श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०८ गीतारहस्य और कर्मयोगशास्त्र कहते हैं; ' तब बाह्व् कुछभी नहीं बोले। बाष्कलिने फिर वही प्रश्न किया, तोभी बाह्व् चुपही रहे। जब ऐसाही चार-पांच बार हुआ, तब अंतमें बाह्व्ने बाष्कलिसे कहा - "अरे ! मैं तेरे प्रश्नोंका उत्तर तभीसे दे रहा हूँ; परंतु तेरी समझमें नहीं आया - मैं क्या करूँ ? ब्रह्मस्वरूप किसी प्रकार बतलाया नहीं जा सकता, इसलिये शांत होना अर्थात् चुप रहनाही सच्चा ब्रह्मलक्षण है। समझा?" (वे. सू. शां. भा. ३. २. १७)। सारांश, जिस दृश्य-सृष्टि-विलक्षण, अनिर्वाच्य और अचिंत्य परब्रह्म- का यह वर्णन है - कि वह मुँह बंद कर बतलाया जा सकता है, आँखोंसे दिखाई न देनेपर उसे देख सकते हैं और समझमें न आनेपर वह ज्ञात होने लगता है (केन. २. ११) - उसको साधारण बुद्धिके मनुष्य कैसे पहचान सकेंगे और उसके द्वारा साम्यावस्था प्राप्त होकर उनको सद्गति कैसे मिलेगी? जब परमेश्वर-स्वरूपका अनुभवात्मक और यथार्थ ज्ञान ऐसा होवे, कि सब चराचर सृष्टिमें एक आत्मा प्रतीत होने लगे, तभी मनुष्यकी पूरी उन्नति होगी; और ऐसी उन्नति कर लेनेके लिये तीव्र बुद्धिके अतिरिक्त कोई दूसरा मार्गही न हो, तो संसारके लाखों-करोड़ों मनुष्योंको ब्रह्मप्राप्तिकी आशा छोड़ चुपचाप बैठे रहना होगा। क्योंकि बुद्धिमान् मनुष्योंकी संख्या हमेशा कमही रहती है। यदि यह कहें कि बुद्धिमान् लोगोंके कथनपर विश्वास रखनेसे हमारा काम चल जायगा; तो उनमेंभी कई मतभेद दिखाई देते हैं; और यदि यह कहें, कि विश्वास रखनेसे काम चल जाता है, तो यह बात आप-ही-आप सिद्ध हो जाती है, कि इस गहन ज्ञानकी प्राप्तिके लिये "विश्वास अथवा श्रद्धा रखना" भी, बुद्धिके अतिरिक्त दूसरा मार्ग है। सच पूछो तो यही दीख पड़ेगा, कि ज्ञानकी पूर्ति अथवा फलद्रूपता श्रद्धाके बिना नहीं होती। यह कहना, कि सब ज्ञान केवल बुद्धिहीसे प्राप्त होता है, उसके लिये किसी अन्य मनोवृत्तिकी सहायता आवश्यक नहीं, उन पंडितोंका वृथाभिमान है, जिनकी बुद्धि केवल तर्कप्रधान शास्त्रोंका जन्म भर अध्ययन करनेसे कर्कश हो गई है। उदाहरणके लिये यह सिद्धान्त लीजिये, कि कल सबेरे फिर सूर्योदय होगा। हम लोग इस सिद्धान्तके ज्ञानको अत्यंत निश्चित मानते हैं। क्यों? उत्तर यही है, कि हमने और हमारे पूर्वजोंने इस क्रमको हमेशा अखंडित देखा है। परंतु कुछ अधिक विचार करनेसे मालूम होगा, कि "हमने अथवा हमारे पूर्वजोंने जबतक प्रतिदिन सबेरे सूर्यको निकलते देखा है", इसीसे यह बात कल सबेरे सूर्योदय होनेका कारण नहीं हो सकती; अथवा प्रतिदिन हमारे देखनेके लिये या हमारे देखनेनेही कुछ सूर्योदय नहीं होता; यथार्थमें सूर्योदय होनेके कुछ औरही कारण हैं। अच्छा; अब यदि "हमारा सूर्यको प्रतिदिन देखना" कल सूर्योदय होनेका कारण नहीं है, तो इसके लिये क्या प्रमाण है, कि कल सूर्योदय होगा? दीर्घ कालतक किसी वस्तुका क्रम एक सा अबाधित दीख पडनेपर यह मान लेनाभी एक प्रकार विश्वास या श्रद्धाही तो है न, कि वह क्रम आगेभी वैसाही नित्य चलता रहेगा? यद्यपि हम उसको एक बहुत बड़ा प्रतिष्ठित नाम - 'अनुमान'