भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 450

सिद्धावस्था और व्यवहार ४०५ शास्त्रज्ञोंके उपपादनमें यही तो मुख्य अपूर्णता है। गरुड झपटकर अपने पंजेमे मेमनेको आकाशमें उठा ले गया, इसलिये उसकी देखादेखी यदि कौवाभी ऐसाही करने लगे, तो धोखा खाये बिना न रहेगा। इसीलिये गीता कहती है, कि साधु-पुरुषोंकी बाहरी युक्तियोंपरही अवलंबित मत रहो। अंतःकरणमें सदैव जागृत रहनेवाली साम्य- बुद्धिकीही अंतमें शरण लेनी चाहिये। क्योंकि कर्मयोगशास्त्रकी सच्ची जड़ साम्य- बुद्धिही है। अर्वाचीन आधिभौतिक पंडितोंमेंसे कोई स्वार्थको, तो कोई परार्थ अर्थात् "अधिकांश लोगोंके अधिक सुख" को नीतिका मूल तत्त्व बतलाते हैं। परंतु हम चौथे प्रकरणमें यह दिखला चुके हैं, कि कर्मके केवल बाहरी परिणामोंको उपयोगी होनेवाले इन तत्त्वोंसे सर्वत्र निर्वाह नही होता; इसका विचारभी अवश्य करना पड़ता है, कि कर्ताकी बुद्धि कहाँ तक शुद्ध है। कर्मके बाह्य परिणामोंके सार-असारका विचार करना चतुराईका और दूरदर्शिताका लक्षण है सही; परंतु दूरदर्शिता और नीति, ये शब्द समानार्थक नहीं हैं। इसीसे हमारे शास्त्रकार कहते हैं, कि निरे वाह्य कर्मके सार-असार विचारकी इस कोरी व्यापारी क्रियामें सद्बर्तावका सच्चा बीज नहीं है; किंतु साम्यबुद्धिरूप परमार्थही नीतिका मूल आधार है। मनुष्यकी अर्थात् जीवात्माकी पूर्णावस्थाका योग्य विचार करें, तोभी उक्त सिद्धान्तही करना पड़ता है। लोभसे एक-दूसरेको लूटनेमें बहुतेरे आदमी होशियार होते हैं परंतु इस बातके जाननेयोग्य कोरे ब्रह्मज्ञानकोही- कि यह होशियारी, अथवा अधिकांश लोगोंके अधिक सुख, काहेमें हैं- इस जगतमें प्रत्येक मनुष्यका परम साध्य कोईभी नही कहता। जिसका मन या अंतःकरण शुद्ध है, वही पुरुष उत्तम कहलाने योग्य है। और तो क्या; यहभी कह सकते हैं, कि जिसका अंतःकरण निर्मल, निर्वैर और शुद्ध नहीं है, वह यदि बाह्य कर्मोंके हिसाबी तारतम्यमें फँसकर तदनुसार बर्ते, तो उस पुरुषके ढोंगी बन जानेकी संभावना है (गीता ३. ६)। परंतु कर्मयोगशास्त्रम साम्य-बुद्धिको प्रमाण मान लेनेसे यह दोष नहीं रहता। साम्य-बुद्धिको प्रमाण मान लेनेसे कहना पड़ता है, कि कठिन समस्या आनेपर धर्म-अधर्मका निर्णय करानेके लिये ज्ञानी साधु-पुरुषोंकीही शरणमें जाना चाहिये, कोई और उपाय नहीं। कोई भयंकर रोग होनेपर जिस प्रकार बिना वैद्यकी सहायताके उसका निदान और उसकी चिकित्सा नहीं हो सकती, उसी प्रकार धर्म-अधर्म-निर्णयके विकट प्रसंगपर यदि कई सामान्य मनुष्य सत्पुरुषोंकी मदद न ले; और यह अभिमान रखे, कि मैं "अधिकांश लोगोंके अधिक सुख" वाले एकही साधनमे धर्म-अधर्मका अचूक निर्णय आपही कर लूंगा, तो उसका यह अभिमान व्यर्थ होगा। साम्य-बुद्धिको बढ़ाते रहनेका अभ्यास प्रत्येक मनुष्यको करना चाहिये और इस क्रमसे संसारभरके मनुष्यकी बुद्धि जब पूर्ण साम्यावस्था में पहुँच जावेगी, तभी मत्ययुगकी प्राप्ति होगी; तथा मनुष्य-जातिका परम साध्य प्राप्त होगा अथवा पूर्णावस्था सबको प्राप्त हो जावेगी। कार्य-अकार्य-शास्त्रकी प्रवृत्तिभी इसी लिये हुई है; और इसी कारण उसकी इमारत-