज व्यवस्थाका विचार करनेसेभी कभी नहीं चूकते । ऊपरकी सब बातोंका इस प्रकार विचार करनेसे ज्ञानी पुरुषके संबंधमें यह सिद्ध होता है, कि वह ब्रह्मात्मैक्य-ज्ञानसे अपनी बुद्धिको निर्विषय, शांत और प्राणि- मात्रमें निर्वैर तथा सम रखे और इस स्थितिको पा जानेसे सामान्य अज्ञानी लोगोंसे उकतावे नहीं अथवा स्वयं सारे संसारी कामोंका त्याग कर याने कर्म-संन्यास आश्रमको स्वीकार करके इन लोगोंकी बुद्धिको न बिगाड़े । परंतु देश-काल और परिस्थितिके अनुसार जिन्हें जो योग्य हो, उसीका उन्हें उपदेश देवे; अपने निष्काम कर्तव्य- आचरणसे सद्व्यवहारका अधिकारानुसार प्रत्यक्ष आदर्श दिखला कर, सबको धीरे धीरे यथासंभव शांतिसे किंतु उत्साहपूर्वक उन्नतिके मार्गमें लगावे; बस, यही ज्ञानी पुरुषका सच्चा धर्म है । समय-समयपर अवतार ले कर भगवानभी यही काम किया करते हैं; और ज्ञानी पुरुषकोभी यही आदर्श मान, फलपर ध्यान न देते हुए, इस जगतका अपना कर्तव्य शुद्ध अर्थात् निष्काम बुद्धिसे सदैव यथाशक्ति करते रहना चाहिये । सारे गीताशास्त्रका सारांश यही है, कि इस प्रकारके कर्तव्य-पालनमें यदि मृत्युभी आ जावे, तो बड़े आनंदसे उसे स्वीकार कर लेना चाहिये ( गीता ३. ३५ ); अपने कर्तव्य अर्थात् धर्मको न छोड़ना चाहिये । इसेही लोकसंग्रह अथवा कर्मयोग कहते हैं । न केवल वेदान्तही, वरन् उसके आधारपर साथ-ही-साथ कर्म-