भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 476, कुल 956 में से

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पृष्ठ 476

है । उदाहरणार्थ, भागवत धर्ममें कुछ लोग इस प्रकार चतुर्व्यूहरूपी सृष्टिकी उत्पत्ति बतलाया करते हैं, कि वासुदेवरूपी परमेश्वरसे संकर्षणरूपी जीव उत्पन्न हुआ; और फिर संकर्षणसे प्रद्युम्न अर्थात् मन तथा प्रद्युम्नसे अनिरुद्ध अर्थात् अहंकार हुआ । दूसरे कुछ लोग तो इन चार व्यूहोंमेंसे तीन, दो या एक वासुदेवहीको मानते हैं - परंतु जीवकी उत्पत्तिके विषयमें ये मत सच नहीं है । उपनिषदोंके आधारपर वेदान्त सूत्रमें (वे. सू. २. ३. १७; २. २. ४२-४५) निश्चय किया गया है, कि अध्यात्म- दृष्टिसे जीव सनातन परमेश्वरहीका सनातन अंश है । इसलिये भगवद्गीतामें केवल भक्ति-मार्गकी उक्त चतुर्व्यूहसंबंधी कल्पना छोड़ दी गई है; और जीवके विषयमें वेदान्त-सूत्रकारोंका उपयुक्त सिद्धान्त दिया गया है (गीता २. २४; ८. २०; १३. २२; १५. ७) । इससे यही सिद्ध होता होता है, कि वासुदेवभक्ति और कर्मयोग ये दोनों तत्त्व गीतामें यद्यपि भागवत धर्मसेही लिये गये हैं, तथापि क्षेत्ररूपी जीव और परमेश्वरके स्वरूपके विषयमें अध्यात्मज्ञानसे भिन्न किन्हीं और ऊटपटाँग कल्पनाओको गीतामें स्थान नहीं दिया गया है । अब यद्यपि गीतामें भक्ति और अध्यात्म अथवा श्रद्धा और ज्ञानका पूरा पूरा मेल रखनेका प्रयत्न किया गया है, तथापि यह स्मरण रहे, कि जब अध्यात्मशास्त्रके सिद्धान्त भक्ति-मार्गमें लिये जाते हैं, तब उनमें कुछ-न-कुछ शब्दभेद अवश्य करना पड़ता है; और गीतामें ऐसा भेद किया भी गया है। ज्ञान-मार्गके और भक्ति-मार्गके इस शब्दभेदके कारण कुछ लोगोंने भूलसे समझ लिया है, कि गीतामें जो सिद्धान्त कभी भक्तिकी दृष्टिसे और कभी ज्ञानकी दृष्टिसे कहे गये हैं, उनमें परस्पर विरोध है; अतएव उतने भरके लिये गीता असंबद्ध है । परंतु हमारे मतसे यह विरोध वस्तुतः सच नहीं है; और हमारे शास्त्रकारोंने अध्यात्म तथा भक्तिमें जो मेल कर दिया है, उसकी ओर ध्यान न देनेसेही ऐसे विरोध दिखाई दिया करते हैं । इसलिये यहाँ इस विषयका कुछ अधिक स्पष्टीकरण कर देना चाहिये । अध्यात्मशास्त्रका सिद्धान्त है, कि पिंड और ब्रह्मांडमें एक-ही आत्मा नाम-रूपसे आच्छादित है, इसलिये अध्यात्मशास्त्रकी दृष्टिसे हम लोग कहा करते हैं, कि "जो आत्मा मुझमें है, वही प्राणियोंमेंभी है" - "सर्वभूतस्थ- मात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि" (गीता ६. २९) अथवा "यह सब आत्माही है" - "इदं सर्वमात्मैव" । परंतु भक्ति-मार्गमें अव्यक्त परमेश्वरहीको व्यक्त परमेश्वरका स्वरूप प्राप्त हो जाता है, अतएव अब उक्त सिद्धान्तके बदले गीतामें यह वर्णन पाया जाता है, कि "यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति" - मैं (भगवान्) सब प्राणियोंमें हूँ; और सब प्राणी मुझमें हैं (गीता ६. २९); "अथवा वासुदेवः सर्वमिति" जो कुछ है, वह सब वासुदेवमय है (गीता ७. १९); अथवा "येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि" - ज्ञान हो जानेपर तू सब प्राणियोंको मुझमें और स्वयं अपनेमेंभी देखेगा (गीता ४. ३५) । इसी कारणसे भागवत-पुराणमेंभी भगवद्गीताका यह लक्षण इस प्रकार कहा गया है :-

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