भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 477

४३२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सर्वभूतेषु यः पश्येद्भगवद्भावमात्मनः । भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः ॥ “ जो अपने मनमें यह भेदभाव नहीं रखता, कि मैं अलग हूँ; भगवान् अलग हैं; और सब लोग भिन्न हैं; किंतु जो सब प्राणियोंके विषयमें यह भाव रखता है, कि भगवान् और मैं दोनों एक हैं; और जो यह समझता है, कि सब प्राणी भगवानमें और मुझ- मेंभी हैं, वही सब भागवतोंमें श्रेष्ठ है" ( भाग. ११. २. ४५ ; ३. २७. ४६ ) । इसमे दीख पड़ेगा, कि अध्यात्मशास्त्रके 'अव्यक्त परमात्मा' शब्दोंके बदले 'व्यक्त परमेश्वर' शब्दोंका प्रयोग किया गया है – यही सब भेद हुआ है । अध्यात्मशास्त्रमें यह बात युक्तिवादसे सिद्ध हो चुकी है, कि परमात्माके अव्यक्त होनेके कारण सारा जगत् आत्ममय है । परंतु भक्ति-मार्ग प्रत्यक्ष अवगम्य है, इसलिये परमेश्वरकी अनेक व्यक्त विभूतियोंका वर्णन करके और अर्जुनको दिव्य-दृष्टि देकर प्रत्यक्ष विश्वरूप- दर्शनसे इस बातकी साक्षात्प्रतीति करा दी है, कि माग परमेश्वरमय जगत् (आत्म- मय) है ( गीता अ. १०, ११) । अध्यात्मशास्त्रमें कहा गया है, कि कर्मका क्षय ज्ञानसे होता है, परंतु भक्ति-मार्गका यह तत्त्व है, कि सगुण परमेश्वरके सिवा इस जगत्में और कुछ नहीं है – वही ज्ञान है, वही कर्म है, वही ज्ञाता है, वही करने- वाला, करानेवाला और फल देनेवालाभी है । अतएव संचित, प्रारब्ध, क्रियमाण इत्यादि कर्मभेदोंकी झंझटमें न पड़, भक्तिमार्गके अनुसार यह प्रतिपादन किया जाता है, किकर्म करनेकी बुद्धि देनेवाला, कर्मका फल देनेवाला और कर्मका क्षय करने- वाला एक परमेश्वरही है । उदाहरणार्थ, तुकाराम महाराज (तु. गा. ४९०) एकान्तमें ईश्वरकी प्रार्थना करके स्पष्टतासे पर प्रेमपूर्वक कहते हैं :- एक बात एकान्तमें सुन लो, जगदाधार । तारें मेरे कर्म तो प्रभुका क्या उपकार ? ॥ यही भाव अन्य शब्दोंमें दूसरे स्थानपर इस प्रकार व्यक्त किया गया है, कि " प्रारब्ध, क्रियमाण और संचितका झगड़ा भक्तोंके लिये नहीं है । देखो; सब कुछ ईश्वरही है, जो भीतर-बाहर सर्व-व्याप्त है" ( तु. गा. १०२३ ) । भगवद्गीताने यही कहा है, कि “ ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति " ( गीता. १८. ६१ ) - ईश्वरही सब लोगोंके हृदयमें निवास करके उनसे यंत्रके समान सब कर्म करवाता है । कर्म- विपाक-प्रक्रियामे सिद्ध किया गया है, कि ज्ञानकी प्राप्ति कर लेनेके लिये आत्माको पूरी स्वतंत्रता है; परंतु उसके बदले भक्ति-मार्गमें यह कहा जाता है, कि इस बुद्धिको देनेवाला परमेश्वरही है - " तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् " ( गीता ७. २१ ), अथवा " ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्तिते " ( गीता १०. १० ) । ऐसे बारह वर्णन किये गये हैं । इसी प्रकार संसारके सब कर्म परमेश्वरकीही सत्तासे हुआ करते हैं, इसलिये भक्ति-मार्गमें यह वर्णन पाया जाता है, कि वायुभी उसीके भयसे चलती है; और सूर्य तथा चंद्रभी उसीकी शक्तिसे चलते हैं ( कठ. ६. ३;