भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 472, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 472

भक्तिमार्ग ४२७ बुद्धिके अनुसार अयथार्थ भावसे ग्रहण किया करते हैं। इसीलिये एक अंग्रेज ग्रंथकारने लिखा है, कि उन लोगोंमें सुधरे हुए धर्मको समझनेकी पात्रता लानेके लिये सबसे पहले उन्हें अर्वाचीन मनुष्योंकी योग्यताको पहुँचा देना चाहिये ।* भवभूतिके इस दृष्टान्तमेंभी वही अर्थ है, कि एकही गुरुके पास पढ़े हुए शिष्योंमें भिन्नता दीख पड़ती है, और यद्यपि सूर्य एकही है, तथापि उसके प्रकाशसे काँचकी मणिसे आग निक- लती है, लेकिन मिट्टीके ढेडेपर कुछ परिणाम नहीं होता (उ. राम. २. ४)। प्रतीत होता है, कि प्रायः इसी कारणसे प्राचीन समयमें शूद्र आदि अज्ञ जन वेद-श्रवणके लिये अनधिकारी माने जाते होंगे।† गीताके अठारहवें अध्यायमेंभी इस विषयकी चर्चा की गई है और आरंभमें कहा है, कि जिस प्रकार बुद्धिके स्वभावतः सात्त्विक, राजस और तामस भेद हुआ करते हैं (गीता १८. ३०-३२), उसी प्रकार श्रद्धाकेभी स्वभावतः सात्त्विकादि तीन भेद होते हैं (गीता १७. २)। भगवान् कहते हैं, कि आगे प्रत्येक व्यक्तिके देहस्वभावके अनुसार उसकी श्रद्धाभी स्वभावतः भिन्न हुआ करती है (गीता १७. ३) इसलिये जिन लोगोंकी श्रद्धा सात्त्विक है, वे देवताओंमें; जिनकी श्रद्धा राजस है, वे यक्ष-राक्षस आदिमें और जिनकी श्रद्धा तामस है, वे भूत-पिशाच आदिमें विश्वास करते हैं (गीता १७. ४-६)। यदि मनुष्यकी श्रद्धाका अच्छापन या बुरापन इस प्रकार नैसर्गिक स्वभावपर अवलंबित है, तो अब यह प्रश्न होता है, कि पहले यथाशक्ति भक्तिभावसे इस श्रद्धामें अधिकाधिक सुधार हो सकता है, या नही और वह किसी समय पूर्ण शुद्ध अर्थात् सात्त्विक अवस्थाको पहुँच सकती है, या नहीं ? भक्ति-मार्गके उक्त प्रश्नका स्वरूप कर्मविपाकक्रियाके ठीक इस प्रश्नके समान है, कि ज्ञानकी प्राप्ति करलेनेके लिये मनुष्य स्वतंत्र है, या नहीं ? और कहनेकी आवश्यकता नहीं, कि इन दोनों प्रश्नोंका उत्तर एकही है। भगवानने अर्जुनको पहले यही उपदेश किया, कि 'मय्येव मन आधत्स्व' (गीता १२. ८) - मेरे शुद्ध स्वरूपमें तू अपने मनको स्थिर कर; और इसके बाद परमेश्वरस्वरूपको मनमें स्थिर करनेके लिये भिन्न भिन्न उपायोंका इस प्रकार वर्णन किया है- "यदि तू मेरे स्वरूपमें अपने चित्तको स्थिर न कर सकता हो, तो तू अभ्यास अर्थात् बार-बार प्रयत्न कर। यदि तुझसे अभ्यासभी न हो सके, तो मेरे लिये चित्त-शुद्धिकारक कर्म

  • " And the only way, I suppose, in which beings of so low an order of development (e. g. an Australian savage or a Bushman ) could be raised to a civilized level of feeling and thought would be by cultivation continued through several generations; they would have to undergo a gradual process of humanization before they could attain to the capacity of civilization. " Dr. Maudsley's Body and Mind, Ed. 1873. p. 57 † See Max Muller's Three Lectures on the Vedanta Philo- sophy, pp. 72, 73.