श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
दे दिया करते हैं; तोभी यह ध्यानमें रखना चाहिये, कि वह अनुमान बुद्धिगम्य कार्यकारणात्मक नहीं है; किंतु उसका मूल-स्वरूप श्रद्धात्मकही है। मन्नूको शक्कर मीठी लगती है; इसलिये छत्तूकोभी वह मीठी लगेगी- यह जो निश्चय हम लोग किया करते हैं; वहभी वस्तुतः इसी नमूनेका है। क्योकि जब कोई कहता है, कि मुझे शक्कर मीठी लगती है, तब इस ज्ञानका अनुभव उसकी बुद्धिको प्रत्यक्ष रूपसे होता है सही; परंतु इससेभी आगे बढ़कर जब हम यह सकते हैं, कि शक्कर सब मनुष्योंको मीठी लगती है, तब बुद्धिको श्रद्धाकी सहायता दिये विना काम नहीं चल सकता। रेखागणित या भूमितिशास्त्रका सिद्धान्त है, कि ऐसी दो रेखाएँ हो सकती हैं, जो चाहे जितनी बढ़ाई जावें; तोभी आपसमें नहीं मिलती। कहना नहीं होगा, कि इस तत्त्वको अपने ध्यानमें लानेके लिये हमको अपने प्रत्यक्ष अनुभवकेभी परे केवल श्रद्धाहीकी सहा- यतासे चलना पड़ता है। इसके सिवा यहभी ध्यानमें रखना चाहिये, कि संसारके सब व्यवहार श्रद्धा, प्रेम आदि नैसर्गिक मनोवृत्तियोंसेही चलते हैं; इन वृत्तियोंको रोकनेके सिवा बुद्धि दूसरा कोई कार्य नहीं करती। और जब बुद्धि किसी बातकी भलाई या बुराईका निश्चय कर लेती है, तब आगे उस निश्चयको अमलमें लानेका काम मनके द्वारा अर्थात् मनोवृत्तिके द्वाराही हुआ करता है। इस बातकी चर्चा पहले 'क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विचारमें' हो चुकी है। सारांश यह है, कि बुद्धिगम्य ज्ञानकी पूर्ति होनेके लिये और आगे बुद्धिसे नीचे उतरकर आचरण तथा कृतिमें उसकी फलरूपता होनेके लियेही इस ज्ञानको हमेशा, श्रद्धा, दया, वात्सल्य, कर्तव्य-प्रेम इत्यादि अन्य नैसर्गिक मनोवृत्तियोंकी आवश्यकता होती है; और जो ज्ञान इन मनोवृत्तियोंको शुद्ध तथा जागृत नहीं करता, और जिस ज्ञानको उनकी सहायता अपेक्षित नहीं होती, उसे सूखा, कर्कश, अधूरा, बाँझ या कच्चा ज्ञान समझना चाहिये। जैसे बिना बारूदके केवल गोलीसे बंदूक नहीं चलती, वैसेही प्रेम, श्रद्धा आदि मनोवृत्तियोंकी सहायताके बिना केवल बुद्धिगम्य ज्ञान किसीको तार नहीं सकता, यह सिद्धान्त हमारे प्राचीन ऋषियोंको भली भाँति मालूम था। उदाहरणके लिये छांदोग्योपनिषद्मे वर्णित यह कथा लीजिये (छां. ६. १२):- एक दिन श्वेतकेतुके पिताने यह सिद्धकर दिखानेके, लिये कि अव्यक्त और सूक्ष्म परब्रह्मही सब दृश्य जगतका मूल-कारण है; श्वेतकेतुसे कहा, कि बरगदका एक फल ले आओ, और देखो, कि उसके भीतर क्या है। श्वेतकेतुने वैसाही किया, उस फलको तोड़कर देखा और कहा- "इसके भीतर छोटे छोटे बहुतसे बीज या दाने हैं।" उसके पिताने फिर कहा, कि "उन बीजोंमेंसे एक बीज ले लो; उसे तोड़कर देखो और बतलाओ, कि उसके भीतर क्या है?" श्वेतकेतुने एक बीज ले लिया; उसे तोड़- कर देखा और कहा कि "इसके भीतर तो कुछ नहीं है।" तब पिताने कहा, "अरे! यह जो तुम 'कुछ नहीं' कहते हो, उसीसे यह बरगदका बहुत बड़ा वृक्ष हुआ है," और अंतमें यह उपदेश दिया, कि 'श्रद्धत्स्व' इसका विश्वास कर अर्थात् इस कल्पनाको केवल बुद्धिमें रख। मुँहसेही 'हाँ' मत कहा; किंतु उसकेभी आगे चल याने इस
४१० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र तत्त्वको अपने हृदयमें अच्छी तरह जमने दे; और आचरण या कृतिमें दिखाई देने दे। सारांश, यदि यह निश्चयात्मक ज्ञान होनेके लियेभी अंतमें श्रद्धाकी आवश्यकता है, कि सूर्यका उदय कल सबेरे होगा, तो यहभी निर्विवाद सिद्ध है, कि इस बातको पूर्णतया जान लेनेके लिये-कि सारी सृष्टिका मूल तत्त्व अनादि, अनंत, सर्वकर्तृ, सर्वज्ञ, स्वतंत्र और चैतन्यरूप है-पहले हम लोगोंको यथाशक्ति, बुद्धिरूपी बटोहीका अवलंबन करना चाहिये; परंतु उसके अनुरोधसे आगे कुछ दूर तो अवश्यही श्रद्धा तथा प्रेमकी पगडंडीसेही जाना चाहिये, देखिये, मैं जिसे माँ कहकर ईश्वरके समान वंद्य और पूज्य मानता हूँ, उसीही अन्य लोग एक सामान्य स्त्री समझते हैं; या नैयायिकोंके शास्त्रीय शब्दाडंबरके अनुसार "गर्भधारण-प्रसवादिस्त्रीत्वसामान्यावच्छेदकाव- च्छिन्नव्यक्तिविशेषः समझते हैं।" इस एक छोटेसे व्यावहारिक उदाहरणसे यह बात किसीकेभी ध्यानमें सहज आ सकती है, कि जब केवल तर्कशास्त्रके सहारे प्राप्त किया गया ज्ञान, श्रद्धा और प्रेमके साँचेमें ढाला जाता है, तब उसमें कैसा अंतर हो जाता है। इसी कारणसे गीतामें (गीता ६. ४७) कहा है, कि कर्मयोगियोंमेंभी श्रद्धावान् श्रेष्ठ है; और ऐसाही सिद्धांत जैसे पहले कह चुकेभी हैं-अध्यात्मशास्त्रमें कहा गया है, कि इंद्रियातीत होनेके कारण जिन पदार्थोंका चिंतन करते नहीं बनता, उनके स्वरूपका निर्णय केवल तर्कसे नहीं करना चाहिये-"अचिंत्याः खलु ये भावाः न तांस्तर्केण चिंतयेत् ।" यदि यही एक अड़चन हो, कि साधारण मनुष्योंके लिये निर्गुण परब्रह्मका ज्ञान होना कठिन है, तो बुद्धिमान पुरुषोंमें मतभेद होनेपरभी श्रद्धा या विश्वाससे उसका निवारण किया जा सकता है। कारण यह है, कि इन पुरुषोंमें जो अधिक विश्वसनीय होंगे, उन्हींके वचनोंपर विश्वास रखनेसे हमारा काम बन जावेगा (गीता १३. २५)। तर्कशास्त्रमें इस उपायको 'आप्तवचनप्रमाण' कहते हैं। 'आप्त'का अर्थ विश्वसनीय पुरुष है। जगतके व्यवहारपर दृष्टि डालनेसे यही दिखाई देगा कि, हजारों लोग आप्त-वाक्यपर विश्वास रखकरही अपना व्यवहार चलाते हैं। दो पंचे दसके बदले सात क्यों नहीं होते ? अथवा एकपर एक लिखनेसे दो नहीं होते; ग्यारह क्यों होते हैं; इस विषयकी उपपत्ति या कारण बतलानेवाले पुरुष बहुतही कम मिलते हैं। तोभी इन सिद्धांतोंको सत्य मानकरही जगतका व्यवहार चल रहा है। ऐसे लोग बहुत कम मिलेंगे, जिन्हें इस बातका प्रत्यक्ष ज्ञान है, कि हिमालयकी ऊँचाई पाँच मील है या दस मील। परंतु जब कोई यह प्रश्न पूछता है, कि हिमालयकी ऊँचाई कितनी है, तब भूगोलकी पुस्तकमें पढ़ी हुई, 'तेईस हजार फीट' संख्या हम तुरंतही बतला देते हैं। फिर यदि इसी प्रकार कोई पूछे, कि 'ब्रह्म कैसा है' तो यह उत्तर देनेमें क्या हानि है, कि वह 'निर्गुण' है। वह सचमुचही निर्गुण है या नहीं, इस बातकी पूरी जाँचकर उसके साधक-बाधक प्रमाणोंकी मीमांसा करनेके लिये सामान्य लोगोंमें बुद्धिकी तीव्रता भलेही न हो; परंतु श्रद्धा या विश्वास कुछ ऐसा मनोधर्म नहीं है,
जो केवल महाबुद्धिमान् पुरुषोंमेंही पाया जाय। अज्ञ जनोंमेंभी श्रद्धाकी कुछ न्यूनता नहीं होती। और जब कि श्रद्धामेही वे लोग अपने सैकड़ों सांसारिक व्यवहार सदैव किया करते हैं, तो उसी श्रद्धासे यदि वे ब्रह्मको निर्गुण मान लेवें, तो कोई प्रत्यवाय नहीं दीख पड़ता। मोक्ष-धर्मका इतिहास पढ़नेसेभी मालूम होगा, कि जब ज्ञाता पुरुषोंने ब्रह्मस्वरूपकी मीमांसाकर उसे निर्गुण बतलाया, उसके पहलेही मनुष्यने केवल अपनी श्रद्धामे यह जान लिया था, कि सृष्टिकी जड़मेंभी सृष्टिके नाशवान् और अनित्य पदार्थोंसे भिन्न या विलक्षण कोई एक तत्त्व है; जो अनाद्यन्त, अमृत, स्वतंत्र, सर्वशक्तिमान्, सर्वत्र और सर्वव्यापी है; और मनुष्य उसी समयसे उस तत्त्वकी उपासना किसी-न-किसी रूपमें करना चला आया है। यह सच है, कि वह उस समय इस ज्ञानकी उपपत्ति बतला नही सकता था; परंतु आधिभौतिकशास्त्रमें यही क्रम दीख पड़ता है, कि पहले अनुभव होता है; और पश्चात् उसकी उपपत्ति बतलाई जाती है। उदाहरणार्थ, भास्कराचार्यको पृथ्वीके अथवा अंतमें न्यूटनको सारे विश्वके, गुरुत्वाकर्षणकी कल्पना सूझनेके पहलेभी यह बात अनादि कालसे सब लोगोंको मालूम थी, कि पेड़से गिरा हुआ फल नीचे पृथ्वीपर गिर पड़ता है। अध्यात्मशास्त्रकोभी यही नियम उपयुक्त है। श्रद्धासे प्राप्त हुए ज्ञानकी जाँच करना और उसकी उपपत्तिकी खोज करना बुद्धिका काम है सही; परंतु सब प्रकार योग्य उपपत्तिके न मिलनेसेही यह नहीं कहा जा सकता, कि श्रद्धासे प्राप्त होनेवाला ज्ञान केवल भ्रम है। यदि सिर्फ इतनाही जान लेनेसे हमारा काम चल जाय, कि ब्रह्म निर्गुण है; तो इसमें संदेह नहीं, कि वह काम उपर्युक्त कथनके अनुसार श्रद्धासे चला जा सकता है (गीता १३. २५)। परंतु नवें प्रकरणके अंतमें कह चुके हैं, कि ब्राह्मी स्थिति या सिद्धावस्थाकी प्राप्ति कर लेनाही इस संसारमे मनुष्यका परम साध्य या अंतिम ध्येय है; और उसके लिये केवल यह कोरा ज्ञान कि ब्रह्म निर्गुण है, किसी कामका नहीं। दीर्घ समयके अभ्यास और नित्यकी आदतसे इस ज्ञानका प्रवेश हृदयमें तथा देहेंद्रियोंमें अच्छी तरह हो जाना चाहिये; और आचरणके द्वारा ब्रह्मात्मैक्य-बुद्धिही हमारा देह; स्वभाव हो जाना चाहिये और ऐसा होनेके लिये परमेश्वरके स्वरूपका प्रेमपूर्वक चिंतन करके मनको तदाकार करनाही एक सुलभ उपाय है। यह मार्ग अथवा साधन हमारे देशमें बहुत प्राचीन समयसे प्रचलित है; और इसीको उपासना या भक्ति कहते हैं। भक्तिका लक्षण शांडिल्यसूत्रमें (शां. सू. २) इस प्रकार है, कि “सा (भक्तिः) परानुरक्तिरीश्वरे।”- ईश्वरके प्रति ‘परा’ अर्थात् निरतिशय जो प्रेम है, उसे भक्ति कहते हैं। ‘पर’ शब्दका अर्थ केवल निरतिशयही नहीं है; किंतु भागवतपुराणमें कहा है, कि वह प्रेम निर्हेतुक, निष्काम और निरंतर हो - “अहैतुक्य व्यवहिता या भक्तिः पुरुषोत्तमे” (भाग. ३. २९. १२)। कारण यह है, कि जब भक्ति इस हेतुसे की जाती है, कि हे ईश्वर! मुझे कुछ दे; तब वैदिक यज्ञयागादिक काम्य-कर्मोंके समान उमेभी कुछ-न-कुछ व्यापारका स्वरूप प्राप्त हो जाता है। ऐसी
४१२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
भक्ति राजस कहलाती है; और फिर उससे चित्तकी शुद्धिही पूरी पूरी नहीं होती, और जब चित्तकी शुद्धिही पूरी नहीं हुई, तब कहना नहीं होगा कि, आध्यात्मिक उन्नतिमें मोक्षकी प्राप्तिमें बाधा आ जायगी। अध्यात्मशास्त्र-प्रतिपादित पूर्ण निष्कामताका तत्त्व इस प्रकार भक्तिमार्गमेंभी बना रहता है और इसीलिये गीतामें भगवद्भक्तोंकी चार श्रेणियां करके कहा है, कि "उनमेंसे जो 'अर्थार्थी' है याने जो कुछ पानेके हेतु परमेश्वरकी भक्ति करता है, वह निकृष्ट श्रेणीका भक्त है; और परमेश्वरका ज्ञान होनेके कारण जो स्वयं अपने लिये कुछ प्राप्त करनेकी इच्छा नहीं रखता" (गीता ३.१८); परंतु नारद आदिकोंके समान जो 'ज्ञानी' पुरुष अन्य निष्काम कर्मोंकी तरह केवल कर्तव्य-बुद्धिसेही परमेश्वरकी भक्ति करता है, वही सब भक्तोंमें श्रेष्ठ है (गीता ७. १६-१८)। यह भक्ति भागवतपुराणके (भाग ७. ५. २३) अनुसार नौ प्रकारकी है; जैसे :- श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् । अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यं आत्मनिवेदनम् ।। नारदके भक्तिसूत्रमें इसी भक्तिके ग्यारह भेद किये गये हैं (ना. सू. ८२)। परंतु भक्तिके इन सब भेदोंका निरूपण दासबोध आदि अनेक भाषा-ग्रंथोंमें विस्तृत रीतिसे किया गया है; इसलिये हम यहाँ उनकी विशेष चर्चा नहीं करते। भक्ति किसीभी प्रकारकी हो; यह प्रकट है, कि परमेश्वरमें निरतिशय और निर्हेतुक प्रेम रखकर अपनी वृत्तिको तदाकार करनेका भक्तिका सामान्य काम प्रत्येक मनुष्यको अपने मनहीसे करना पड़ता है। छठे प्रकरणमें कह चुके हैं, कि बुद्धि नामक जो अंतरिंद्रिय है, वह केवल भले-बुरे, धर्म-अधर्म अथवा कार्य-अकार्यका निर्णय करनेके सिवा और कुछ नहीं करती, शेष मानसिक कार्य मनहीको करने पड़ते हैं। अर्थात् अब मनहीके दो भेद हो जाते हैं।- एक भक्ति करनेवाला मन और दूसरा उसका उपास्य याने जिससे प्रेम किया जाता है वह वस्तु। उपनिषदोंमें जिस श्रेष्ठ ब्रह्म-स्वरूपका प्रति- पादन किया गया है, वह इंद्रियातीत, अव्यक्त, अनंत, निर्गुण और 'एकमेवाद्वितीयम्' है, इसलिये उपासनाका आरंभ उस स्वरूपसे नहीं हो सकता। कारण यह है, कि जब इस श्रेष्ठ ब्रह्म-स्वरूपका अनुभव होता है, तब मन अलग नहीं रहता; किंतु उपास्य और उपासक, अथवा ज्ञाता और ज्ञेय, दोनों एकरूप हो जाते हैं; यह 'अध्यात्म' प्रकरणमें कह चुके हैं, निर्गुण ब्रह्म अंतिम साध्य वस्तु है, साधन नहीं; और जबतक किसी-न-किसी साधनसे निर्गुण ब्रह्मके साथ एकरूप होनेकी पात्रता मनमें न आवे, तबतक इस श्रेष्ठ ब्रह्म-स्वरूपका साक्षात्कार हो नहीं सकता। अतएव साधनकी दृष्टिसे की जानेवाली उपासनाके लिये जिस ब्रह्म-स्वरूपका स्वीकार करना होता है, वह दूसरी श्रेणीका - अर्थात् उपास्य और उपासकके भेदसे - मनको गोचर होनेवाला, याने सगुणही होता है; और इसी लिये उपनिषदोंमें जहाँ जहाँ ब्रह्मकी उपासना
भक्तिमार्ग ४१३ कही गई है, वहाँ वहाँ उपास्य ब्रह्मके अव्यक्त होनेपरभी सगुण-रूपसेही उसका वर्णन किया गया है। उदाहरणार्थ, शांडिल्यविद्यामें जिस ब्रह्मकी उपासना कही गई है, वह यद्यपि अव्यक्त अर्थात् निराकार है, तथापि छांदोग्योपनिषदमें (छां. ३. १४) कहा है, कि वह प्राणशरीर, सत्यसंकल्प, सर्वगंध, सर्वरस, सर्वकर्म, अर्थात् मनको गोचर होनेवाले सब गुणोंमें युक्त हो। स्मरण रहे, कि यहाँ उपास्य ब्रह्म यद्यपि सगुण है; तथापि वह अव्यक्त अर्थात् निराकार है। परंतु मनुष्यके मनकी स्वाभाविक रचनाही ऐसी है, कि सगुण वस्तुओंमेंसेभी जो वस्तु अव्यक्त होती है; अर्थात् जिसका कोई विशेष रूप, गंध आदि नहीं; और इसलिये जो नेत्रादि इंद्रियोंको अगोचर है, उससे प्रेम करना या हमेशा उसका चिंतनकर मनको उसीमें स्थिर करके वृत्तिको तदाकार करना, मनुष्यके लिये बहुत कठिन और दुःसाध्यभी है। क्योंकि, मन स्वभावसेही चंचल है, इसलिये जबतक मनके सामने आधारके लिये कोई इंद्रियगोचर स्थिर वस्तु न हो, तबतक मन बारबार भूल जाया करता है, स्थिर कहाँ होना है। चित्तकी स्थिरताका यह मानसिक कार्य बड़े बड़े ज्ञानी पुरुषोंकोभी दुष्कर होता है, तो फिर साधारण मनुष्योंके लिये कहनाही क्या? अतएव रेखा- गणितके सिद्धान्तोंकी शिक्षा देते समय जिस प्रकार ऐसी रेखाकी कल्पना करनेके लिये – कि जो अनादि, अनंत और बिना चौड़ाईकी (अव्यक्त) है; किंतु जिसमें लंबाईका गुण होनेसे सगुण है – उस रेखाका एक छोटा-सा नमूना स्लेट या तख्ते- पर व्यक्त करके दिखलाना पड़ता है; उसी प्रकार ऐसे परमेश्वरसे प्रेम करने और उसमें अपनी वृत्तिको लीन करनेके लिये, कि जो सर्वकर्ता, सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ अतएव सगुण है; परंतु निराकार अर्थात् अव्यक्त है, मनके सामने कुछ-न-कुछ अर्थात् 'प्रत्यक्ष' नामरूपात्मक किसी व्यक्त वस्तुके रहे-बिना कमसे-कम साधारण मनुष्योंका काम चल नहीं सकता।* यही क्यों, पहले किसी व्यक्त पदार्थको देखे बिना कमसे- कम मनुष्यके मनमें अव्यक्तकी कल्पनाही जागृत हो नहीं सकती। उदाहरणार्थ, जब हम लाल, हरे इत्यादि अनेक व्यक्त रंगोंको पहले आँखोंसे देख लेते हैं, तभी 'रंग'की सामान्य और अव्यक्त कल्पना हमारे मनमें जागृत होती है, अन्यथा होही नहीं सकती। अब चाहे इसे कोई मनुष्यके मनका स्वभाव कहे या दोष; कुछभी कहा
- इस विषयपर एक श्लोक है, जो योगवासिष्ठका कहा जाता है :- अक्षरावगमलब्धये यथा स्थूलवर्तुलदृषत्परिग्रहः । शुद्धबुद्धपरिलब्धये तथा दारुमृन्मयशिलामयार्चनम् ॥ “अक्षरोंका परिचय करानेके लिये लड़कोंके सामने जिस प्रकार छोटे छोटे कंकड़ रखकर अक्षरोंका आकार दिखलाना पड़ता है, उसी प्रकार (नित्य,) शुद्ध-बुद्ध परब्रह्मका ज्ञान होनेके लिये लकड़ी, मिट्टी या पत्थरकी मूर्तिका उपयोग किया जाता है।” परंतु यह श्लोक बृहद्योगवासिष्ठमें नहीं मिलता।
जाय, पर जबतक देहधारी मनुष्य अपने मनके इस स्वभावको अलग नहीं कर सकता, तबतक उपासनाके लिये याने भक्तिके लिये निर्गुणसे सगुणमें – और उसमेंभी अव्यक्त सगुणकी अपेक्षा व्यक्त सगुणहीमें – आना पड़ता है; इसके अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं। यही कारण है, कि व्यक्त-उपासनाका मार्ग अनादि कालसे प्रचलित है; रामतापनीय आदि उपनिषदोंमें प्रत्यक्ष मनुष्य-रूपधारी व्यक्त ब्रह्म- स्वरूपकी उपासनाका वर्णन है; और भगवद्गीतामेंभी यह कहा गया है, कि :- क्लेशोऽधिकतरस्तेषां अव्यक्तासक्तचेतसाम् । अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥ “अव्यक्तमें चित्तकी ( मनकी ) एकाग्रता करनेवालेको बहुत कष्ट होते हैं; क्योंकि इस अव्यक्त गतिको पाना देहेंद्रियधारी मनुष्यके लिये स्वभावतः कष्टदायक है” ( गीता १२. ५ )। इस ‘प्रत्यक्ष’ मार्गहीको ‘भक्ति-मार्ग’ कहते हैं। इसमें कुछ संदेह नहीं, कि कोई बुद्धिमान् पुरुष अपनी बुद्धिसे परब्रह्मके स्वरूपका निश्चय कर उसके अव्यक्त स्वरूपमें केवल अपने विचारोंके बलसे अपने मनको स्थिरकर सकता है। परंतु इस रीतिसे अव्यक्तमें ‘मन’को आसक्त करनेका कामभी तो अंतमें श्रद्धा और प्रेमसेही सिद्ध करना होता है, इसलिये इस मार्गमेंभी श्रद्धा और प्रेमकी आवश्यकता छूट नहीं सकती। सच पूछो तो तात्विक दृष्टिसे सच्चिदानंद ब्रह्मो- पासनाका समावेशभी प्रेममूलक भक्ति-मार्गमेंही किया जाना चाहिये। परंतु इस मार्गमें ध्यान करनेके लिये जिस ब्रह्मस्वरूपका स्वीकार किया जाता है, वह पहलेसे अव्यक्त और केवल बुद्धिगम्य अर्थात् ज्ञानगम्य होता है; और उसीको प्रधानता दी जाती है, इसलिये इस क्रियाको भक्ति-मार्ग न कहकर अध्यात्म-विचार, अव्यक्तो- पासना या केवल उपासना, अथवा ज्ञान-मार्ग कहते हैं; और उपास्य ब्रह्मके सगुण- ही रहनेपरभी जब उसका अव्यक्तके बदले व्यक्त – और विशेषतः मनुष्यदेहधारी – रूप स्वीकृत किया जाता है, तब वही भक्ति-मार्ग कहलाता है। इस प्रकार यद्यपि मार्ग दो हैं, तथापि उन दोनोंसे एकही परमेश्वरकी प्राप्ति होती है; और अंतमें एकही-सी साम्यबुद्धि मनमें उत्पन्न होती है, इसलिये स्पष्ट दीख पड़ेगा, कि जिस प्रकारकिसी छतपर जानेके लिये दो जीने होते हैं, उसी प्रकार भिन्न भिन्न मनुष्योंकी योग्यताके अनुसार ये दो ( ज्ञान-मार्ग और भक्ति-मार्ग ) अनादि-सिद्ध भिन्न भिन्न मार्ग हैं, इन मार्गोंकी भिन्नतासे अंतिम साध्य अथवा ध्येयमें कुछ भिन्नता नहीं होती। इनमेंसे एक जीनेकी पहली सीढ़ी बुद्धि है, तो दूसरे जीनेकी पहली सीढ़ी श्रद्धा और प्रेम है; और किसीभी मार्गसे जाओ; अंतमें एकही परमेश्वरका एकही प्रकारका ज्ञान होता है; एवं एकही-सी मुक्तिभी प्राप्त होती है। इस लिये दोनों मार्गोंमें यही सिद्धांत एकही-सा स्थिर रहता है, कि “अनुभवात्मक ज्ञानके बिना मोक्ष नहीं मिलता।” फिर यह व्यर्थ बखेड़ा करनेमे क्या लाभ है, कि ज्ञान-मार्ग श्रेष्ठ है या
भक्तिमार्ग ४१५ भक्ति-मार्ग श्रेष्ठ है ? यद्यपि ये दोनों साधन प्रथमावस्थामें अधिकार या योग्यताके अनुसार भिन्न हों, तथापि अंतमें अर्थात् परिणामस्वरूपमें दोनोंकी योग्यता समान है; और गीतामें इन दोनोंको एकही 'अध्यात्म' नाम दिया गया है ( गीता ११. १ ) । अब यद्यपि साधनकी दृष्टिसे ज्ञान और भक्तिकी योग्यता एकही समान है; तथापि इन दोनोंमें यह महत्त्वका भेद है, कि भक्ति कदापि निष्ठा नहीं हो सकती; किंतु ज्ञानको निष्ठा याने सिद्धावस्थाकी अंतिम स्थिति कह सकते हैं। इसमें संदेह नहीं कि, अध्यात्म-विचारसे या अव्यक्तोपासनासे परमेश्वरका जो ज्ञान होता है, वही भक्ति- सेभी हो सकता है ( गीता १८. ५५ ); परंतु इस प्रकार ज्ञानकी प्राप्ति हो जानेपर आगे यदि कोई मनुष्य सांसारिक कार्योंको छोड़ दे, और ज्ञानहीमें सदा निमग्न रहने लगे, तो गीताके अनुसार वह 'ज्ञाननिष्ठ' कहलावेगा; 'भक्तिनिष्ठ' नहीं। इसका कारण यह है, कि जबतक भक्तिकी क्रिया जारी रहती है, तबतक उपास्य और उपासकरूपी द्वैतभावभी बना रहता है; और अंतिम ब्रह्मात्मैक्य स्थितिमें तो भक्तिकी कौन कहे, अन्य किसीभी प्रकारकी उपासना शेष नहीं रह सकती। भक्तिका पर्यवसान या फल ज्ञान है। भक्ति ज्ञानका साधन है - वह अंतिम साध्य नहीं है। सारांश अव्यक्तोपासनाकी दृष्टिसे ज्ञान एक बार साधन हो सकता है; और दूसरी बार ब्रह्मात्मैक्यके अपरोक्षानुभवकी दृष्टिसे उसी ज्ञानको निष्ठा याने (सिद्धावस्थाकी) अंतिम स्थिति कह सकते हैं। जब इस भेदको प्रकट रूपसे दिखलानेकी आवश्यकता, होती है, तब 'ज्ञान-मार्ग' और 'ज्ञाननिष्ठा' इन दोनों शब्दोंका उपयोग समान अर्थमें नहीं किया जाता; किंतु अव्यक्तोपासनाकी साधनावस्थावाली स्थिति दिखलानेके लिये ान-मार्ग' शब्दका उपयोग किया जाता है; और ज्ञान-प्राप्तिके अनंतर सब कर्मोंको छोड़ ज्ञानहीमें निमग्न हो जानेकी जो सिद्धावस्थाकी स्थिति है, उसके लिये 'ज्ञाननिष्ठ' शब्दका उपयोग किया जाता है। अर्थात् अव्यक्तोपासना या अध्यात्म- विचारके अर्थमें ज्ञानको एक बार साधन ( ज्ञान-मार्ग ) कह सकते हैं और दूसरी बार अपरोक्षानुभवके अर्थमें उसी ज्ञानको निष्ठा याने कर्मत्यागरूपी अंतिम अवस्था कह सकते हैं। यही बात कर्मके विषयमेंभी कही जा सकती है। शास्त्रोक्त मर्यादाके अनुसार जो कर्म पहले चित्तकी शुद्धि के लिये किया जाता है, वह साधन कहलाता है। इस कर्मसे चित्तका शुद्धि होती है; और अंतमें ज्ञान तथा शांतिकी प्राप्ति होती है। परंतु यदि कोई मनुष्य आगे इस ज्ञानमेंही निमग्न न रहकर शांतिपूर्वक मृत्यु- पर्यंत निष्काम कर्म करता चला जावे, तो ज्ञानयुक्त निष्काम कर्मकी दृष्टिसे उसके इस कर्मको निष्ठा कह सकते हैं ( गीता ३. ३ )। यह बात भक्तिके विषयमें नहीं कह सकते, क्योंकि भक्ति सिर्फ एक मार्ग या उपाय अर्थात् ज्ञान-प्राप्तिका साधन है, वह निष्ठा नहीं है। इसलिये गीताके आरंभमें ज्ञान ( सांख्य ) और योग ( कर्म ) येही दो निष्ठाएँ कही गई हैं; उनमेंसे कर्म योग-निष्ठाकी सिद्धिके उपाय, साधन, विधि या मार्गका विचार करते समय ( गीता ७. १ ), अव्यक्तोपासना (ज्ञान-मार्ग)
४१६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र
और व्यक्तोपासनाका (भक्ति-मार्ग) - अर्थात् जो दो साधन प्राचीन समयमे एक साथ चले आ रहे हैं उनका - वर्णन करके, गीतामें सिर्फ इतनाही कहा है, कि "इन दोनोंमेंसे अव्यक्तोपासना बहुत क्लेशमय है; और व्यक्तोपासना या भक्ति अधिक सुलभ है याने इस साधनका स्वीकार सब साधारण लोग कर सकते हैं"। प्राचीन उपनिषदोंमें ज्ञान-मार्गहीका विचार किया गया है; और शांडिल्य आदि सूत्रोंमें तथा भागवत आदि ग्रंथोंमें भक्ति-मार्गहीकी महिमा गाई गई है। परंतु साधन-दृष्टिसे ज्ञान-मार्ग और भक्ति-मार्गमें योग्यतानुसार भेद दिखलाकर, अंतमें निष्काम कर्मके साथ दोनोंका मेल जैसा गीताने सम-बुद्धिसे किया है, वैसा अन्य किसीभी प्राचीन धर्मग्रंथने नहीं किया है। ईश्वरके स्वरूपका यह यथार्थ और अनुभवात्मक ज्ञान होनेके लिये, कि "सब प्राणियोंमें एकही परमेश्वर है;" देहेंद्रियधारी मनुष्यको क्या करना चाहिये, इस प्रश्नका विचार उपर्युक्त रीतिसे करनेपर जान पड़ेगा, कि यद्यपि परमेश्वरका श्रेष्ठ स्वरूप अनादि, अनंत, अनिर्वाच्य, अचिंत्य और 'नेति नेति' है, तथापि वह निर्गुण, अज्ञेय और अव्यक्तभी है, और जब उसका अनुभव होता है, तब उपास्य- उपासकरूपी द्वैतभाव शेष नहीं रहता, इसलिये उपासनाका आरंभ वहाँसे नहीं हो सकता। वह तो केवल अंतिम साध्य है, साधन नहीं; और तद्रूप होनेकी अद्वैत स्थितिकी प्राप्तिके लिये उपासना केवल एक साधन या उपाय है। अतएव उस उपासनामें जिस वस्तुको स्वीकार करना पड़ता है, उसका सगुण होना अत्यंत आवश्यक है। सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, सर्वव्यापी और निराकार ब्रह्मस्वरूप वैसा अर्थात् सगुण है। परंतु वह केवल बुद्धिगम्य और अव्यक्त अर्थात् इंद्रियोंको अगोचर होनेके कारण उपासनाके लिये अत्यंत क्लेशमय है। अतएव प्रत्येक धर्ममें यही दीख पड़ता है, कि इन दोनों परमेश्वर-स्वरूपोंकी अपेक्षा जो परमेश्वर अचिंत्य, सर्वसाक्षी, सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान् जगदात्मा होकरभी हमारे समान हमसे बोलेगा, हमसे प्रेम करेगा, हमको सन्मार्ग दिखावेगा और हमें सद्गति देगा; जिसे हम लोग 'अपना' कह सकेंगे, जिसे हमारे सुखदुःखोंके साथ सहानुभूति होगी अथवा जो हमारे अपराधोंको क्षमा करेगा, जिसके साथ हम लोगोंका यह प्रत्यक्ष संबंध उत्पन्न हो, कि "हे परमेश्वर ! मैं तेरा हूँ और तू मेरा है," जो पिताके समान मेरी रक्षा करेगा और माताके समान प्यार करेगा; अथवा जो "गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्" (गीता ९. १७, १८) है -- अर्थात् जिसके विषयमें मैं यह कह सकूँगा, कि "तू मेरी गति है, तू पोषणकर्ता है, तू मेरा स्वामी है, तू मेरा साक्षी है, तू मेरा विश्रामस्थान है, तू मेरा अंतिम आधार है, तू मेरा सखा है," और ऐसा कहकर बच्चोंकी नाईं प्रेमपूर्वक तथा लाड़से जिसके स्वरूपका आकलन मैं कर सकूँगा - ऐसे सत्यसंकल्प, सकलैश्वर्यसंपन्न, दयासागर, भक्तवत्सल, परम पवित्र, परम उदार, परम कारुणिक, परमपूज्य, सर्वसुंदर, सकलगुणनिधान अथवा संक्षेपमें कहे तो ऐसे
भक्तिमार्ग ४१७ लाड़ले सगुण, प्रेमगम्य और व्यक्त याने प्रत्यक्ष-रूपधारी सुलभ परमेश्वरहीके स्वरूपका सहारा मनुष्य 'भक्तिके लिये' स्वभावतः लिया करता है। जो पर- ब्रह्म मूलमें अचिंत्य और 'एकमेवाद्वितीयम्' है, उसके उक्त प्रकारके अंतिम दो स्वरूपोंको - अर्थात् प्रेम, श्रद्धा आदि मनोमय नेत्रोंसे मनुष्यको गोचर होनेवाले स्वरूपोंकोही - वेदान्तशास्त्रकी परिभाषामें 'ईश्वर' कहते हैं। परमेश्वर सर्वव्यापी होकरभी 'विठ्ठल' मर्यादित क्यों हो गया? इसका उत्तर प्रसिद्ध महाराष्ट्र साधु तुकारामने एक पद्यमें (तु. गा. ३८. ७) दिया है, जिसका आशय यह है :- रहता है सर्वत्रही व्यापक एक समान। पर निज भक्तों के लिये छोटा है भगवान् ॥ यही सिद्धान्त वेदान्त-सूत्रमेंभी दिया गया है (वे. सू. १. २. ७) । उपनिषदोंमेंभी जहाँ जहाँ ब्रह्मकी उपासनाका वर्णन है, वहाँ वहाँ प्राण, मन इत्यादि सगुणपर केवल अव्यक्त वस्तुओंहीका निर्देश न कर, उनके साथ साथ सूर्य (आदित्य), अन्न इत्यादि सगुण व्यक्त पदार्थोंकी उपासनाभी कही गई है (तै. ३. २-६; छा. ३) । श्वेताश्वतरोपनिषदमें तो 'ईश्वर' का लक्षण इस प्रकार बतला कर, कि "मायां तु प्रकृतिं विद्यात् मायिनं तु महेश्वरम् " (श्वे. ४. १०) - प्रकृतिहीको माया और इस मायाके अधिपतिको महेश्वर जानो; आगे गीताहीके समान (गीता १०. ३) सगुण ईश्वरकी महिमाका इस प्रकार वर्णन किया है, कि "ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशै " - इस देवको जान लेनेसे मनुष्य सब पाशोंसे मुक्त हो जाता है (श्वे. ४. १६) । इस उपास्य परब्रह्मके चिन्ह, पहचान, अवतार, अंश य- प्रतिनिधिका तौरपर उपासनाके लिये आवश्यक नाम-रूपात्मक वस्तुकोही वेदान्त- शास्त्रमें 'प्रतीक' कहते हैं। प्रतीक (प्रति + इक) शब्दका धात्वर्थ, (प्रति) अपनी ओर हुआ है। जब किसी वस्तुका कोई एक भाग पहले गोचर हो; और फिर उससे आगे उस वस्तुका ज्ञान हो, तब उस भागको प्रतीक कहते हैं। इस नियमके अनुसार, सर्वव्यापी परमेश्वरका ज्ञान होनेके लिये उसका कोईभी प्रत्यक्ष चिन्ह, अंशरूपी विभूति या भाग 'प्रतीक' हो सकता है। उदाहरणार्थ, महाभारतमें ब्राह्मण और व्याधका जो संवाद है, उसमे व्याधने ब्राह्मणको पहले बहुत-सा अध्यात्मज्ञान बतलाया। फिर अंतमें "हे द्विजवर ! मेरा जो प्रत्यक्ष धर्म है उसे अब देखो" - "प्रत्यक्षं मम यो धर्मस्तं च पश्य द्विजोत्तम" (महा. वन. २१३. ३) ऐसा कहकर उस ब्राह्मणको वह व्याध अपने वृद्ध माता-पिताके समीप ले गया और कहने लगा - येही मेरे 'प्रत्यक्ष' देवता हैं; और मनोभावसे ईश्वरके समान इन्हींकी सेवा करना मेरा 'प्रत्यक्ष' धर्म है। इसी अभिप्रायका मनमें रखकर भगवान् श्रीकृष्णने अपने व्यक्त स्वरूपकी उपासना बतलानेके पहले गीतामे कहा है, कि भक्तिका यह मार्ग - राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् । प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥ गी. र. २७
४१८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र “सब विद्याओंमें और गुह्योंमें श्रेष्ठ (राजविद्या और राजगुह्य) है; यह उत्तम, पवित्र, प्रत्यक्ष दीख पड़नेवाला, धर्मानुकूल, सुखसे आचरण करने योग्य और अक्षय है” (गीता ९. २)। इस श्लोकमें राजविद्या और राजगुह्य दोनों सामासिक शब्द हैं; इनका विग्रह इस प्रकार है- 'विद्यानां राजा' और 'गुह्यानां राजा' (विद्याओंका राजा और गुह्योंका राजा)। और जब समास होता है, तब संस्कृत व्याकरणके नियमानुसार 'राज' शब्द उसमें पहले आता है। परंतु इसके बदले कुछ लोग 'राज्ञां विद्या' (राजाओंकी विद्या) ऐसा विग्रह करते हैं; और कहते हैं, कि योगवासिष्ठमें (यो. २. ११. १६-१८) जो वर्णन है, उसके अनुसार जब प्राचीन समयमें ऋषियोंने राजाओंको ब्रह्मविद्याका उपदेश किया, तबसे ब्रह्मविद्या या अध्यात्मज्ञानहीको राजविद्या और राजगुह्य कहने लगे हैं। इसलिये गीतामेंभी इन शब्दोंका वही अर्थ याने अध्यात्मज्ञान-भक्ति नहीं-लिया जाना चाहिये। गीता-प्रतिपादित मार्गभी मनु, इक्ष्वाकु प्रभृति राजपरंपराहीसे प्रवृत्त हुआ है (गीता ४. १); इसलिये नहीं कहा जा सकता, कि गीतामें 'राजविद्या' और 'राजगुह्य' शब्द 'राजाओंकी विद्या' और 'राजाओंका गुह्य'-याने राजमान्य विद्या और गुह्य-के अर्थमें प्रयुक्त न हुए हों। परंतु इन अर्थोंको मान लेनेपरभी यह ध्यान देने योग्य बात है, कि इस स्थानमें ये शब्द ज्ञान-मार्गके लिये प्रयुक्त नहीं हुए हैं। कारण यह है, कि गीताके जिस अध्यायमें यह श्लोक आया है, उसमें भक्ति- मार्गकाही विशेष प्रतिपादन किया गया है (गीता ९. २२-३१); और यद्यपि साध्य ब्रह्म एकही है, तथापि गीतामेंही अध्यात्मविद्याका साधनात्मक ज्ञान-मार्ग केवल 'बुद्धिगम्य' अतएव 'अव्यक्त' और 'दुःखकारक' कहा गया है (गीता १२. ५)। ऐसी अवस्थामें यह असंभव जान पड़ता है, कि भगवान् अब उसके विरुद्ध उसी ज्ञान-मार्गको 'प्रत्यक्षावगमं' याने व्यक्त और 'कर्तुं सुसुखम्' याने आचरण करनेमें सुखकारक कहेंगे। अतएव प्रकरणकी साम्यताके कारण और केवल भक्ति- मार्गहीके लिये सर्वथा उपयुक्त होनेवाले 'प्रत्यक्षावगमं' तथा 'कर्तुं सुसुखम्' पदोंकी स्वारस्य-सत्ताके कारण, अर्थात् इन दोनों कारणोंसे, यही सिद्ध होता है, कि इस श्लोकमें 'राजविद्या' शब्दसे भक्ति-मार्गही विवक्षित है। 'विद्या' शब्द केवल ब्रह्म- ज्ञानसूचक नहीं है; किंतु परब्रह्मका ज्ञान प्राप्तकर लेनेके जो साधन या मार्ग हैं उन्हेंभी उपनिषदोंमें 'विद्या'ही कहा है। उदाहरणार्थ, शांडिल्यविद्या, प्राणविद्या, हार्दविद्या इत्यादि। वेदान्त-सूत्रके तीसरे अध्यायके तीसरे पादमें, उपनिषदोंमें वर्णित सभी ऐसी विद्याओंका अर्थात् साधनाओंका विचार किया गया है। उपनिषदोंसे यहभी विदित होता है, कि प्राचीन समयमें ये सब विद्याएँ गुप्त रखी जाती थीं; और केवल शिष्योंके अतिरिक्त अन्य किसीकोभी उनका उपदेश नहीं किया जाता था। अतएव कोईभी विद्या हो, वह गुह्य अवश्यही होगी। परंतु ब्रह्म-प्राप्तिके लिये साधनभूत होनेवाली ये जो गुह्य विद्याएँ या मार्ग हैं, वे यद्यपि अनेक हों, तथापि
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उन सबमें गीता-प्रतिपादित भक्ति-मार्गरूपी विद्या अर्थात् साधन श्रेष्ठ (गुह्यानां विद्यानां च राजा ) है। क्योंकि हमारे मतानुसार उक्त श्लोकका भावार्थ यह है, कि वह (भक्ति-मार्गरूपी साधन) ज्ञान-मार्गकी विद्याके समान 'अव्यक्त' नहीं है; किंतु वह 'प्रत्यक्ष' आँखोंसे दिखाई देनेवाला है और इसी लिये उसका आचरणभी सुखसे किया जाता है। यदि गीतामें केवल बुद्धिगम्य ज्ञान-मार्गही प्रतिपादित किया गया होता, तो वैदिक धर्मके सब संप्रदायोंमें आज सैकड़ों वर्षमे इस ग्रंथकी जैसी चाह होती चली आ रही है, वैसी हुई होती या नहीं इसमें संदेह है। गीतामें जो मधुरता, प्रेम या रस भरा है, वह उसमें प्रतिपादित भक्ति-मार्गहीका परिणाम है। पहले तो स्वयं भगवान् श्रीकृष्णने – जो परमेश्वरके प्रत्यक्ष अवतार हैं – यह गीता कही है; और उसमेंभी दूसरी बात यह है, कि भगवानने अज्ञेय परब्रह्मका कोरा ज्ञानही नहीं कहा है; किंतु स्थान स्थानमें प्रथम पुरुषका प्रयोग करके अपने सगुण और व्यक्त स्वरूपको लक्ष्य कर कहा है, कि "मुझमें यह सब गूंथा हुआ है" (गीता ७. ७), "यह सब मेरीही माया है" (गीता ७. १४), "मुझसे भिन्न और कुछभी नहीं है" (गीता ७. ७), "मुझे शत्रु और मित्र दोनों बराबर हैं" (गीता ९.२९), "मैंने इस जगतको उत्पन्न किया है" (गीता ९. ४), "मेंही ब्रह्मका और मोक्षका मूल हूँ" (गीता १४. २७) अथवा "मुझे पुरुषोत्तम कहते है" (गीता १५. १८)। और अंतमें अर्जुनको यह उपदेश किया, कि "सब धर्मोंको छोड़ तू अकेले मेरी शरण आ, में तुझे सब पापोंसे मुक्त करूँगा, डर मत" (गीता १८. ६६)। इससे श्रोताकी यह भावना हो जाती है, कि मानों मैं ऐसे साक्षात् पुरुषोत्तमके सामने खड़ा हूँ, जो सम-दृष्टि, परमपूज्य, और अत्यंत दयालु है; और तब आत्मज्ञानके विषयमें उसकी निष्ठाभी बहुत दृढ़ हो जाती है। इतनाही नहीं; किंतु गीताके अध्यायोंका इस प्रकार पृथक् पृथक् विभाग न कर – कि एक बार ज्ञानका तो दूसरी बार भक्तिका प्रतिपादन हो -- ज्ञानहीमें भक्ति और भक्तिहीमें ज्ञानको गूंथ दिया है; जिसका परिणाम यह होता है, कि ज्ञान और भक्तिमें अथवा बुद्धि और प्रेममें परस्पर विरोध न होकर परमेश्वरके ज्ञानके साथही प्रेमरसकाभी अनुभव होता है; और सब प्राणियोंके विषयमें आत्मौपम्य-बुद्धिकी जागृति होकर अंतमें चित्तको विलक्षण शांति, समाधान और सुख प्राप्त होता है ! इसीमें कर्म- योगभी आ मिला है ! मानों दूधमें शक्कर मिल गई हो ! फिर इसमें कोई आश्चर्य नहीं, जो हमारे पंडितजनोंने यह सिद्धान्त किया, कि गीता-प्रतिपादित ज्ञान, ईशावास्योपनिषदके कथनानुसार, मृत्यु और अमृत अर्थात् इहलोक और परलोक दोनों जगह श्रेयस्कर है। ऊपर किये गये विवेचनसे पाठकोंके ध्यानमें यह बात आ जायगी, कि भक्ति- मार्ग किसे कहते हैं; ज्ञानमार्ग और भक्ति-मार्गमें समानता तथा विषमता क्या है; भक्ति-मार्गको राजमार्ग (राजविद्या) या सहज उपाय क्यों कहा है; और गीतामें
४२० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र भक्तिको स्वतंत्र निष्ठा क्यों नहीं माना है। परंतु ज्ञानप्राप्तिके इस सुलभ, अनादि और प्रत्यक्ष मार्गमेंभी धोखा खा जानेकी जो एक जगह है, उसकाभी कुछ विचार किया जाना चाहिये। नहीं तो संभव है, कि इस मार्गमें चलनेवाला पथिक असाव- धानतासे गड्ढेमें गिर पड़े। भगवद्गीतामें इस गड्ढेका स्पष्ट वर्णन किया गया है; और वैदिक भक्ति-मार्गमें अन्य भक्ति-मार्गोंकी अपेक्षा जो कुछ विशेषता है, वह यही है। यद्यपि इस बातको सब लोग मानते हैं, कि परब्रह्ममें मनको चित्त-शुद्धि- द्वारा साम्य-बुद्धिकी प्राप्तिके लिये साधारण आसक्त कर मनुष्योंके सामने परब्रह्मके 'प्रतीक'के नातेसे कुछ-न-कुछ सगुण अथवा व्यक्त वस्तु अवश्य होनी चाहिये, नहीं तो चित्तकी स्थिरता हो नहीं सकती; तथापि इतिहाससे दीख पड़ता है, कि 'प्रतीक' के स्वरूपके विषयमें अनेक बार झगड़े और बखेड़े हो जाया करते हैं। अध्यात्मशास्त्रकी दृष्टिसे देखा जाय, तो इस संसारमें ऐसा कोई स्थान नहीं, कि जहाँ परमेश्वर न हो। भगवद्गीतामेंभी जब अर्जुनने भगवान् श्रीकृष्णसे पूछा, कि "किन किन विभूतियोंके रूपमे तुम्हारा चिंतन (भजन) किया जावे, सो मुझे बतलाइये" (गीता १०. १८); तब दसवें अध्यायमें भगवान्ने इस स्थावर और जंगम-सृष्टिमें चारों ओर व्याप्त अपनी अनेक विभूतियोंका वर्णन करके कहा है, कि मैं इंद्रियोंमें मन, स्थावरोंमें हिमालय, यज्ञोंमें जपयज्ञ, सर्पोंमें वासुकि, दैत्योंमें प्रह्लाद, पितरोंमें अर्यमा, गंधर्वोंमें चित्ररथ, वृक्षोंमें अश्वत्थ, पक्षियोंमें गरुड़, महर्षियोंमें भृगु, अक्षरोंमें अकार, और आदित्योंमें विष्णु हूँ; और अंतमें यह कहा :- यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा । तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसंभवम् ॥ "हे अर्जुन ! यह जानो कि जो कुछ वैभव, लक्ष्मी या प्रभावसे युक्त हो, वह मेरेही तेजके अंशसे उत्पन्न हुआ है" (गीता १०. ४१); और अधिक क्या कहा जाय ! मैं अपने एक अंशमात्र से इस सारे जगत्में व्याप्त हूँ ! इतना कहकर अगले अध्यायमें विश्वरूपदर्शनसे अर्जुनको इस सिद्धान्तकी प्रत्यक्ष प्रतीतिभी करा दी है। यदि इस संसारमे दिखलाई देनेवाले सब पदार्थ या गुण परमेश्वरहीके रूप याने प्रतीक हैं तो यह कौन और कैसे कह सकता है, कि उनमें से किसी एकहीमें परमेश्वर है और दूसरेमें नहीं ? न्यायतः यही मानना पड़ता है, कि वह दूर है और समीपभी है, सत् और असत् होनेपरभी वह उन दोनोंसे परे है. अथवा गरुड़ और सर्प, मृत्यु और मारनेवाला, विघ्नकर्ता और विघ्नहर्ता, भयकृत और भयनाशक, घोर और अघोर, शिव और अशिव, वृष्टि करनेवाला और उसको रोकनेवालाभी (गीता ९. १९; १० ३०) वही है। अतएव भगवद्भक्त तुकाराम महाराजनेभी (तु. गा. २० ६७ ४) इसी भावसे कहा है - छोटा बड़ा कहें जो कुछ हम । फबता है सब तुझे महत्तम ॥
भक्तिमार्ग ४२१ इस प्रकार विचार करनेपर मालूम होता है, कि संसारकी प्रत्येक वस्तु यदि अंशतः परमेश्वरहीका स्वरूप है, तो फिर जिन लोगोंके ध्यानमें परमेश्वरका यह सर्वव्यापी स्वरूप एकाएक नहीं आ सकता, वे यदि इस अव्यक्त और शुद्ध रूपको पहचाननेके लिये इन अनेक वस्तुओंमेंसे किसी एकको साधन या प्रतीक समझकर उसकी उपासना करें, तो क्या हानि है ? कोई मनकी उपासना करेंगे, तो कोई द्रव्ययज्ञ या जपयज्ञ करेंगे । कोई गरुडकी भक्ति करेंगे, तो कोई ॐ मंत्राक्षरहीका जप करेंगे; कोई विष्णुका, तो कोई शिवका, कोई गणपतिको तो कोई भवानीका भजन करेंगे । कोई अपने मातापिताके चरणोंमें ईश्वरभाव रखकर उनकी सेवा करेंगे; और कोई उससेभी अधिक व्यापक सर्वभूतात्मक विराट् पुरुषकी उपासना पसंद करेंगे । कोई कहेंगे, सूर्यको भजो; और कोई कहेंगे, कि राम या कृष्णही सूर्यसे श्रेष्ठ हैं । परंतु अज्ञानसे या मोहसे जब यह दृष्टि छूट जाती है, कि " सब विभूतियोंका मूल स्थान एकही परब्रह्म है ", अथवा जब किसी धर्मके मूल सिद्धान्तोंमेंही यह व्यापक दृष्टि नहीं होती, तब अनेक प्रकारके उपास्योंके विषयमें वृथाभिमान और दुराग्रह उत्पन्न हो जाता है; और कभी कभी तो लड़ाइयाँ हो जानेतक नौबत आ पहुँचती है । वैदिक, बौद्ध, जैन, ईसाई या मुहंमदी धर्मोंके परस्पर-विरोधकी बात छोड़ दें और केवल ईसाई धर्मकोही देखें : तो यूरोपके इतिहाससे यही दीख पड़ता है, कि एक-ही सगुण और व्यक्त ईसा मसीहके उपासकोंमेंभी विधिभेदोंके कारण एक दूसरेकी जान लेने- तककी नौबत आ चुकी थी । हमारे देशके सगुण उपासकोंमेंभी अबतक यह झगड़ा दीख पड़ता है, कि हमारा देव निराकार होनेके कारण अन्य लोगोंके साकार देवसे श्रेष्ठ है । भक्ति-मार्गमें उत्पन्न होनेवाले इन झगड़ोंका निर्णय करनेके लिये कोई उपाय है या नहीं ? यदि है तो वह कौन-सा उपाय है ? जब तक इसका ठीक ठीक विचार नहीं हो जाता, तबतक भक्तिमार्ग बेखटकेका या बगैर धोखेका नहीं कहा जा सकता । इसलिये अब यही विचार किया जायगा, कि गीतामें इस प्रश्नका क्या उत्तर दिया गया है । कहना नहीं होगा, कि हिंदुस्थानकी वर्तमान दशामें इस विषयका यथोचित विचार करना विशेष महत्त्वकी बात है । साम्य-बुद्धिकी प्राप्तिके लिये मनको स्थिर करके परमेश्वरकी अनेक सगुण विभूतियोंमेंसे किसी एक विभूतिके स्वरूपका प्रथमतः चिंतन करना अथवा उसको प्रतीक समझकर प्रत्यक्ष नेत्रोंके सामने रखना, इत्यादि साधनोंका वर्णन प्राचीन उपनिषदोंमेंभी पाया जाता है; और रामतापनी सरीखे उत्तरकालीन उपनिषदमें या गीतामेंभी मानव-रूपधारी सगुण परमेश्वरकी निस्सीम और एकांतिक भक्ति- कोही परमेश्वर-प्राप्तिका मुख्य साधन माना है । परंतु साधनकी दृष्टिसे यद्यपि वासुदेव-भक्तिको गीतामें प्रधानता दी गई है, तथापि अध्यात्म-दृष्टिसे विचार करने पर, वेदान्त-सूत्रकी नाईं (वे. सू. ४. १. ४) गीतामेंभी आगे यही स्पष्ट रीतिसे कहा है, कि 'प्रतीक' एक प्रकारका साधन है - वह सत्य, सर्वव्यापी और नित्य
४२२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र परमेश्वर हो नहीं सकता । अधिक क्या कहें, नाम-रूपात्मक व्यक्त अर्थात् सगुण वस्तुओंमेंसे किसीकोभी लीजिये; वह मायाही है। जो सत्य परमेश्वरको देखना चाहता है, उसे इस सगुण रूपकेभी परे अपनी दृष्टिको ले जाना चाहिये । यह प्रकट है, कि भगवान्की जो अनेक विभूतियाँ हैं, उनमें अर्जुनको दिखलाये गये विश्वरूपसे अधिक व्यापक और कोईभी विभूति हो नहीं सकती। परंतु जब यही विश्वरूप भगवान्ने नारदको दिखलाया, कि तब उन्होंने कहा है, कि “तू मेरे जिस रूपको देख रहा है, कि वह सत्य नहीं है, यह माया है; मेरे सत्य स्वरूपको देखनेके लिये इसकेभी आगे तुझे जाना चाहिये” (मभा. शां. ३३९. ४४); और गीतामेंभी भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनसे स्पष्ट रीतिसे यही कहा है :– अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः । परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥ “यद्यपि मैं अव्यक्त हूँ, तथापि मूर्ख लोग मुझे व्यक्त (गीता ७. २४) अर्थात् मनुष्यदेहधारी मानते हैं (गीता ९. ११); परंतु यह बात सच नहीं है। मेरा अव्यक्त स्वरूपही सत्य है।” इसी तरह उपनिषदोंमेंभी यद्यपि उपासनाके लिये मन, वाचा, सूर्य, आकाश इत्यादि अनेक व्यक्त या अव्यक्त ब्रह्मप्रतीकोंका वर्णन किया गया है, तथापि अंतमें यह कहा है, कि जो वाचा, नेत्रों या कानोंको गोचर हो वह ब्रह्म नहीं; जैसे :– यन्मनसा न मनुते येनाऽऽहुर्मनो मतम् । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ “मनसे जिसका मनन नहीं किया जा सकता, किंतु मनही जिसकी मनन-शक्तिमें आ जाता है, उसे तू सत्य ब्रह्म समझ । जिसकी (प्रतीक समझकर) उपासना की जाती है, वह (सत्य) ब्रह्म नहीं है” (केन. १. ५-८)। 'नेति नेति' सूत्रकाभी यही अर्थ है । मन या आकाशको लीजिये अथवा व्यक्त उपासना मार्गके अनुसार शालग्राम, शिवलिंग इत्यादिको लीजिये, या श्रीराम, कृष्ण आदि अवतारी पुरुषोंकी अथवा साधु-पुरुषोंकी व्यक्त मूर्त्तिका चिंतन कीजिये, मंदिरोंमें शिलामय अथवा धातुमय देवकी मूर्तिको देखिये, अथवा बिना मूर्त्तिका मंदिर, या मसजिद लीजिये; – ये सब छोटे बच्चेकी ढकेलगाड़ीके समान मनको स्थिर करनेके लिये अर्थात् चित्तकी वृत्तिको परमेश्वरकी ओर झुकानेके साधन हैं। प्रत्येक मनुष्य अपनी अपनी इच्छा और अधिकारके अनुसार उपासनाके लिये किसी प्रतीकका स्वीकारकर लेता है। यह प्रतीक चाहे कितनाही प्यारा हो; परंतु इस बातको नहीं भूलना चाहिये, कि सत्य परमेश्वर इस “प्रतीकमें नहीं है” – “न प्रतीके न हि सः” (वे. सू. ४. १. ४) – उसके परे है। इसी हेतुसे भगवद्गीतामेंभी सिद्धान्त किया गया है, कि “जिन्हें मेरी माया मालूम नहीं होती, वे मूढ़ जन मुझे नहीं जानते” (गीता ७. १३-१५)। भक्ति-मार्गमें मनुष्यका उद्धार करनेकी जो शक्ति है, वह सजीव अथवा निर्जीव
भक्तिमार्ग ४२३ मूर्तिमें या पत्थरोंकी इमारतोंमें नहीं है; किंतु उस प्रतीकमें उपासक अपने सुभीतेके लिये जो उस प्रतीकसेभी श्रेष्ठ ईश्वरभावना रखता है, वही यथार्थमें तारक होती है। चाहे प्रतीक पत्थरका हो, मिट्टीका हो, धातुका हो या अन्य किसी पदार्थका हो; उसकी योग्यता 'प्रतीक'से अधिक कभी नहीं हो सकती। इस प्रतीकमें जैसा हमारा भाव होगा, ठीक उसीके अनुसार हमारी भक्तिका फल परमेश्वर — प्रतीक नहीं — हमें दिया करता है। फिर ऐसा बखेड़ा मचानेसे क्या लाभ, कि हमारा प्रतीक श्रेष्ठ है और तुम्हारा निकृष्ट ? यदि भाव शुद्ध न हो, तो केवल प्रतीककी उत्तमतासेही क्या लाभ होगा ? दिनभर लोगोंको धोखा देने और फँसानेका धंधा करके सुबह- शाम या किसी त्योहारके दिन देवालयमें देवदर्शनके लिये, अथवा किसी निराकार देवके मंदिरमें उपासनाके लिये, जानेसे परमेश्वरकी प्राप्ति होना असंभव है। कथा सुननेके बहाने देवालयमें जानेवाले कुछ मनुष्योंका वर्णन रामदासस्वामीने इस प्रकार किया है — “कोई कोई विषयी लोग कथा सुननेके बहानेसे आते हैं और स्त्रियोंकीही ओर घूरा करते हैं; चोर लोग पादत्राण ( जूते ) चुरा ले जाते हैं” (दास. १८. १०. २६)। यदि केवल देवालयमें या देवताकी मूर्तिहीमें तारक-शक्ति हो तो ऐसे लोगोंकोभी मुक्ति मिल जानी चाहिये। कितनेक लोगोंकी समझ है, कि परमेश्वरकी भक्ति केवल मोक्षहीके लिये की जाती है; परंतु जिन्हें कोई व्यावहारिक या स्वार्थकी वस्तु चाहिये, वे भिन्न भिन्न देवताओंकी आराधना करें और गीतामेंभी इस बातका उल्लेख किया गया है, कि ऐसी स्वार्थ-बुद्धिसे वे लोग भिन्न भिन्न देवताओंकी पूजा किया करते हैं ( गीता ७. २०)। परंतु इसके आगे गीताहीका कथन है, कि यह समझ तात्त्विक दृष्टिसे सच नहीं मानी जा सकती, कि इन देवताओंकी आराधना करनेसे वे स्वयं कुछ फल देते हैं ( गीता ७. २१)। अध्यात्मशास्त्रका यह चिर- स्थायी सिद्धान्त है ( वे. सू. ३. २. ३८-४१); और यही सिद्धान्त गीताकोभी मान्य है ( गीता ७. २२), कि मनमें किसीभी वासना या कामनाको रखकर किसीभी देवताकी आराधना की जावे; उसका फल सर्वव्यापी परमेश्वरही दिया करता है, न कि देवता। यद्यपि फलदाता परमेश्वर इस प्रकार एकही हो, तथापि वह प्रत्येकके भले-बुरे भावोंके अनुसार भिन्न भिन्न फल दिया करता है ( वे. सू. २. १. ३४-३७)। इसलिये यह दीख पड़ता है, कि भिन्न भिन्न देवता- ओंकी या प्रतीकोंकी उपासनाके फलभी भिन्न भिन्न होते हैं। इसी अभिप्रायको मनमें रखकर भगवान्ने अन्यत्रभी कहा है :— श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः। “मनुष्य श्रद्धामय है। प्रतीक कुछभी हो; परंतु जिसकी जैसी श्रद्धा होती है, वैसाही वह हो जाता है” ( गीता १७. ३, मैत्र्यु. ४. ६)। अथवा — यान्ति देवव्रता देवान् पितॄन् यान्ति पितृव्रताः । भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ॥
' देवताओंकी भक्ति करनेवाले देवलोकमें, पितरोंकी भक्ति करनेवाले पितृलोकमें, भूतोंकी भक्ति करनेवाले भूतोंमें जाते हैं; और मेरी भक्ति करनेवाले मेरे पास आते हैं ' ( गीता ९. २५ ) । या - ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् । " जो जिस प्रकार मुझे भजते हैं, उसी प्रकार मैं उन्हें भजता हूँ" (गीता ४. ११) । सब लोग जानते हैं, कि शालग्राम सिर्फ एक पत्थर है। उसमें यदि विष्णुका भाव रखा जाय, तो विष्णुलोक मिलेगा; और यदि उसी प्रतीकमें यक्ष, राक्षस आदि भूतोंकी भावना रखके उसकी पूजा की जाय, तो यक्ष, राक्षस आदि भूतोंकेही लोक प्राप्त होंगे। यह सिद्धान्त हमारे सब शास्त्रकारोंको मान्य है, कि फल हमारे भावमें है; प्रतीकमें नहीं और लौकिक व्यवहारमेंभी किसी मूर्तिकी पूजा करनेके पहले उसकी प्राणप्रतिष्ठाभी करनेकी जो रीति है, उसकाभी रहस्य यही है। जिस देवताकी भावनासे उस मूर्तिकी पूजा करनी हो उस देवताकी प्राणप्रतिष्ठा उस मूर्तिमें करते हैं। मूर्तिमें परमेश्वरकी भावना न रख कोई यह समझकर उसकी पूजा या आराधना नहीं करते कि वह मूर्ति केवल किसी विशिष्ट आकारकी; मिट्टी, पत्थर या धातु है, और यदि कोई ऐसा करेभी, तो गीताके उक्त सिद्धान्तके अनुसार उसको मिट्टी, पत्थर या धातुहीकी दशा निस्सन्देह प्राप्त होगी। जब प्रतीकमें और स्थापित या आरोपित प्रतीकमें हमारे आंतरिक भावमें इस प्रकार भेदकर लिया जाता है, तब केवल प्रतीकके विषयमें झगड़ा करते रहनेका कोई कारण नहीं रह जाता। क्योंकि, अब तो यह भावही नहीं रहता, कि प्रतीकही देवता है। सब कर्मोंके फलदाता और सर्वसाक्षी परमेश्वरकी दृष्टि अपने भक्तजनोंके भावकी ओरही रहा करती है। इसी- लिये साधु तुकाराम कहते हैं, कि " देव भावकाही भूखा है !" - प्रतीकका नहीं। भक्ति-मार्गका यह तत्त्व जिसे भली भांति मालूम हो गया है उसके मनमें यह दुराग्रह नहीं रहने पाता, कि " मैं जिस ईश्वरस्वरूप या प्रतीककी उपासना करता हूँ, वही सच्चा है; और अन्य सब मिथ्या हैं; " किंतु उसके अंतःकरणमें ऐसी उदार-बुद्धि जागृत हो जाती है, कि " किसीका प्रतीक कुछभी हो; परंतु जो लोग उसके द्वारा परमेश्वरका भजन-पूजन किया करते हैं, वे सब एकही परमेश्वरसे जा मिलते हैं।" और तब उसे भगवान्के इस कथनकी प्रतीति होने लगती है, कि - येऽप्यन्यदेवताभक्ताः यजन्ते श्रद्धयान्विताः । तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥ " चाहे विधि अर्थात् बाह्योपचार या साधन शास्त्रके अनुसार न हो; तथापि अन्य देवताओंका श्रद्धापूर्वक (याने उनमें शुद्ध परमेश्वरका भाव रखकर) यजन करने- वाले लोग ( पर्यायसे) मेराही यजन करते हैं ' ( गीता ९. २३ ) । भागवतमेंभी इसी अर्थका वर्णन कुछ शब्दभेदके साथ किया गया है (भाग. १०. पू. ४०. ८-१०); शिवगीतामें तो उपर्युक्त श्लोकही ज्यों-का-त्यों पाया जाता है (शिव. १२. ४);
भक्तिमार्ग ४२५ और "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" (ऋ. १. १६४. ४६) इस वेदवचनका तात्पर्य्य भी वही है। इससे सिद्ध होता है, कि यह तत्त्व वैदिक धर्ममें बहुत प्राचीन समयसे चला आ रहा है और यह इसी तत्त्वका फल है; कि आधुनिक कालमें श्रीशिवाजी- महाराजके समान वैदिकधर्मीय वीरपुरुषके स्वभावमें, उनके परम उत्कर्षके समयमेंभी, परधर्म-असहिष्णुता-रूपी दोष दीख नहीं पड़ता था। यह मनुष्योंकी अत्यन्त शोचनीय मूर्खताका लक्षण है, कि वे इस सत्य तत्त्वको तो नहीं पहचानते, कि ईश्वर सर्वव्यापी, सर्वसाक्षी, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् और सबकेभी परे अर्थात् अचिंत्य है; किन्तु वे ऐसे नाम-रूपात्मक व्यर्थ अभिमानके अधीन हो जाते हैं, कि ईश्वरने अमुक समय या अमुक देशमें, अमुक माताके गर्भसे, अमुक वर्णका, नामका या आकृतिका जो व्यक्त स्वरूप धारण किया, वही केवल सत्य है; और इस अभिमानमें फँसकर एक-दूसरेकी जान तक लेनेको उतारू हो जाते हैं। गीता-प्रतिपादित भक्ति-मार्गको 'राजविद्या' कहा है सही; परंतु यदि इस बातकी खोज की जाय, कि जिस प्रकार स्वयं भगवान् श्रीकृष्णहीने "मेरा दृश्य स्वरूपभी केवल मायाही है: मेरे यथार्थ स्वरूपको जाननेके लिये इस मायासेभी परे जाओ;" कहकर यथार्थ उपदेश किया है, उस प्रकारका उपदेश और किसने किया है ? एवं "अविभक्तं विभक्तेषु" इस सात्त्विक ज्ञान-दृष्टिसे सब धर्मोंकी एकताको पहचानकर, भक्ति-मार्गके थोथे झगड़ोंकी जड़हीको काट डालनेवाले धर्मगुरु पहले पहल कहाँ अवतीर्ण हुए ? अथवा उनके मतानुयायी अधिक कहाँ हैं ? तो कहना पड़ेगा, कि इस विषयमें हमारी पवित्र भारतभूमिकोही अग्रस्थान दिया जाना चाहिये; हमारे देशवासियोंको राजविद्याका और राजगुह्यका यह साक्षात् पारस अनायासही प्राप्त हो गया है; परंतु जब हम देखते हैं, कि हममेंसेही कुछ लोग अपनी आँखोंपर अज्ञानरूपः चश्मा लगाकर उस पारसको चकमक पत्थर कहनेके लिये तैयार हैं, तब इसे अपने दुर्भाग्यके सिवा और क्या कहें ? प्रतीक कुछभी हो; भक्ति-मार्गका फल प्रतीकमें नहीं है, किन्तु उस प्रतीकमें, जो हमारा आंतरिक भाव होता है, उस भावमें है, इसलिये यह सच है, कि प्रतीकके बारेमें झगड़ा मचानेमें कुछ लाभ नहीं। परंतु अब यह शंका है, कि वेदान्तकी दृष्टिसे जिस शुद्ध परमेश्वर-स्वरूपकी भावना प्रतीकमें आरोपित करनी पड़ती है, उस शुद्ध परमेश्वर-स्वरूपकी कल्पना बहुतेरे लोग अपने प्रकृति-स्वभावके अनुसार या अज्ञानके कारण प्रायः एकाएक कर नहीं सकते, ऐसी अवस्था में इन लोगोंके लिये प्रतीकमें शुद्ध भाव रखकर परमेश्वरकी प्राप्ति कर लेनेका कौनसा उपाय है ? यह कह देनेसे काम नहीं चल सकता, कि "भक्ति-मार्गमें ज्ञानका काम श्रद्धासे हो जाता है, इसलिये विश्वाससे या श्रद्धासे परमेश्वरके शुद्ध-स्वरूपको जान कर प्रतीकमेंभी वही भाव रखो-बस; तुम्हारा भाव सफल हो जायगा।" कारण यह है, कि कोईभी भाव रखना मनका अर्थात् श्रद्धाका धर्म है सही, परंतु उसे बुद्धिकी थोड़ी-बहुत सहायता मिलेबिना कभी काम नहीं चल सकता। क्योंकि, अन्य सब मनोधर्मोंकी तरह
४२६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र केवल श्रद्धा या प्रेम और एक प्रकारसे अंधे हैं और यह बात केवल श्रद्धा या प्रेमको कभी मालूम हो नही सकती, कि किसपर श्रद्धा रखनी चाहिये और किसपर नहीं; अथवा किससे प्रेम करना चाहिये और किससे नहीं। यह काम प्रत्येक मनुष्यको अपनी बुद्धिसेही करना पड़ता है; क्योंकि निर्णय करनेके लिये बुद्धिके सिवा कोई दूसरी इंद्रिय नहीं है। सारांश यह है, कि चाहे किसी मनुष्यकी बुद्धि अत्यंत तीव्र न भी हो; तथापि उसमें यह जाननेकी सामर्थ्य तो अवश्यही होना चाहिये, कि श्रद्धा, (प्रेम या विश्वास) कहाँ रखा जावे; नहीं तो अंध श्रद्धा और उसीके साथ अंध प्रेमभी धोखा खा जायगा; और दोनों गड्ढेमें जा गिरेंगे। विपरीत पक्षमें यहभी कहा जा सकता है, कि श्रद्धारहित केवल बुद्धिही यदि कुछ काम करने लगे, तो कोरे युक्तिवाद और तर्कज्ञानमें फँसकर, न जाने वह कहाँ कहाँ भटकती रहेगी; वह जितनीही अधिक तीव्र होगी, उतनीही अधिक भटकेगी। इसके अतिरिक्त इस प्रकरणके आरंभहीमें कहा जा चुका है, कि श्रद्धा आदि मनोधर्मोंकी सहायताके बिना केवल बुद्धिगम्य ज्ञानमें कर्तृत्व-शक्तिभी उत्पन्न नहीं होती। अतएव श्रद्धा और ज्ञान अथवा मन और बुद्धिका हमेशा साथ रहना आवश्यक है। परंतु मन और बुद्धि, दोनों त्रिगुणात्मक प्रकृतिहीके विकार हैं, इसलिये उनमेंसे प्रत्येकके जन्मतः तीन भेद - सात्त्विक, राजस और तामस हो सकते हैं; और यद्यपि उनका साथ हमेशा बना रहे, तोभी भिन्न भिन्न मनुष्योंमें उनकी जितनी शुद्धता या अशुद्धता होगी, उसी हिसाबसे मनुष्यके स्वभाव, समझ और व्यवहारभी भिन्न भिन्न हो जावेंगे। यदि बुद्धि केवल जन्मतः अशुद्ध, राजस या तामस, हो तो उसका किया हुआ भले-बुरेका निर्णय गलत होगा; जिसका परिणाम यह होगा, कि अंध श्रद्धाके सात्त्विक अर्थात् शुद्ध होनेपरभी वह धोखा खा जायगी। अच्छा; यदि श्रद्धाही जन्मतः अशुद्ध हो, तो बुद्धिके सात्त्विक होनेसेभी कुछ लाभ नहीं, क्योंकि ऐसी अवस्थामें बुद्धिकी आज्ञाको माननेके लिये श्रद्धा तैयारही नहीं रहती। परंतु साधारण अनुभव यह है कि बुद्धि और मन दोनों अलग अलग अशुद्ध नहीं रहते जिसकी बुद्धि जन्मतः अशुद्ध होती है; उसका मन अर्थात् श्रद्धाभी प्रायः न्यूनाधिक अशुद्ध अवस्थामेही रहती है; और फिर यह अशुद्ध बुद्धि स्वभावतः अशुद्ध अवस्थामें रहनेवाली श्रद्धाको अधिकाधिक भ्रममें डाल दिया करती है। ऐसी अवस्थामें रहनेवाले किसी मनुष्यको परमेश्वरके शुद्ध स्वरूपका चाहे जैसा उपदेश किया जाय; परंतु वह उसके मनमें जमताही नहीं; अथवा यहभी देखा गया है, कि कभी कभी - विशेषतः श्रद्धा और बुद्धि दोनोंभी जन्मतः अपक्व और कमजोर हों, तब - वह मनुष्य उसी उपदेशका विपरीत अर्थ किया करता है। इसका एक उदाहरण लीजिये - यह देखा गया है, कि जब ईसाई धर्मके उपदेशक आफ्रिका-निवासी नीग्रो जातिके जंगली लोगोंको अपने धर्मका उपदेश करने लगते हैं, तब उन्हें आकाशमें रहनेवाले पिताकी अथवा ईसा मसीहकी कुछभी यथार्थ कल्पना हो नहीं सकती। उन्हें जो कुछ बतलाया जाता है, उसे वे अपनी अपक्व
भक्तिमार्ग ४२७ बुद्धिके अनुसार अयथार्थ भावसे ग्रहण किया करते हैं। इसीलिये एक अंग्रेज ग्रंथकारने लिखा है, कि उन लोगोंमें सुधरे हुए धर्मको समझनेकी पात्रता लानेके लिये सबसे पहले उन्हें अर्वाचीन मनुष्योंकी योग्यताको पहुँचा देना चाहिये ।* भवभूतिके इस दृष्टान्तमेंभी वही अर्थ है, कि एकही गुरुके पास पढ़े हुए शिष्योंमें भिन्नता दीख पड़ती है, और यद्यपि सूर्य एकही है, तथापि उसके प्रकाशसे काँचकी मणिसे आग निक- लती है, लेकिन मिट्टीके ढेडेपर कुछ परिणाम नहीं होता (उ. राम. २. ४)। प्रतीत होता है, कि प्रायः इसी कारणसे प्राचीन समयमें शूद्र आदि अज्ञ जन वेद-श्रवणके लिये अनधिकारी माने जाते होंगे।† गीताके अठारहवें अध्यायमेंभी इस विषयकी चर्चा की गई है और आरंभमें कहा है, कि जिस प्रकार बुद्धिके स्वभावतः सात्त्विक, राजस और तामस भेद हुआ करते हैं (गीता १८. ३०-३२), उसी प्रकार श्रद्धाकेभी स्वभावतः सात्त्विकादि तीन भेद होते हैं (गीता १७. २)। भगवान् कहते हैं, कि आगे प्रत्येक व्यक्तिके देहस्वभावके अनुसार उसकी श्रद्धाभी स्वभावतः भिन्न हुआ करती है (गीता १७. ३) इसलिये जिन लोगोंकी श्रद्धा सात्त्विक है, वे देवताओंमें; जिनकी श्रद्धा राजस है, वे यक्ष-राक्षस आदिमें और जिनकी श्रद्धा तामस है, वे भूत-पिशाच आदिमें विश्वास करते हैं (गीता १७. ४-६)। यदि मनुष्यकी श्रद्धाका अच्छापन या बुरापन इस प्रकार नैसर्गिक स्वभावपर अवलंबित है, तो अब यह प्रश्न होता है, कि पहले यथाशक्ति भक्तिभावसे इस श्रद्धामें अधिकाधिक सुधार हो सकता है, या नही और वह किसी समय पूर्ण शुद्ध अर्थात् सात्त्विक अवस्थाको पहुँच सकती है, या नहीं ? भक्ति-मार्गके उक्त प्रश्नका स्वरूप कर्मविपाकक्रियाके ठीक इस प्रश्नके समान है, कि ज्ञानकी प्राप्ति करलेनेके लिये मनुष्य स्वतंत्र है, या नहीं ? और कहनेकी आवश्यकता नहीं, कि इन दोनों प्रश्नोंका उत्तर एकही है। भगवानने अर्जुनको पहले यही उपदेश किया, कि 'मय्येव मन आधत्स्व' (गीता १२. ८) - मेरे शुद्ध स्वरूपमें तू अपने मनको स्थिर कर; और इसके बाद परमेश्वरस्वरूपको मनमें स्थिर करनेके लिये भिन्न भिन्न उपायोंका इस प्रकार वर्णन किया है- "यदि तू मेरे स्वरूपमें अपने चित्तको स्थिर न कर सकता हो, तो तू अभ्यास अर्थात् बार-बार प्रयत्न कर। यदि तुझसे अभ्यासभी न हो सके, तो मेरे लिये चित्त-शुद्धिकारक कर्म
- " And the only way, I suppose, in which beings of so low an order of development (e. g. an Australian savage or a Bushman ) could be raised to a civilized level of feeling and thought would be by cultivation continued through several generations; they would have to undergo a gradual process of humanization before they could attain to the capacity of civilization. " Dr. Maudsley's Body and Mind, Ed. 1873. p. 57 † See Max Muller's Three Lectures on the Vedanta Philo- sophy, pp. 72, 73.
४२८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कर। यदि यहभी न हो सके, तो कर्मफलका त्याग कर; और उसमे मेरी प्राप्ति कर ले" (गीता १२. ९-११; भाग. ११. ११. २१-२५)। यदि मूल देह-स्वभाव अथवा प्रकृति तामस हो, तो परमेश्वरके शुद्ध स्वरूपमें चित्तको स्थिर करनेका प्रयत्न एकदम या एक-ही जन्ममें नहीं होगा, परंतु कर्मयोगके समान भक्ति-मार्गमेंभी कोई बात निष्फल नहीं होती। स्वयं भगवान् सब लोगोंको इस प्रकार भरोसा देते हैं:- बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान् मां प्रपद्यते । वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥ जब कोई मनुष्य एक बार भक्ति-मार्गमें चलने लगता है, तब इस जन्ममें नहीं तो अगले जन्ममें, अगले जन्ममें नहीं तो उसके आगेके जन्ममें, कभी-न-कभी, उसको परमे- श्वरके स्वरूपका ऐसा यथार्थ ज्ञान प्राप्त हो जाता है, कि "यह सब वासुदेवात्मकही है," और इस ज्ञानसे अंतमे उसे मुक्तिभी मिल जाती है (गीता ७. १९)। छठे अध्यायमेंभी इसी प्रकार कर्मयोगका अभ्यास करनेवालेके विषयमें कहा गया है, कि "अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्" (गीता ६. ४५) और भक्ति-मार्गके लिये यही नियम उपयुक्त होता है। भक्तको चाहिये, कि वह जिस देवका भाव प्रतीकमें रखना चाहे, उसके स्वरूपको अपने देह-स्वभावके अनुसार पहलेहीसे यथा- शक्ति शुद्ध मानकर आरंभ करे। कुछ समयतक इसी भावनाका फल परमेश्वर (प्रतीक नहीं) दिया करता है (गीता ७. २२)। परंतु इसके आगे चित्त-शुद्धिके लिये किसी अन्य साधनकी आवश्यकता नहीं रहती। यदि परमेश्वरकी यही भक्ति यथा- मति हमेशा जारी रहे, तो भक्तके अंतःकरणकी भावना आप-ही-आप उन्नत हो जाती है और फिर परमेश्वरसंबंधी ज्ञानकी वृद्धिभी होने लगती है एवं अंतमें मनकी ऐसी अवस्था हो जाती है कि "वासुदेवः सर्वम्"- उपास्य और उपासकका भेदभाव शेष नहीं रह जाता; और अंतमें शुद्ध ब्रह्मानंदमें आत्माका लय हो जाता है। मनुष्यको चाहिये, कि वह अपने प्रयत्नकी मात्राको कभी कम न करे। सारांश यह है, कि जिस प्रकार किसी मनुष्यके मनमें कर्मयोगकी केवल जिज्ञासा उत्पन्न होनेही वह धीरे धीरे पूर्ण सिद्धिकी ओर आप-ही-आप आकर्षित हो जाता है (गीता ६. ४४), उसी प्रकार गीता-धर्मका यह सिद्धान्त है, कि भक्ति-मार्गमें जब कोई भक्त एक बार अपने तईं ईश्वरको सौंप देता है, तो स्वयं भगवान्ही उसकी निष्ठाको बढ़ाते चले जाते हैं; और अंतमें उसे अपने यथार्थ स्वरूपका पूर्ण ज्ञानभी करा देते हैं (गीता ७. २१; १०. १०)। इसी ज्ञानसे - न कि केवल कोरी और अंध श्रद्धासे - भगवद्भक्तको अंतमें पूर्ण सिद्धि मिल जाती है। भक्तिमार्गमें इस प्रकार ऊपर चढ़ते चढ़ते अंतमें जो स्थिति प्राप्त होती है, वह और ज्ञान-मार्गसे प्राप्त होनेवाली अंतिम स्थिति, दोनों एकही समान हैं, इसलिये गीताको पढ़नेवालोंके ध्यानमें यह बात सहजही आ जायगी, कि बारहवें अध्यायमें भक्तिमान् पुरुषकी अंतिम स्थितिका जो वर्णन किया गया है, वह दूसरे