भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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वृ. ३. ८. ९)। अधिक क्या कहा जाय; उसकी इच्छाके बिना पेड़का एक पत्तातक नहीं हिलता। यही कारण है, कि भक्तिमार्गमें यह कहते हैं, कि मनुष्य केवल निमित्तमात्रहीके लिये सामने रहता है (गीता ११. ३३); और उसके सब व्यवहार परमेश्वरही उसके हृदयमें निवास कर उससे कराया करता है। साधु तुकाराम (तु. गा. २३१०. ४) कहते हैं, कि "यह प्राणी केवल निमित्तहीके लिये स्वतंत्र है; 'मेरा मेरा' कहकर व्यर्थही यह अपना नाशकर लेता है।" इस जगतके व्यवहार और सुस्थितिको स्थिर रखनेके लिये सभी लोगोंको कर्म करना चाहिये। परंतु ईशावास्योपनिषद्‌का जो यह तत्त्व है- कि जिस प्रकार अज्ञानी लोग किसी कर्मको 'मेरा' कहकर किया करते हैं, वैसे न कर ज्ञानी पुरुषको ब्रह्मा- र्पणबुद्धिसे सब कर्म मृत्युपर्यंत करते रहना चाहिये, उक्त उपदेशका सारांश है। यही उपदेश भगवानने अर्जुनको इस श्लोकमें किया है:- यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्। यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥ अर्थात् "जो कुछ तू करेगा, खायेगा, हवन करेगा, देगा या तप करेगा, वह सब मुझे अर्पण कर" (गीता ९. २७); इससे तुझे कर्मकी बाधा नहीं होगी। भगवद्- गीताका यही श्लोक शिवगीतामें (१४. ७५) पाया जाता है; और भागवतके इस श्लोकमेंभी उसी अर्थका वर्णन है:- कायेन वाचा मनसेंद्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वाऽनुसृतस्वभावात् । करोति यद्यत्सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयेत्तत् ॥ "काया, वाचा, मन, इंद्रिय, बुद्धि या आत्माकी प्रवृत्तिसे अथवा स्वभावके अनुसार जो कुछ हम किया करते हैं, वह सब परात्पर नारायणको समर्पण कर दिया जावे" (भाग. ११. २. ३६)। सारांश यह है, कि अध्यात्मशास्त्रमें जिसे ज्ञान-कर्म- समुच्चय पक्ष, फलाशात्याग अथवा ब्रह्मार्पणपूर्वक कर्म कहते हैं (गीता ४. २४; ५. १०; १२. १२), उसीको भक्ति-मार्गमें 'कृष्णार्पणपूर्वक कर्म' यह नया नाम मिल जाता है। भक्ति-मार्गवाले भोजनके समय 'गोविंद, गोविंद' कहा करते हैं; उसका रहस्य इस कृष्णार्पण-बुद्धिमेंही है। ज्ञानी जनकने कहा है, कि हमारे सब व्यवहार लोगोंके उपयोगके लिये निष्काम-बुद्धिसे हो रहे हैं; और भगवद्भक्तभी खाना, पीना, इत्यादि अपना सब व्यवहार कृष्णार्पण-बुद्धिमेंही किया करते हैं। उद्यापन, ब्राह्मण-भोजन अथवा अन्य इष्टापूर्त कर्म करनेपर अंतमें 'इदं कृष्णार्पण- मस्तु' अथवा 'हरिर्दाता हरिर्भोक्ता' कहकर पानी छोड़नेकी जो रीति है, उसका मूल तत्त्वभी भगवद्गीताके उक्त श्लोकमें है। यह सच है, कि जिस प्रकार बालियोंके न रहनेपरभी कानोंके छेद मात्र बाकी रह जाय, उसी प्रकार वर्तमान समयमें उक्त संकल्पकी दशा हो गई है, क्योंकि पुरोहित उस संकल्पके सच्चे अर्थको न समझकर गी. र. २८