भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 454, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 454

दे दिया करते हैं; तोभी यह ध्यानमें रखना चाहिये, कि वह अनुमान बुद्धिगम्य कार्यकारणात्मक नहीं है; किंतु उसका मूल-स्वरूप श्रद्धात्मकही है। मन्नूको शक्कर मीठी लगती है; इसलिये छत्तूकोभी वह मीठी लगेगी- यह जो निश्चय हम लोग किया करते हैं; वहभी वस्तुतः इसी नमूनेका है। क्योकि जब कोई कहता है, कि मुझे शक्कर मीठी लगती है, तब इस ज्ञानका अनुभव उसकी बुद्धिको प्रत्यक्ष रूपसे होता है सही; परंतु इससेभी आगे बढ़कर जब हम यह सकते हैं, कि शक्कर सब मनुष्योंको मीठी लगती है, तब बुद्धिको श्रद्धाकी सहायता दिये विना काम नहीं चल सकता। रेखागणित या भूमितिशास्त्रका सिद्धान्त है, कि ऐसी दो रेखाएँ हो सकती हैं, जो चाहे जितनी बढ़ाई जावें; तोभी आपसमें नहीं मिलती। कहना नहीं होगा, कि इस तत्त्वको अपने ध्यानमें लानेके लिये हमको अपने प्रत्यक्ष अनुभवकेभी परे केवल श्रद्धाहीकी सहा- यतासे चलना पड़ता है। इसके सिवा यहभी ध्यानमें रखना चाहिये, कि संसारके सब व्यवहार श्रद्धा, प्रेम आदि नैसर्गिक मनोवृत्तियोंसेही चलते हैं; इन वृत्तियोंको रोकनेके सिवा बुद्धि दूसरा कोई कार्य नहीं करती। और जब बुद्धि किसी बातकी भलाई या बुराईका निश्चय कर लेती है, तब आगे उस निश्चयको अमलमें लानेका काम मनके द्वारा अर्थात् मनोवृत्तिके द्वाराही हुआ करता है। इस बातकी चर्चा पहले 'क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विचारमें' हो चुकी है। सारांश यह है, कि बुद्धिगम्य ज्ञानकी पूर्ति होनेके लिये और आगे बुद्धिसे नीचे उतरकर आचरण तथा कृतिमें उसकी फलरूपता होनेके लियेही इस ज्ञानको हमेशा, श्रद्धा, दया, वात्सल्य, कर्तव्य-प्रेम इत्यादि अन्य नैसर्गिक मनोवृत्तियोंकी आवश्यकता होती है; और जो ज्ञान इन मनोवृत्तियोंको शुद्ध तथा जागृत नहीं करता, और जिस ज्ञानको उनकी सहायता अपेक्षित नहीं होती, उसे सूखा, कर्कश, अधूरा, बाँझ या कच्चा ज्ञान समझना चाहिये। जैसे बिना बारूदके केवल गोलीसे बंदूक नहीं चलती, वैसेही प्रेम, श्रद्धा आदि मनोवृत्तियोंकी सहायताके बिना केवल बुद्धिगम्य ज्ञान किसीको तार नहीं सकता, यह सिद्धान्त हमारे प्राचीन ऋषियोंको भली भाँति मालूम था। उदाहरणके लिये छांदोग्योपनिषद्मे वर्णित यह कथा लीजिये (छां. ६. १२):- एक दिन श्वेतकेतुके पिताने यह सिद्धकर दिखानेके, लिये कि अव्यक्त और सूक्ष्म परब्रह्मही सब दृश्य जगतका मूल-कारण है; श्वेतकेतुसे कहा, कि बरगदका एक फल ले आओ, और देखो, कि उसके भीतर क्या है। श्वेतकेतुने वैसाही किया, उस फलको तोड़कर देखा और कहा- "इसके भीतर छोटे छोटे बहुतसे बीज या दाने हैं।" उसके पिताने फिर कहा, कि "उन बीजोंमेंसे एक बीज ले लो; उसे तोड़कर देखो और बतलाओ, कि उसके भीतर क्या है?" श्वेतकेतुने एक बीज ले लिया; उसे तोड़- कर देखा और कहा कि "इसके भीतर तो कुछ नहीं है।" तब पिताने कहा, "अरे! यह जो तुम 'कुछ नहीं' कहते हो, उसीसे यह बरगदका बहुत बड़ा वृक्ष हुआ है," और अंतमें यह उपदेश दिया, कि 'श्रद्धत्स्व' इसका विश्वास कर अर्थात् इस कल्पनाको केवल बुद्धिमें रख। मुँहसेही 'हाँ' मत कहा; किंतु उसकेभी आगे चल याने इस

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक) · पृष्ठ 454, कुल 956 में से · BharatKosha