श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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४०६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कोभी साम्य-बुद्धिकीही नींवपर खड़ा करना चाहिये । परंतु इतनी दूर न जाकर आगे पंद्रहवें प्रकरणमें की गयो तुलनात्मक परीक्षासे स्पष्ट मालूम हो जायगा, कि यदि नीतितत्त्वोंका केवल लौकिक कसौटीकी दृष्टिसेही विचार करें, तोभी गीताका साम्य-बुद्धिवाला पक्षही पाश्चात्त्य आधिभौतिक या आधिदैवत पंथकी अपेक्षा अधिक योग्यताका और मार्मिक सिद्ध होता है। परंतु गीताके तात्पर्यके निरूपणका जो एक महत्त्वपूर्ण भाग अभी शेष है, उसेही पहले पूराकर लेते हैं।