श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४३० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र त्रिपुटीका लय हो जाता है; तब वह व्यापार बंद हो जाता है, जिसे व्यवहारमें भक्ति कहते हैं। परंतु यदि उक्त आक्षेपका यह अर्थ हो, कि द्वैतमूलक भक्ति-मार्गसे अंतमें अद्वैत-ज्ञान होही नहीं सकता; तो यह आक्षेप न केवल तर्कशास्त्रकी दृष्टिसे किंतु बड़े बड़े भगवद्भक्तोंके अनुभवके आधारसेभी मिथ्या सिद्ध हो सकता है। तर्कशास्त्रकी दृष्टिसे इस बातमें कुछ रुकावट नहीं दीख पड़ती, कि परमेश्वर- स्वरूपमें किसी भक्तका चित्त ज्यों ज्यों अधिकाधिक स्थिर होता जावें, त्यों त्यों उसके मनसे भेदभावभी छूटता चला जावे। ब्रह्म-सृष्टिमेंभी हम यही देखते हैं कि यद्यपि आरंभमें पारेकी बूँदे भिन्न भिन्न होती हैं; तथापि आपसमें मिल- कर उनके एकत्र होजानेमें कोई रुकावट नहीं आती। इसी प्रकार अन्य पदार्थोंमेंभी एकीकरणकी क्रियाका आरंभ प्राथमिक भिन्नताहीसे हुआ करता है; और भृंगी-कीटका दृष्टान्त तो सब लोगोंको विदितही है। परंतु इस विषयमें तर्कशास्त्रकी अपेक्षा साधुपुरुषोंके प्रत्यक्ष अनुभवकोही अधिक प्रामाणिक समझना चाहिये। अतः भगवद्भक्त-शिरोमणि तुकाराम महाराजका अनुभव हमारे लिये विशेष महत्त्वका है। सब लोग जानते हैं, कि, तुकाराम महाराजको कुछ उप- निषदादि ग्रंथोंके अध्ययनसे अध्यात्मज्ञान प्राप्त नहीं हुआ था; तथापि उनकी गाथामें लगभग साढ़ेतीनसो 'अभंग' अद्वैत-स्थितिके वर्णनमें कहे गये हैं, और इन सब अभंगोंमें "वासुदेवः सर्वम्” (गीता ७.१९) का भाव प्रतिपादित किया गया है; अथवा बृहदारण्यकोपनिषदमें जैसे याज्ञवल्क्यने 'सर्वमात्मैवाभूत्' कहा है, वैसेही अर्थका प्रतिपादन स्वानुभवसे किया गया है। उदाहरणके लिये उनके एक अभंगका (तु. गा. ३६२७) आशय देखिये – गुड़-सा मीठा है भगवान् बाहर-भीतर एक समान । किसका ध्यान करूँ सविवेक ? जलतरंगसे है हम एक ॥ इसके आरंभका उल्लेख हमने पहलेही अध्यात्म-प्रकरणमें किया है; और वहाँ यह दिखलाया है, कि उपनिषदोंमें वर्णित ब्रह्मात्मैक्य-ज्ञानसे उसके अर्थकी किस तरह पूरी समता है। जब कि स्वयं तुकाराम महाराज अपने अनुभवसे भक्तोंकी परमा- वस्थाका वर्णन इस प्रकार कर रहे हैं, तब यदि कोई तार्किक यह कहनेका साहस करे, कि “भक्तिमार्गसे अद्वैतज्ञान हो नहीं सकता” अथवा देवताओंका केवल अंधविश्वास करनेसेही मोक्ष मिल जाता है, उसके लिये ज्ञानकी कोई आवश्यकता नहीं, तो इसे आश्चर्यही समझना चाहिये। भक्ति-मार्ग और ज्ञान-मार्गका अंतिम साध्य एकही है; और “परमेश्वरके अनुभवात्मक ज्ञानसेही अंतमें मोक्ष मिलता है,” यह सिद्धान्त दोनों मार्गोंमें एक- ही-सा बना रहता है। यही क्यों; बल्कि अध्यात्म-प्रकरणमें और कर्मविपाक प्रकरणमें पहले जो और सिद्धान्त बतलाये गये हैं; वेभी सब गीताके भक्ति-मार्गमें स्थिर रहते