भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 474

अध्यायमे किये गये स्थितप्रज्ञके वर्णनहीके समान है। इससे यह बात प्रकट होती है, कि यद्यपि आरंभमे ज्ञान-मार्ग और भक्ति-मार्ग भिन्न हों, और यदि कोई अपने अधिकार-भेदके कारण ज्ञान-मार्गमे या भक्ति-मार्गमे चलने लगता है, तोभी अंतमें ये दोनों मार्ग एकत्र मिल जाते हैं, और जो गति ज्ञानीको प्राप्त होती है, वही गति भक्तकोभी मिला करती है। इन दो मार्गोंमें भेद सिर्फ़ इतनाही है, कि ज्ञान-मार्गमें आरंभहीमे बुद्धिके द्वारा परमेश्वर-स्वरूपके आकलन करना पड़ता है; भक्ति-मार्गमे यही तो ज्ञान श्रद्धाकी सहायतासे ग्रहणकर लिया जाता है। परंतु यह प्राथमिक भेद आगे नष्ट हो जाता है; और भगवान् स्वयं कहते हैं, कि :- श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः । ज्ञानं लब्ध्वा परां शांतिं अचिरेणाधिगच्छति ॥ “जब श्रद्धावान् मनुष्य इंद्रियनिग्रह-द्वारा ज्ञान-प्राप्तिका प्रयत्न करने लगता है; तब उसे ब्रह्मात्मैक्यरूप-ज्ञानका प्रत्यक्ष अनुभव होता है; और फिर उस ज्ञानसे उसे शीघ्रही पूर्ण शांति मिलती है” (गीता ४. ३९)। अथवा - भक्त्या मामभिजानाति यावान् यश्चास्मि तत्त्वतः । ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥* “मेरे (याने परमेश्वरके) स्वरूपका तात्त्विक ज्ञान भक्तिसे होता है; और जब यह ज्ञान हो जाता है, तब (पहले नहीं); भक्त मुझमें आ मिलता है” (गीता १८. ५५, ११. ५४) परमेश्वरका पूरा ज्ञान होनेके लिये इन दो मार्गोंके सिवा कोई तीसरा मार्ग नहीं है। इसलिये गीतामे यह बात स्पष्ट रीतिसे कह दी गई है, कि जिसे न तो स्वयं अपनी बुद्धि है और न श्रद्धाभी, उसका सर्वथा नाशही समझिये - “अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति” (गीता ४. ४०)। ऊपर कहा गया है, कि श्रद्धा और भक्तिसे अंतमें पूर्ण ब्रह्मात्मैक्य ज्ञान प्राप्त होता है। इसपर कुछ तार्किकोंका यह आक्षेप है, कि यदि भक्तिमार्गका प्रारंभ इस द्वैतभावसेही किया जाता है, कि उपास्य भिन्न है और उपासकभी भिन्न है, तो अंतमे ब्रह्मात्मैकरूप अद्वैत ज्ञान कैसे होगा? परंतु यह आक्षेप केवल भ्रांतिमूलक है। यदि ऐसे तार्किकोंके कथनका सिर्फ़ इतना अर्थ हो, कि ब्रह्मात्मैक्य-ज्ञानके होनेपर भक्तिका प्रवाह रुक जाता है, तो उसमें कुछ आपत्ति दीख नहीं पड़ती। क्योंकि अध्यात्मशास्त्रकाभी यही सिद्धान्त है, कि जब उपास्य, उपासक और उपासनारूपी

  • इस श्लोकके 'अभि' उपसर्गपर जोर देकर शांडिल्यसूत्रमे (सू १५) यह दिखलानेका प्रयत्न किया गया है, कि भक्ति ज्ञानका साधन नहीं है; किंतु वह स्वतंत्र साध्य या निष्ठा है। परंतु यह अर्थ अन्य सांप्रदायिक अर्थोंके समान आग्रहका है - सरल नहीं है।