भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 449

४०४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अकर्मका ऊपर लिखा हुआ ज्ञानभी जब गीतामें बतलाया गया, तभी तो पहले युद्ध छोड़कर भीख मांगनेकी तैयारी करनेवाला अर्जुन आगे चलकर स्वधर्मके अनुसार भयानक युद्ध करनेके लिये – सिर्फ इसीलिये नहीं, कि भगवान् कहते हैं, वरन् अपनी इच्छासे – प्रवृत्त हो गया । स्थितप्रज्ञकी साम्य-बुद्धिका यही तत्त्व, कि जिसका अर्जुनको उपदेश हुआ है, कर्मयोगशास्त्रका मूल आधार है । अतः उसीको प्रमाण मान, उसके आधारसे हमने बतलाया है, कि पराकाष्ठाकी नीतिमत्ताकी उपपत्ति क्योंकर लगती है । हमने इस प्रकरणमे कर्मयोगशास्त्रकी इन मोटी-मोटी बातोंका संक्षिप्त निरूपण किया है, कि आत्मौपम्य-दृष्टिसे समाजमें परस्पर एक- दूसरेके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये; 'जैसेको तैंसे' वाले न्यायसे अथवा पात्रता- अपात्रताके कारण पराकाष्ठाके नीतिधर्ममें कौन-से भेद होते हैं; अथवा अपूर्णा- वस्थाके समाजमें बर्तनेवाले साधुपुरुषकोभी अपवादात्मक नीतिधर्म कैसे स्वीकार करने पडते है । इन्हीं युक्तियोंका उपयोग न्याय, परोपकार, दान, दया, अहिंसा, सत्य और अस्तेय आदि नित्य धर्मोंके विषयमें किया जा सकता है । आजकलकी अपूर्ण समाज-व्यवस्थामें यह दिखलानेके लिये, कि प्रसंगके अनुसार इन नीति-धर्मोंमें कहाँ और कौन-सा फ़र्क करना ठीक होगा, यदि इन धर्मोंमेंसे प्रत्येकपर एक एक स्वतंत्र ग्रंथ लिखा जाय, तोभी यह विषय समाप्त न होगा; और यह भगवद्गीताका मुख्य उद्देश्यभी नहीं है । इस ग्रंथके दूसरेही प्रकरणमें हम इसका दिग्दर्शन कर चुके हैं, कि अहिंसा और सत्य, सत्य और आत्मरक्षा, आत्मरक्षा और शांति आदिमें पर- स्पर विरोध होकर विशेष प्रसंगपर कर्तव्य-अकर्तव्यका संदेह कैसे उत्पन्न हो जाता है । यह निर्विवाद है, कि ऐसे अवसरपर साधुपुरुष “नीतिधर्म, लोकयात्रा-व्यवहार, स्वार्थ और सर्वभूतहित” आदि बातोंका तारतम्य-विचार करके फिर कार्य-अकार्यका निर्णय किया करते हैं; और महाभारतमें श्येनने शिबि राजाको यह बात स्पष्टही बतला दी है । सिज्विक नामक अंग्रेज ग्रंथकारने अपने नीतिशास्त्रविषयक ग्रंथमें इसी अर्थका विस्तारसहित वर्णन अनेक उदाहरण लेकर किया है । किंतु कुछ पश्चिमी पंडित इतनेहीसे यह जो अनुमान करते हैं, कि स्वार्थ और परार्थके सार-असारका विचार करनाही नीति-निर्णयका तत्त्व है; उसे हमारे शास्त्रकारोंने कभी मान्य नहीं किया है। क्योंकि हमारे शास्त्रकारोंका कथन है, कि यह सार-असारका विचार अनेक वार इतना सूक्ष्म और अनैकांतिक अर्थात् अनेक अनुमान निष्पन्न कर देनेवाला होता है, कि यदि यह साम्य-बुद्धि – “जैसा मैं, वैसा दूसरा”- पहलेसेही मनमें सोलहों आने जमी हुई न हो, तो कोरे तार्किक सार-असारके विचारसे कर्तव्य-अकर्तव्यका सदैव अचूक निर्णय होना संभव नहीं है; और फिर ऐसी घटना हो जानेकीभी संभावना रहती है; जैसे कि “मोर नाचता है, इसलिये मोरनीभी नाचने लगती है ?” अर्थात् “देखादेखी साधै जोग, छीजै काया, बाढ़ै रोग” इस लोकोक्तिके अनुसार ढोंग फैल सकेगा; और समाजकी हानि होगी । मिल प्रभृति उपयुक्ततावादी पश्चिमी नीति-