श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र केवल श्रद्धा या प्रेम और एक प्रकारसे अंधे हैं और यह बात केवल श्रद्धा या प्रेमको कभी मालूम हो नही सकती, कि किसपर श्रद्धा रखनी चाहिये और किसपर नहीं; अथवा किससे प्रेम करना चाहिये और किससे नहीं। यह काम प्रत्येक मनुष्यको अपनी बुद्धिसेही करना पड़ता है; क्योंकि निर्णय करनेके लिये बुद्धिके सिवा कोई दूसरी इंद्रिय नहीं है। सारांश यह है, कि चाहे किसी मनुष्यकी बुद्धि अत्यंत तीव्र न भी हो; तथापि उसमें यह जाननेकी सामर्थ्य तो अवश्यही होना चाहिये, कि श्रद्धा, (प्रेम या विश्वास) कहाँ रखा जावे; नहीं तो अंध श्रद्धा और उसीके साथ अंध प्रेमभी धोखा खा जायगा; और दोनों गड्ढेमें जा गिरेंगे। विपरीत पक्षमें यहभी कहा जा सकता है, कि श्रद्धारहित केवल बुद्धिही यदि कुछ काम करने लगे, तो कोरे युक्तिवाद और तर्कज्ञानमें फँसकर, न जाने वह कहाँ कहाँ भटकती रहेगी; वह जितनीही अधिक तीव्र होगी, उतनीही अधिक भटकेगी। इसके अतिरिक्त इस प्रकरणके आरंभहीमें कहा जा चुका है, कि श्रद्धा आदि मनोधर्मोंकी सहायताके बिना केवल बुद्धिगम्य ज्ञानमें कर्तृत्व-शक्तिभी उत्पन्न नहीं होती। अतएव श्रद्धा और ज्ञान अथवा मन और बुद्धिका हमेशा साथ रहना आवश्यक है। परंतु मन और बुद्धि, दोनों त्रिगुणात्मक प्रकृतिहीके विकार हैं, इसलिये उनमेंसे प्रत्येकके जन्मतः तीन भेद - सात्त्विक, राजस और तामस हो सकते हैं; और यद्यपि उनका साथ हमेशा बना रहे, तोभी भिन्न भिन्न मनुष्योंमें उनकी जितनी शुद्धता या अशुद्धता होगी, उसी हिसाबसे मनुष्यके स्वभाव, समझ और व्यवहारभी भिन्न भिन्न हो जावेंगे। यदि बुद्धि केवल जन्मतः अशुद्ध, राजस या तामस, हो तो उसका किया हुआ भले-बुरेका निर्णय गलत होगा; जिसका परिणाम यह होगा, कि अंध श्रद्धाके सात्त्विक अर्थात् शुद्ध होनेपरभी वह धोखा खा जायगी। अच्छा; यदि श्रद्धाही जन्मतः अशुद्ध हो, तो बुद्धिके सात्त्विक होनेसेभी कुछ लाभ नहीं, क्योंकि ऐसी अवस्थामें बुद्धिकी आज्ञाको माननेके लिये श्रद्धा तैयारही नहीं रहती। परंतु साधारण अनुभव यह है कि बुद्धि और मन दोनों अलग अलग अशुद्ध नहीं रहते जिसकी बुद्धि जन्मतः अशुद्ध होती है; उसका मन अर्थात् श्रद्धाभी प्रायः न्यूनाधिक अशुद्ध अवस्थामेही रहती है; और फिर यह अशुद्ध बुद्धि स्वभावतः अशुद्ध अवस्थामें रहनेवाली श्रद्धाको अधिकाधिक भ्रममें डाल दिया करती है। ऐसी अवस्थामें रहनेवाले किसी मनुष्यको परमेश्वरके शुद्ध स्वरूपका चाहे जैसा उपदेश किया जाय; परंतु वह उसके मनमें जमताही नहीं; अथवा यहभी देखा गया है, कि कभी कभी - विशेषतः श्रद्धा और बुद्धि दोनोंभी जन्मतः अपक्व और कमजोर हों, तब - वह मनुष्य उसी उपदेशका विपरीत अर्थ किया करता है। इसका एक उदाहरण लीजिये - यह देखा गया है, कि जब ईसाई धर्मके उपदेशक आफ्रिका-निवासी नीग्रो जातिके जंगली लोगोंको अपने धर्मका उपदेश करने लगते हैं, तब उन्हें आकाशमें रहनेवाले पिताकी अथवा ईसा मसीहकी कुछभी यथार्थ कल्पना हो नहीं सकती। उन्हें जो कुछ बतलाया जाता है, उसे वे अपनी अपक्व