भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 473

४२८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कर। यदि यहभी न हो सके, तो कर्मफलका त्याग कर; और उसमे मेरी प्राप्ति कर ले" (गीता १२. ९-११; भाग. ११. ११. २१-२५)। यदि मूल देह-स्वभाव अथवा प्रकृति तामस हो, तो परमेश्वरके शुद्ध स्वरूपमें चित्तको स्थिर करनेका प्रयत्न एकदम या एक-ही जन्ममें नहीं होगा, परंतु कर्मयोगके समान भक्ति-मार्गमेंभी कोई बात निष्फल नहीं होती। स्वयं भगवान् सब लोगोंको इस प्रकार भरोसा देते हैं:- बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान् मां प्रपद्यते । वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥ जब कोई मनुष्य एक बार भक्ति-मार्गमें चलने लगता है, तब इस जन्ममें नहीं तो अगले जन्ममें, अगले जन्ममें नहीं तो उसके आगेके जन्ममें, कभी-न-कभी, उसको परमे- श्वरके स्वरूपका ऐसा यथार्थ ज्ञान प्राप्त हो जाता है, कि "यह सब वासुदेवात्मकही है," और इस ज्ञानसे अंतमे उसे मुक्तिभी मिल जाती है (गीता ७. १९)। छठे अध्यायमेंभी इसी प्रकार कर्मयोगका अभ्यास करनेवालेके विषयमें कहा गया है, कि "अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्" (गीता ६. ४५) और भक्ति-मार्गके लिये यही नियम उपयुक्त होता है। भक्तको चाहिये, कि वह जिस देवका भाव प्रतीकमें रखना चाहे, उसके स्वरूपको अपने देह-स्वभावके अनुसार पहलेहीसे यथा- शक्ति शुद्ध मानकर आरंभ करे। कुछ समयतक इसी भावनाका फल परमेश्वर (प्रतीक नहीं) दिया करता है (गीता ७. २२)। परंतु इसके आगे चित्त-शुद्धिके लिये किसी अन्य साधनकी आवश्यकता नहीं रहती। यदि परमेश्वरकी यही भक्ति यथा- मति हमेशा जारी रहे, तो भक्तके अंतःकरणकी भावना आप-ही-आप उन्नत हो जाती है और फिर परमेश्वरसंबंधी ज्ञानकी वृद्धिभी होने लगती है एवं अंतमें मनकी ऐसी अवस्था हो जाती है कि "वासुदेवः सर्वम्"- उपास्य और उपासकका भेदभाव शेष नहीं रह जाता; और अंतमें शुद्ध ब्रह्मानंदमें आत्माका लय हो जाता है। मनुष्यको चाहिये, कि वह अपने प्रयत्नकी मात्राको कभी कम न करे। सारांश यह है, कि जिस प्रकार किसी मनुष्यके मनमें कर्मयोगकी केवल जिज्ञासा उत्पन्न होनेही वह धीरे धीरे पूर्ण सिद्धिकी ओर आप-ही-आप आकर्षित हो जाता है (गीता ६. ४४), उसी प्रकार गीता-धर्मका यह सिद्धान्त है, कि भक्ति-मार्गमें जब कोई भक्त एक बार अपने तईं ईश्वरको सौंप देता है, तो स्वयं भगवान्‌ही उसकी निष्ठाको बढ़ाते चले जाते हैं; और अंतमें उसे अपने यथार्थ स्वरूपका पूर्ण ज्ञानभी करा देते हैं (गीता ७. २१; १०. १०)। इसी ज्ञानसे - न कि केवल कोरी और अंध श्रद्धासे - भगवद्भक्तको अंतमें पूर्ण सिद्धि मिल जाती है। भक्तिमार्गमें इस प्रकार ऊपर चढ़ते चढ़ते अंतमें जो स्थिति प्राप्त होती है, वह और ज्ञान-मार्गसे प्राप्त होनेवाली अंतिम स्थिति, दोनों एकही समान हैं, इसलिये गीताको पढ़नेवालोंके ध्यानमें यह बात सहजही आ जायगी, कि बारहवें अध्यायमें भक्तिमान् पुरुषकी अंतिम स्थितिका जो वर्णन किया गया है, वह दूसरे