भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 470

भक्तिमार्ग ४२५ और "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" (ऋ. १. १६४. ४६) इस वेदवचनका तात्पर्य्य भी वही है। इससे सिद्ध होता है, कि यह तत्त्व वैदिक धर्ममें बहुत प्राचीन समयसे चला आ रहा है और यह इसी तत्त्वका फल है; कि आधुनिक कालमें श्रीशिवाजी- महाराजके समान वैदिकधर्मीय वीरपुरुषके स्वभावमें, उनके परम उत्कर्षके समयमेंभी, परधर्म-असहिष्णुता-रूपी दोष दीख नहीं पड़ता था। यह मनुष्योंकी अत्यन्त शोचनीय मूर्खताका लक्षण है, कि वे इस सत्य तत्त्वको तो नहीं पहचानते, कि ईश्वर सर्वव्यापी, सर्वसाक्षी, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् और सबकेभी परे अर्थात् अचिंत्य है; किन्तु वे ऐसे नाम-रूपात्मक व्यर्थ अभिमानके अधीन हो जाते हैं, कि ईश्वरने अमुक समय या अमुक देशमें, अमुक माताके गर्भसे, अमुक वर्णका, नामका या आकृतिका जो व्यक्त स्वरूप धारण किया, वही केवल सत्य है; और इस अभिमानमें फँसकर एक-दूसरेकी जान तक लेनेको उतारू हो जाते हैं। गीता-प्रतिपादित भक्ति-मार्गको 'राजविद्या' कहा है सही; परंतु यदि इस बातकी खोज की जाय, कि जिस प्रकार स्वयं भगवान् श्रीकृष्णहीने "मेरा दृश्य स्वरूपभी केवल मायाही है: मेरे यथार्थ स्वरूपको जाननेके लिये इस मायासेभी परे जाओ;" कहकर यथार्थ उपदेश किया है, उस प्रकारका उपदेश और किसने किया है ? एवं "अविभक्तं विभक्तेषु" इस सात्त्विक ज्ञान-दृष्टिसे सब धर्मोंकी एकताको पहचानकर, भक्ति-मार्गके थोथे झगड़ोंकी जड़हीको काट डालनेवाले धर्मगुरु पहले पहल कहाँ अवतीर्ण हुए ? अथवा उनके मतानुयायी अधिक कहाँ हैं ? तो कहना पड़ेगा, कि इस विषयमें हमारी पवित्र भारतभूमिकोही अग्रस्थान दिया जाना चाहिये; हमारे देशवासियोंको राजविद्याका और राजगुह्यका यह साक्षात् पारस अनायासही प्राप्त हो गया है; परंतु जब हम देखते हैं, कि हममेंसेही कुछ लोग अपनी आँखोंपर अज्ञानरूपः चश्मा लगाकर उस पारसको चकमक पत्थर कहनेके लिये तैयार हैं, तब इसे अपने दुर्भाग्यके सिवा और क्या कहें ? प्रतीक कुछभी हो; भक्ति-मार्गका फल प्रतीकमें नहीं है, किन्तु उस प्रतीकमें, जो हमारा आंतरिक भाव होता है, उस भावमें है, इसलिये यह सच है, कि प्रतीकके बारेमें झगड़ा मचानेमें कुछ लाभ नहीं। परंतु अब यह शंका है, कि वेदान्तकी दृष्टिसे जिस शुद्ध परमेश्वर-स्वरूपकी भावना प्रतीकमें आरोपित करनी पड़ती है, उस शुद्ध परमेश्वर-स्वरूपकी कल्पना बहुतेरे लोग अपने प्रकृति-स्वभावके अनुसार या अज्ञानके कारण प्रायः एकाएक कर नहीं सकते, ऐसी अवस्था में इन लोगोंके लिये प्रतीकमें शुद्ध भाव रखकर परमेश्वरकी प्राप्ति कर लेनेका कौनसा उपाय है ? यह कह देनेसे काम नहीं चल सकता, कि "भक्ति-मार्गमें ज्ञानका काम श्रद्धासे हो जाता है, इसलिये विश्वाससे या श्रद्धासे परमेश्वरके शुद्ध-स्वरूपको जान कर प्रतीकमेंभी वही भाव रखो-बस; तुम्हारा भाव सफल हो जायगा।" कारण यह है, कि कोईभी भाव रखना मनका अर्थात् श्रद्धाका धर्म है सही, परंतु उसे बुद्धिकी थोड़ी-बहुत सहायता मिलेबिना कभी काम नहीं चल सकता। क्योंकि, अन्य सब मनोधर्मोंकी तरह