भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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तेरहवाँ प्रकरण भक्तिमार्ग सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ *

  • गीता १८. ६६ अबतक अध्यात्म-दृष्टिसे इन बातोंका विचार किया गया है, कि देहमें बनी सर्वभूतात्मैक्यरूपी निष्काम बुद्धिही कर्मयोगकी और मोक्षकीभी जड़ है । यह शुद्ध बुद्धि ब्रह्मात्मैक्य-ज्ञानसे प्राप्त होती है; और इसी शुद्ध बुद्धिसे प्रत्येक मनुष्यको जन्मभर स्वधर्मानुसार प्राप्त हुए अपने कर्तव्य-कर्मोंका पालन करना चाहिये । परंतु इतनेहीसे भगवद्गीताके प्रतिपाद्य विषयका विवेचन पूरा नहीं होता । यद्यपि इसमें संदेह नहीं कि ब्रह्मात्मैक्यज्ञानही केवल सत्य और अंतिम साध्य है, तथा "उसके समान इस संसारमें दूसरी कोईभी वस्तु पवित्र नहीं है" (गीता ४. ३८) ; तथापि अबतक उसके विषयमें जो विचार किया गया; और उसकी सहायतासे साम्य-बुद्धि प्राप्त करनेका जो मार्ग बतलाया गया है, वह सब बुद्धिगम्य है । इसलिये सामान्य जनोंकी शंका है, कि उस विषयको पूरी तरहसे समझनेके लिये प्रत्येक मनुष्यकी बुद्धि इतनी तीव्र कैसे हो सकती है; और यदि किसी मनुष्यकी बुद्धि तीव्र न हो, तो क्या उसको ब्रह्मात्मैक्य-ज्ञानसे हाथ धो बैठना चाहिये ? सच कहा जाय, तो यह शंकाभी कुछ अनुचित नहीं दीख पड़ती । यदि कोई कोकहे - "जब कि बड़े बड़े ज्ञानी पुरुषभी विनाशी नामरूपात्मक मायासे आच्छादित तुम्हारे उस अमृतस्वरूपी परब्रह्मका वर्णन करते समय 'नेति नेति' कह कर चुप हो जाते हैं, तब हमारे समान साधारण जनोंकी समझमें वह कैसे आवे ? इसलिये हमें कोई ऐसा सरल उपाय या मार्ग बतलाओ, जिससे तुम्हारा वह गहन ब्रह्मज्ञान हमारी अल्प ग्रहणशक्तिके समझमें आ जावे; " - तो इसमें उसका क्या दोष है ? गीता और कठोपनिषद्में (गीता २. २९; क. २. ७) कहा है, कि आश्चर्यचकित होकर आत्मा (ब्रह्म) का वर्णन करनेवाले तथा सुननेवाले बहुत हैं, तोभी किसीको उसका ज्ञान नहीं होता । श्रुतिग्रंथोंमें इस विषयपर एक बोधदायक कथाभी है । उसमें यह वर्णन है, कि जब बाष्कलिने बाह्वसे कहा - "हे महाराज ! मुझे कृपाकर बतलाइये, कि ब्रह्म किसे
  • "सब प्रकारके धर्मोंको याने परमेश्वरप्राप्तिके साधनोंको छोड़ केवल मेरीही शरणमें आ । मैं तुझे सब पापोंसे मुक्त करूँगा; डर मत।" इस श्लोकके अर्थका विवेचन इस प्रकरणके अंतमें किया है ।
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